Surah Ya-Sin
Quran Surah
Surah 36: Ya-Sin
يس
Verse count: 83
Opening Bismillah
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपालु और अत्यन्त दयावान हैं।
Verse 1
يسٓ
यासीन
Verse 2
وَٱلۡقُرۡءَانِ ٱلۡحَكِيمِ
इस पुरअज़ हिकमत कुरान की क़सम
Verse 3
إِنَّكَ لَمِنَ ٱلۡمُرۡسَلِينَ
(ऐ रसूल) तुम बिलाशक यक़ीनी पैग़म्बरों में से हो
Verse 4
عَلَىٰ صِرَٲطٍ مُّسۡتَقِيمٍ
(और दीन के बिल्कुल) सीधे रास्ते पर (साबित क़दम) हो
Verse 5
تَنزِيلَ ٱلۡعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ
जो बड़े मेहरबान (और) ग़ालिब (खुदा) का नाज़िल किया हुआ (है)
Verse 6
لِتُنذِرَ قَوۡمًا مَّآ أُنذِرَ ءَابَآؤُهُمۡ فَهُمۡ غَـٰفِلُونَ
ताकि तुम उन लोगों को (अज़ाबे खुदा से) डराओ जिनके बाप दादा (तुमसे पहले किसी पैग़म्बर से) डराए नहीं गए
Verse 7
لَقَدۡ حَقَّ ٱلۡقَوۡلُ عَلَىٰٓ أَكۡثَرِهِمۡ فَهُمۡ لَا يُؤۡمِنُونَ
तो वह दीन से बिल्कुल बेख़बर हैं उन में अक्सर तो (अज़ाब की) बातें यक़ीनन बिल्कुल ठीक पूरी उतरे ये लोग तो ईमान लाएँगे नहीं
Verse 8
إِنَّا جَعَلۡنَا فِىٓ أَعۡنَـٰقِهِمۡ أَغۡلَـٰلاً فَهِىَ إِلَى ٱلۡأَذۡقَانِ فَهُم مُّقۡمَحُونَ
हमने उनकी गर्दनों में (भारी-भारी लोहे के) तौक़ डाल दिए हैं और ठुड्डियों तक पहुँचे हुए हैं कि वह गर्दनें उठाए हुए हैं (सर झुका नहीं सकते)
Verse 9
وَجَعَلۡنَا مِنۢ بَيۡنِ أَيۡدِيہِمۡ سَدًّا وَمِنۡ خَلۡفِهِمۡ سَدًّا فَأَغۡشَيۡنَـٰهُمۡ فَهُمۡ لَا يُبۡصِرُونَ
हमने एक दीवार उनके आगे बना दी है और एक दीवार उनके पीछे फिर ऊपर से उनको ढाँक दिया है तो वह कुछ देख नहीं सकते
Verse 10
وَسَوَآءٌ عَلَيۡہِمۡ ءَأَنذَرۡتَهُمۡ أَمۡ لَمۡ تُنذِرۡهُمۡ لَا يُؤۡمِنُونَ
और (ऐ रसूल) उनके लिए बराबर है ख्वाह तुम उन्हें डराओ या न डराओ ये (कभी) ईमान लाने वाले नहीं हैं
Verse 11
إِنَّمَا تُنذِرُ مَنِ ٱتَّبَعَ ٱلذِّڪۡرَ وَخَشِىَ ٱلرَّحۡمَـٰنَ بِٱلۡغَيۡبِ ۖ فَبَشِّرۡهُ بِمَغۡفِرَةٍ وَأَجۡرٍ ڪَرِيمٍ
तुम तो बस उसी शख्स को डरा सकते हो जो नसीहत माने और बेदेखे भाले खुदा का ख़ौफ़ रखे तो तुम उसको (गुनाहों की) माफी और एक बाइज्ज़त (व आबरू) अज्र की खुशख़बरी दे दो
Verse 12
إِنَّا نَحۡنُ نُحۡىِ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَنَڪۡتُبُ مَا قَدَّمُواْ وَءَاثَـٰرَهُمۡۚ وَكُلَّ شَىۡءٍ أَحۡصَيۡنَـٰهُ فِىٓ إِمَامٍ مُّبِينٍ
हम ही यक़ीनन मुर्दों को ज़िन्दा करते हैं और जो कुछ लोग पहले कर चुके हैं (उनको) और उनकी (अच्छी या बुरी बाक़ी माँदा) निशानियों को लिखते जाते हैं और हमने हर चीज़ का एक सरीह व रौशन पेशवा में घेर दिया है
Verse 13
وَٱضۡرِبۡ لَهُم مَّثَلاً أَصۡحَـٰبَ ٱلۡقَرۡيَةِ إِذۡ جَآءَهَا ٱلۡمُرۡسَلُونَ
और (ऐ रसूल) तुम (इनसे) मिसाल के तौर पर एक गाँव (अता किया) वालों का क़िस्सा बयान करो जब वहाँ (हमारे) पैग़म्बर आए
Verse 14
إِذۡ أَرۡسَلۡنَآ إِلَيۡہِمُ ٱثۡنَيۡنِ فَكَذَّبُوهُمَا فَعَزَّزۡنَا بِثَالِثٍ فَقَالُوٓاْ إِنَّآ إِلَيۡكُم مُّرۡسَلُونَ
इस तरह कि जब हमने उनके पास दो (पैग़म्बर योहना और यूनुस) भेजे तो उन लोगों ने दोनों को झुठलाया जब हमने एक तीसरे (पैग़म्बर शमऊन) से (उन दोनों को) मद्द दी तो इन तीनों ने कहा कि हम तुम्हारे पास खुदा के भेजे हुए (आए) हैं
Verse 15
قَالُواْ مَآ أَنتُمۡ إِلَّا بَشَرٌ مِّثۡلُنَا وَمَآ أَنزَلَ ٱلرَّحۡمَـٰنُ مِن شَىۡءٍ إِنۡ أَنتُمۡ إِلَّا تَكۡذِبُونَ
वह लोग कहने लगे कि तुम लोग भी तो बस हमारे ही जैसे आदमी हो और खुदा ने कुछ नाज़िल (वाज़िल) नहीं किया है तुम सब के सब बस बिल्कुल झूठे हो
Verse 16
قَالُواْ رَبُّنَا يَعۡلَمُ إِنَّآ إِلَيۡكُمۡ لَمُرۡسَلُونَ
तब उन पैग़म्बरों ने कहा हमारा परवरदिगार जानता है कि हम यक़ीनन उसी के भेजे हुए (आए) हैं और (तुम मानो या न मानो)
Verse 17
وَمَا عَلَيۡنَآ إِلَّا ٱلۡبَلَـٰغُ ٱلۡمُبِينُ
हम पर तो बस खुल्लम खुल्ला एहकामे खुदा का पहुँचा देना फर्ज़ है
Verse 18
قَالُوٓاْ إِنَّا تَطَيَّرۡنَا بِكُمۡ ۖ لَٮِٕن لَّمۡ تَنتَهُواْ لَنَرۡجُمَنَّكُمۡ وَلَيَمَسَّنَّكُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌ
वह बोले हमने तुम लोगों को बहुत नहस क़दम पाया कि (तुम्हारे आते ही क़हत में मुबतेला हुए) तो अगर तुम (अपनी बातों से) बाज़ न आओगे तो हम लोग तुम्हें ज़रूर संगसार कर देगें और तुमको यक़ीनी हमारा दर्दनाक अज़ाब पहुँचेगा
Verse 19
قَالُواْ طَـٰٓٮِٕرُكُم مَّعَكُمۡۚ أَٮِٕن ذُڪِّرۡتُمۚ بَلۡ أَنتُمۡ قَوۡمٌ مُّسۡرِفُونَ
पैग़म्बरों ने कहा कि तुम्हारी बद शुगूनी (तुम्हारी करनी से) तुम्हारे साथ है क्या जब नसीहत की जाती है (तो तुम उसे बदफ़ाली कहते हो नहीं) बल्कि तुम खुद (अपनी) हद से बढ़ गए हो
Verse 20
وَجَآءَ مِنۡ أَقۡصَا ٱلۡمَدِينَةِ رَجُلٌ يَسۡعَىٰ قَالَ يَـٰقَوۡمِ ٱتَّبِعُواْ ٱلۡمُرۡسَلِينَ
और (इतने में) शहर के उस सिरे से एक शख्स (हबीब नज्जार) दौड़ता हुआ आया और कहने लगा कि ऐ मेरी क़ौम (इन) पैग़म्बरों का कहना मानो
Verse 21
ٱتَّبِعُواْ مَن لَّا يَسْأَلُكُمْۡ أَجۡرًا وَهُم مُّهۡتَدُونَ
ऐसे लोगों का (ज़रूर) कहना मानो जो तुमसे (तबलीख़े रिसालत की) कुछ मज़दूरी नहीं माँगते और वह लोग हिदायत याफ्ता भी हैं
Verse 22
وَمَا لِىَ لَآ أَعۡبُدُ ٱلَّذِى فَطَرَنِى وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ
और मुझे क्या (ख़ब्त) हुआ है कि जिसने मुझे पैदा किया है उसकी इबादत न करूँ हालाँकि तुम सब के बस (आख़िर) उसी की तरफ लौटकर जाओगे
Verse 23
ءَأَتَّخِذُ مِن دُونِهِۦۤ ءَالِهَةً إِن يُرِدۡنِ ٱلرَّحۡمَـٰنُ بِضُرٍّ لَّا تُغۡنِ عَنِّى شَفَـٰعَتُهُمۡ شَيْئًا وَلَا يُنقِذُونِ
क्या मैं उसे छोड़कर दूसरों को माबूद बना लूँ अगर खुदा मुझे कोई तकलीफ पहुँचाना चाहे तो न उनकी सिफारिश ही मेरे कुछ काम आएगी और न ये लोग मुझे (इस मुसीबत से) छुड़ा ही सकेंगें
Verse 24
إِنِّىٓ إِذًا لَّفِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ
(अगर ऐसा करूँ) तो उस वक्त मैं यक़ीनी सरीही गुमराही में हूँ
Verse 25
إِنِّىٓ ءَامَنتُ بِرَبِّكُمۡ فَٱسۡمَعُونِ
मैं तो तुम्हारे परवरदिगार पर ईमान ला चुका हूँ मेरी बात सुनो और मानो; मगर उन लोगों ने उसे संगसार कर डाला
Verse 26
قِيلَ ٱدۡخُلِ ٱلۡجَنَّةَ ۖ قَالَ يَـٰلَيۡتَ قَوۡمِى يَعۡلَمُونَ
तब उसे खुदा का हुक्म हुआ कि बेहिश्त में जा (उस वक्त भी उसको क़ौम का ख्याल आया तो कहा)
Verse 27
بِمَا غَفَرَ لِى رَبِّى وَجَعَلَنِى مِنَ ٱلۡمُكۡرَمِينَ
मेरे परवरदिगार ने जो मुझे बख्श दिया और मुझे बुर्ज़ुग लोगों में शामिल कर दिया काश इसको मेरी क़ौम के लोग जान लेते और ईमान लाते
Verse 28
۞ وَمَآ أَنزَلۡنَا عَلَىٰ قَوۡمِهِۦ مِنۢ بَعۡدِهِۦ مِن جُندٍ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَمَا كُنَّا مُنزِلِينَ
और हमने उसके मरने के बाद उसकी क़ौम पर उनकी तबाही के लिए न तो आसमान से कोई लशकर उतारा और न हम कभी इतनी सी बात के वास्ते लशकर उतारने वाले थे
Verse 29
إِن كَانَتۡ إِلَّا صَيۡحَةً وَٲحِدَةً فَإِذَا هُمۡ خَـٰمِدُونَ
वह तो सिर्फ एक चिंघाड थी (जो कर दी गयी बस) फिर तो वह फौरन चिराग़े सहरी की तरह बुझ के रह गए
Verse 30
يَـٰحَسۡرَةً عَلَى ٱلۡعِبَادِ ۚ مَا يَأۡتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُواْ بِهِۦ يَسۡتَہۡزِءُونَ
हाए अफसोस बन्दों के हाल पर कि कभी उनके पास कोई रसूल नहीं आया मगर उन लोगों ने उसके साथ मसख़रापन ज़रूर किया
Verse 31
أَلَمۡ يَرَوۡاْ كَمۡ أَهۡلَكۡنَا قَبۡلَهُم مِّنَ ٱلۡقُرُونِ أَنَّہُمۡ إِلَيۡہِمۡ لَا يَرۡجِعُونَ
क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला और वह लोग उनके पास हरगिज़ पलट कर नहीं आ सकते
Verse 32
وَإِن كُلٌّ لَّمَّا جَمِيعٌ لَّدَيۡنَا مُحۡضَرُونَ
(हाँ) अलबत्ता सब के सब इकट्ठा हो कर हमारी बारगाह में हाज़िर किए जाएँगे
Verse 33
وَءَايَةٌ لَّهُمُ ٱلۡأَرۡضُ ٱلۡمَيۡتَةُ أَحۡيَيۡنَـٰهَا وَأَخۡرَجۡنَا مِنۡہَا حَبًّا فَمِنۡهُ يَأۡڪُلُونَ
और उनके (समझने) के लिए मेरी कुदरत की एक निशानी मुर्दा (परती) ज़मीन है कि हमने उसको (पानी से) ज़िन्दा कर दिया और हम ही ने उससे दाना निकाला तो उसे ये लोग खाया करते हैं
Verse 34
وَجَعَلۡنَا فِيهَا جَنَّـٰتٍ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعۡنَـٰبٍ وَفَجَّرۡنَا فِيہَا مِنَ ٱلۡعُيُونِ
और हम ही ने ज़मीन में छुहारों और अंगूरों के बाग़ लगाए और हमही ने उसमें पानी के चशमें जारी किए
Verse 35
لِيَأۡڪُلُواْ مِن ثَمَرِهِۦ وَمَا عَمِلَتۡهُ أَيۡدِيهِمۡ ۖ أَفَلَا يَشۡڪُرُونَ
ताकि लोग उनके फल खाएँ और कुछ उनके हाथों ने उसे नहीं बनाया (बल्कि खुदा ने) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते
Verse 36
سُبۡحَـٰنَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلۡأَزۡوَٲجَ ڪُلَّهَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلۡأَرۡضُ وَمِنۡ أَنفُسِهِمۡ وَمِمَّا لَا يَعۡلَمُونَ
वह (हर ऐब से) पाक साफ है जिसने ज़मीन से उगने वाली चीज़ों और खुद उन लोगों के और उन चीज़ों के जिनकी उन्हें ख़बर नहीं सबके जोड़े पैदा किए
Verse 37
وَءَايَةٌ لَّهُمُ ٱلَّيۡلُ نَسۡلَخُ مِنۡهُ ٱلنَّہَارَ فَإِذَا هُم مُّظۡلِمُونَ
और मेरी क़ुदरत की एक निशानी रात है जिससे हम दिन को खींच कर निकाल लेते (जाएल कर देते) हैं तो उस वक्त ये लोग अंधेरे में रह जाते हैं
Verse 38
وَٱلشَّمۡسُ تَجۡرِى لِمُسۡتَقَرٍّ لَّهَا ۚ ذَٲلِكَ تَقۡدِيرُ ٱلۡعَزِيزِ ٱلۡعَلِيمِ
और (एक निशानी) आफताब है जो अपने एक ठिकाने पर चल रहा है ये (सबसे) ग़ालिब वाक़िफ (खुदा) का (बाँद्दा हुआ) अन्दाज़ा है
Verse 39
وَٱلۡقَمَرَ قَدَّرۡنَـٰهُ مَنَازِلَ حَتَّىٰ عَادَ كَٱلۡعُرۡجُونِ ٱلۡقَدِيمِ
और हमने चाँद के लिए मंज़िलें मुक़र्रर कर दीं हैं यहाँ तक कि हिर फिर के (आख़िर माह में) खजूर की पुरानी टहनी का सा (पतला टेढ़ा) हो जाता है
Verse 40
لَا ٱلشَّمۡسُ يَنۢبَغِى لَهَآ أَن تُدۡرِكَ ٱلۡقَمَرَ وَلَا ٱلَّيۡلُ سَابِقُ ٱلنَّہَارِ ۚ وَكُلٌّ فِى فَلَكٍ يَسۡبَحُونَ
न तो आफताब ही से ये बन पड़ता है कि वह माहताब को जा ले और न रात ही दिन से आगे बढ़ सकती है (चाँद, सूरज, सितारे) हर एक अपने-अपने आसमान (मदार) में चक्कर लगा रहें हैं
Verse 41
وَءَايَةٌ لَّهُمۡ أَنَّا حَمَلۡنَا ذُرِّيَّتَہُمۡ فِى ٱلۡفُلۡكِ ٱلۡمَشۡحُونِ
और उनके लिए (मेरी कुदरत) की एक निशानी ये है कि उनके बुर्ज़ुगों को (नूह की) भरी हुई कश्ती में सवार किया
Verse 42
وَخَلَقۡنَا لَهُم مِّن مِّثۡلِهِۦ مَا يَرۡكَبُونَ
और उस कशती के मिसल उन लोगों के वास्ते भी वह चीज़े (कशतियाँ) जहाज़ पैदा कर दी
Verse 43
وَإِن نَّشَأۡ نُغۡرِقۡهُمۡ فَلَا صَرِيخَ لَهُمۡ وَلَا هُمۡ يُنقَذُونَ
जिन पर ये लोग सवार हुआ करते हैं और अगर हम चाहें तो उन सब लोगों को डुबा मारें फिर न कोई उन का फरियाद रस होगा और न वह लोग छुटकारा ही पा सकते हैं
Verse 44
إِلَّا رَحۡمَةً مِّنَّا وَمَتَـٰعًا إِلَىٰ حِينٍ
मगर हमारी मेहरबानी से और चूँकि एक (ख़ास) वक्त तक (उनको) चैन करने देना (मंज़ूर) है
Verse 45
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّقُواْ مَا بَيۡنَ أَيۡدِيكُمۡ وَمَا خَلۡفَكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ
और जब उन कुफ्फ़ार से कहा जाता है कि इस (अज़ाब से) बचो (हर वक्त तुम्हारे साथ-साथ) तुम्हारे सामने और तुम्हारे पीछे (मौजूद) है ताकि तुम पर रहम किया जाए
Verse 46
وَمَا تَأۡتِيہِم مِّنۡ ءَايَةٍ مِّنۡ ءَايَـٰتِ رَبِّہِمۡ إِلَّا كَانُواْ عَنۡہَا مُعۡرِضِينَ
(तो परवाह नहीं करते) और उनकी हालत ये है कि जब उनके परवरदिगार की निशानियों में से कोई निशानी उनके पास आयी तो ये लोग मुँह मोड़े बग़ैर कभी नहीं रहे
Verse 47
وَإِذَا قِيلَ لَهُمۡ أَنفِقُواْ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ قَالَ ٱلَّذِينَ ڪَفَرُواْ لِلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَنُطۡعِمُ مَن لَّوۡ يَشَآءُ ٱللَّهُ أَطۡعَمَهُ ۥۤ إِنۡ أَنتُمۡ إِلَّا فِى ضَلَـٰلٍ مُّبِينٍ
और जब उन (कुफ्फ़ार) से कहा जाता है कि (माले दुनिया से) जो खुदा ने तुम्हें दिया है उसमें से कुछ (खुदा की राह में भी) ख़र्च करो तो (ये) कुफ्फ़ार ईमानवालों से कहते हैं कि भला हम उस शख्स को खिलाएँ जिसे (तुम्हारे ख्याल के मुवाफ़िक़) खुदा चाहता तो उसको खुद खिलाता कि तुम लोग बस सरीही गुमराही में (पड़े हुए) हो
Verse 48
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلۡوَعۡدُ إِن كُنتُمۡ صَـٰدِقِينَ
और कहते हैं कि (भला) अगर तुम लोग (अपने दावे में सच्चे हो) तो आख़िर ये (क़यामत का) वायदा कब पूरा होगा
Verse 49
مَا يَنظُرُونَ إِلَّا صَيۡحَةً وَٲحِدَةً تَأۡخُذُهُمۡ وَهُمۡ يَخِصِّمُونَ
(ऐ रसूल) ये लोग एक सख्त चिंघाड़ (सूर) के मुनतज़िर हैं जो उन्हें (उस वक्त) ले डालेगी
Verse 50
فَلَا يَسۡتَطِيعُونَ تَوۡصِيَةً وَلَآ إِلَىٰٓ أَهۡلِهِمۡ يَرۡجِعُونَ
जब ये लोग बाहम झगड़ रहे होगें फिर न तो ये लोग वसीयत ही करने पायेंगे और न अपने लड़के बालों ही की तरफ लौट कर जा सकेगें
Verse 51
وَنُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَإِذَا هُم مِّنَ ٱلۡأَجۡدَاثِ إِلَىٰ رَبِّهِمۡ يَنسِلُونَ
और फिर (जब दोबारा) सूर फूँका जाएगा तो उसी दम ये सब लोग (अपनी-अपनी) क़ब्रों से (निकल-निकल के) अपने परवरदिगार की बारगाह की तरफ चल खड़े होगे
Verse 52
قَالُواْ يَـٰوَيۡلَنَا مَنۢ بَعَثَنَا مِن مَّرۡقَدِنَاۜ ۗ هَـٰذَا مَا وَعَدَ ٱلرَّحۡمَـٰنُ وَصَدَقَ ٱلۡمُرۡسَلُونَ
और (हैरान होकर) कहेगें हाए अफसोस हम तो पहले सो रहे थे हमें ख्वाबगाह से किसने उठाया (जवाब आएगा) कि ये वही (क़यामत का) दिन है जिसका खुदा ने (भी) वायदा किया था
Verse 53
إِن ڪَانَتۡ إِلَّا صَيۡحَةً وَٲحِدَةً فَإِذَا هُمۡ جَمِيعٌ لَّدَيۡنَا مُحۡضَرُونَ
और पैग़म्बरों ने भी सच कहा था (क़यामत तो) बस एक सख्त चिंघाड़ होगी फिर एका एकी ये लोग सब के सब हमारे हुजूर में हाज़िर किए जाएँगे
Verse 54
فَٱلۡيَوۡمَ لَا تُظۡلَمُ نَفۡسٌ شَيْئًا وَلَا تُجۡزَوۡنَ إِلَّا مَا ڪُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ
फिर आज (क़यामत के दिन) किसी शख्स पर कुछ भी ज़ुल्म न होगा और तुम लोगों को तो उसी का बदला दिया जाएगा जो तुम लोग (दुनिया में) किया करते थे
Verse 55
إِنَّ أَصۡحَـٰبَ ٱلۡجَنَّةِ ٱلۡيَوۡمَ فِى شُغُلٍ فَـٰكِهُونَ
बेहश्त के रहने वाले आज (रोजे क़यामत) एक न एक मशग़ले में जी बहला रहे हैं
Verse 56
هُمۡ وَأَزۡوَٲجُهُمۡ فِى ظِلَـٰلٍ عَلَى ٱلۡأَرَآٮِٕكِ مُتَّكِـُٔونَ
वह अपनी बीवियों के साथ (ठन्डी) छाँव में तकिया लगाए तख्तों पर (चैन से) बैठे हुए हैं
Verse 57
لَهُمۡ فِيہَا فَـٰكِهَةٌ وَلَهُم مَّا يَدَّعُونَ
बेिहश्त में उनके लिए (ताज़ा) मेवे (तैयार) हैं और जो वह चाहें उनके लिए (हाज़िर) है
Verse 58
سَلَـٰمٌ قَوۡلاً مِّن رَّبٍّ رَّحِيمٍ
मेहरबान परवरदिगार की तरफ से सलाम का पैग़ाम आएगा
Verse 59
وَٱمۡتَـٰزُواْ ٱلۡيَوۡمَ أَيُّہَا ٱلۡمُجۡرِمُونَ
और (एक आवाज़ आएगी कि) ऐ गुनाहगारों तुम लोग (इनसे) अलग हो जाओ
Verse 60
۞ أَلَمۡ أَعۡهَدۡ إِلَيۡكُمۡ يَـٰبَنِىٓ ءَادَمَ أَن لَّا تَعۡبُدُواْ ٱلشَّيۡطَـٰنَ ۖ إِنَّهُ ۥ لَكُمۡ عَدُوٌّ مُّبِينٌ
ऐ आदम की औलाद क्या मैंने तुम्हारे पास ये हुक्म नहीं भेजा था कि (ख़बरदार) शैतान की परसतिश न करना वह यक़ीनी तुम्हारा खुल्लम खुल्ला दुश्मन है
Verse 61
وَأَنِ ٱعۡبُدُونِى ۚ هَـٰذَا صِرَٲطٌ مُّسۡتَقِيمٌ
और ये कि (देखो) सिर्फ मेरी इबादत करना यही (नजात की) सीधी राह है
Verse 62
وَلَقَدۡ أَضَلَّ مِنكُمۡ جِبِلاًّ كَثِيرًا ۖ أَفَلَمۡ تَكُونُواْ تَعۡقِلُونَ
और (बावजूद इसके) उसने तुममें से बहुतेरों को गुमराह कर छोड़ा तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते थे
Verse 63
هَـٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِى كُنتُمۡ تُوعَدُونَ
ये वही जहन्नुम है जिसका तुमसे वायदा किया गया था
Verse 64
ٱصۡلَوۡهَا ٱلۡيَوۡمَ بِمَا كُنتُمۡ تَكۡفُرُونَ
तो अब चूँकि तुम कुफ्र करते थे इस वजह से आज इसमें (चुपके से) चले जाओ
Verse 65
ٱلۡيَوۡمَ نَخۡتِمُ عَلَىٰٓ أَفۡوَٲهِهِمۡ وَتُكَلِّمُنَآ أَيۡدِيہِمۡ وَتَشۡہَدُ أَرۡجُلُهُم بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ
आज हम उनके मुँह पर मुहर लगा देगें और (जो) कारसतानियाँ ये लोग दुनिया में कर रहे थे खुद उनके हाथ हमको बता देगें और उनके पाँव गवाही देगें
Verse 66
وَلَوۡ نَشَآءُ لَطَمَسۡنَا عَلَىٰٓ أَعۡيُنِہِمۡ فَٱسۡتَبَقُواْ ٱلصِّرَٲطَ فَأَنَّىٰ يُبۡصِرُونَ
और अगर हम चाहें तो उनकी ऑंखों पर झाडू फेर दें तो ये लोग राह को पड़े चक्कर लगाते ढूँढते फिरें मगर कहाँ देख पाँएगे
Verse 67
وَلَوۡ نَشَآءُ لَمَسَخۡنَـٰهُمۡ عَلَىٰ مَڪَانَتِهِمۡ فَمَا ٱسۡتَطَـٰعُواْ مُضِيًّا وَلَا يَرۡجِعُونَ
और अगर हम चाहे तो जहाँ ये हैं (वहीं) उनकी सूरतें बदल (करके) (पत्थर मिट्टी बना) दें फिर न तो उनमें आगे जाने का क़ाबू रहे और न (घर) लौट सकें
Verse 68
وَمَن نُّعَمِّرۡهُ نُنَڪِّسۡهُ فِى ٱلۡخَلۡقِ ۖ أَفَلَا يَعۡقِلُونَ
और हम जिस शख्स को (बहुत) ज्यादा उम्र देते हैं तो उसे ख़िलक़त में उलट (कर बच्चों की तरह मजबूर कर) देते हैं तो क्या वह लोग समझते नहीं
Verse 69
وَمَا عَلَّمۡنَـٰهُ ٱلشِّعۡرَ وَمَا يَنۢبَغِى لَهُ ۥۤ ۚ إِنۡ هُوَ إِلَّا ذِكۡرٌ وَقُرۡءَانٌ مُّبِينٌ
और हमने न उस (पैग़म्बर) को शेर की तालीम दी है और न शायरी उसकी शान के लायक़ है ये (किताब) तो बस (निरी) नसीहत और साफ-साफ कुरान है
Verse 70
لِّيُنذِرَ مَن كَانَ حَيًّا وَيَحِقَّ ٱلۡقَوۡلُ عَلَى ٱلۡكَـٰفِرِينَ
ताकि जो ज़िन्दा (दिल आक़िल) हों उसे (अज़ाब से) डराए और काफ़िरों पर (अज़ाब का) क़ौल साबित हो जाए (और हुज्जत बाक़ी न रहे)
Verse 71
أَوَلَمۡ يَرَوۡاْ أَنَّا خَلَقۡنَا لَهُم مِّمَّا عَمِلَتۡ أَيۡدِينَآ أَنۡعَـٰمًا فَهُمۡ لَهَا مَـٰلِكُونَ
क्या उन लोगों ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनके फायदे के लिए चारपाए उस चीज़ से पैदा किए जिसे हमारी ही क़ुदरत ने बनाया तो ये लोग (ख्वाहमाख्वाह) उनके मालिक बन गए
Verse 72
وَذَلَّلۡنَـٰهَا لَهُمۡ فَمِنۡہَا رَكُوبُہُمۡ وَمِنۡہَا يَأۡكُلُونَ
और हम ही ने चार पायों को उनका मुतीय बना दिया तो बाज़ उनकी सवारियां हैं और बाज़ को खाते हैं
Verse 73
وَلَهُمۡ فِيہَا مَنَـٰفِعُ وَمَشَارِبُ ۖ أَفَلَا يَشۡكُرُونَ
और चार पायों में उनके (और) बहुत से फायदे हैं और पीने की चीज़ (दूध) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते
Verse 74
وَٱتَّخَذُواْ مِن دُونِ ٱللَّهِ ءَالِهَةً لَّعَلَّهُمۡ يُنصَرُونَ
और लोगों ने ख़ुदा को छोड़कर (फर्ज़ी माबूद बनाए हैं ताकि उन्हें उनसे कुछ मद्द मिले हालाँकि वह लोग उनकी किसी तरह मद्द कर ही नहीं सकते
Verse 75
لَا يَسۡتَطِيعُونَ نَصۡرَهُمۡ وَهُمۡ لَهُمۡ جُندٌ مُّحۡضَرُونَ
और ये कुफ्फ़ार उन माबूदों के लशकर हैं (और क़यामत में) उन सबकी हाज़िरी ली जाएगी
Verse 76
فَلَا يَحۡزُنكَ قَوۡلُهُمۡ ۢ إِنَّا نَعۡلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعۡلِنُونَ
तो (ऐ रसूल) तुम इनकी बातों से आज़ुरदा ख़ातिर (पेरशान) न हो जो कुछ ये लोग छिपा कर करते हैं और जो कुछ खुल्लम खुल्ला करते हैं-हम सबको यक़ीनी जानते हैं
Verse 77
أَوَلَمۡ يَرَ ٱلۡإِنسَـٰنُ أَنَّا خَلَقۡنَـٰهُ مِن نُّطۡفَةٍ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌ مُّبِينٌ
क्या आदमी ने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि हम ही ने इसको एक ज़लील नुत्फे से पैदा किया फिर वह यकायक (हमारा ही) खुल्लम खुल्ला मुक़ाबिल (बना) है
Verse 78
وَضَرَبَ لَنَا مَثَلاً وَنَسِىَ خَلۡقَهُ ۥ ۖ قَالَ مَن يُحۡىِ ٱلۡعِظَـٰمَ وَهِىَ رَمِيمٌ
और हमारी निसबत बातें बनाने लगा और अपनी ख़िलक़त (की हालत) भूल गया और कहने लगा कि भला जब ये हड्डियां (सड़गल कर) ख़ाक हो जाएँगी तो (फिर) कौन (दोबारा) ज़िन्दा कर सकता है
Verse 79
قُلۡ يُحۡيِيہَا ٱلَّذِىٓ أَنشَأَهَآ أَوَّلَ مَرَّةٍ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ خَلۡقٍ عَلِيمٌ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि उसको वही ज़िन्दा करेगा जिसने उनको (जब ये कुछ न थे) पहली बार ज़िन्दा कर (रखा)
Verse 80
ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلشَّجَرِ ٱلۡأَخۡضَرِ نَارًا فَإِذَآ أَنتُم مِّنۡهُ تُوقِدُونَ
और वह हर तरह की पैदाइश से वाक़िफ है जिसने तुम्हारे वास्ते (मिर्ख़ और अफ़ार के) हरे दरख्त से आग पैदा कर दी फिर तुम उससे (और) आग सुलगा लेते हो
Verse 81
أَوَلَيۡسَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضَ بِقَـٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يَخۡلُقَ مِثۡلَهُم ۚ بَلَىٰ وَهُوَ ٱلۡخَلَّـٰقُ ٱلۡعَلِيمُ
(भला) जिस (खुदा) ने सारे आसमान और ज़मीन पैदा किए क्या वह इस पर क़ाबू नहीं रखता कि उनके मिस्ल (दोबारा) पैदा कर दे हाँ (ज़रूर क़ाबू रखता है) और वह तो पैदा करने वाला वाक़िफ़कार है
Verse 82
إِنَّمَآ أَمۡرُهُ ۥۤ إِذَآ أَرَادَ شَيْئًا أَن يَقُولَ لَهُ ۥ كُن فَيَكُونُ
उसकी शान तो ये है कि जब किसी चीज़ को (पैदा करना) चाहता है तो वह कह देता है कि ”हो जा” तो (फौरन) हो जाती है
Verse 83
فَسُبۡحَـٰنَ ٱلَّذِى بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىۡءٍ وَإِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ
तो वह ख़ुद (हर नफ्स से) पाक साफ़ है जिसके क़ब्ज़े कुदरत में हर चीज़ की हिकमत है और तुम लोग उसी की तरफ लौट कर जाओगे