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Quran Surah

Surah An-Nisa

Quran Surah

Surah 4: An-Nisa

النساء

Verse count: 176

Opening Bismillah

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपालु और अत्यन्त दयावान हैं।

Verse 1

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلنَّاسُ ٱتَّقُواْ رَبَّكُمُ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن نَّفۡسٍ وَٲحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنۡہَا زَوۡجَهَا وَبَثَّ مِنۡہُمَا رِجَالاً كَثِيرًا وَنِسَآءً ۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ ٱلَّذِى تَسَآءَلُونَ بِهِۦ وَٱلۡأَرۡحَامَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَيۡكُمۡ رَقِيبًا

ऐ लोगों अपने पालने वाले से डरो जिसने तुम सबको (सिर्फ) एक शख्स से पैदा किया और (वह इस तरह कि पहले) उनकी बाकी मिट्टी से उनकी बीवी (हव्वा) को पैदा किया और (सिर्फ़) उन्हीं दो (मियॉ बीवी) से बहुत से मर्द और औरतें दुनिया में फैला दिये और उस ख़ुदा से डरो जिसके वसीले से आपस में एक दूसरे से सवाल करते हो और क़तए रहम से भी डरो बेशक ख़ुदा तुम्हारी देखभाल करने वाला है

Verse 2

وَءَاتُواْ ٱلۡيَتَـٰمَىٰٓ أَمۡوَٲلَہُمۡ‌ ۖ وَلَا تَتَبَدَّلُواْ ٱلۡخَبِيثَ بِٱلطَّيِّبِ‌ ۖ وَلَا تَأۡكُلُوٓاْ أَمۡوَٲلَهُمۡ إِلَىٰٓ أَمۡوَٲلِكُمۡ ۚ إِنَّهُ ۥ كَانَ حُوبًا كَبِيرًا

और यतीमों को उनके माल दे दो और बुरी चीज़ (माले हराम) को भली चीज़ (माले हलाल) के बदले में न लो और उनके माल अपने मालों में मिलाकर न चख जाओ क्योंकि ये बहुत बड़ा गुनाह है

Verse 3

وَإِنۡ خِفۡتُمۡ أَلَّا تُقۡسِطُواْ فِى ٱلۡيَتَـٰمَىٰ فَٱنكِحُواْ مَا طَابَ لَكُم مِّنَ ٱلنِّسَآءِ مَثۡنَىٰ وَثُلَـٰثَ وَرُبَـٰعَ‌ ۖ فَإِنۡ خِفۡتُمۡ أَلَّا تَعۡدِلُواْ فَوَٲحِدَةً أَوۡ مَا مَلَكَتۡ أَيۡمَـٰنُكُمۡ ۚ ذَٲلِكَ أَدۡنَىٰٓ أَلَّا تَعُولُواْ

और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रखरखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मर्ज़ी के मवाफ़िक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हें इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लोंडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो) ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है

Verse 4

وَءَاتُواْ ٱلنِّسَآءَ صَدُقَـٰتِہِنَّ نِحۡلَةً ۚ فَإِن طِبۡنَ لَكُمۡ عَن شَىۡءٍ مِّنۡهُ نَفۡسًا فَكُلُوهُ هَنِيٓـًٔا مَّرِيٓـًٔا

और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दे डालो फिर अगर वह ख़ुशी ख़ुशी तुम्हें कुछ छोड़ दे तो शौक़ से नौशे जान खाओ पियो

Verse 5

وَلَا تُؤۡتُواْ ٱلسُّفَهَآءَ أَمۡوَٲلَكُمُ ٱلَّتِى جَعَلَ ٱللَّهُ لَكُمۡ قِيَـٰمًا وَٱرۡزُقُوهُمۡ فِيہَا وَٱكۡسُوهُمۡ وَقُولُواْ لَهُمۡ قَوۡلاً مَّعۡرُوفًا

और अपने वह माल जिनपर ख़ुदा ने तुम्हारी गुज़र न क़रार दी है बेवकूफ़ों (ना समझ यतीम) को न दे बैठो हॉ उसमें से उन्हें खिलाओ और उनको पहनाओ (तो मज़ाएक़ा नहीं) और उनसे (शौक़ से) अच्छी तरह बात करो

Verse 6

وَٱبۡتَلُواْ ٱلۡيَتَـٰمَىٰ حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغُواْ ٱلنِّكَاحَ فَإِنۡ ءَانَسۡتُم مِّنۡہُمۡ رُشۡدًا فَٱدۡفَعُوٓاْ إِلَيۡہِمۡ أَمۡوَٲلَهُمۡ‌ ۖ وَلَا تَأۡكُلُوهَآ إِسۡرَافًا وَبِدَارًا أَن يَكۡبَرُواْ ۚ وَمَن كَانَ غَنِيًّا فَلۡيَسۡتَعۡفِفۡ‌ ۖ وَمَن كَانَ فَقِيرًا فَلۡيَأۡكُلۡ بِٱلۡمَعۡرُوفِ ۚ فَإِذَا دَفَعۡتُمۡ إِلَيۡہِمۡ أَمۡوَٲلَهُمۡ فَأَشۡہِدُواْ عَلَيۡہِمۡ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ حَسِيبًا

और यतीमों को कारोबार में लगाए रहो यहॉ तक के ब्याहने के क़ाबिल हों फिर उस वक्त तुम उन्हे (एक महीने का ख़र्च) उनके हाथ से कराके अगर होशियार पाओ तो उनका माल उनके हवाले कर दो और (ख़बरदार) ऐसा न करना कि इस ख़ौफ़ से कि कहीं ये बड़े हो जाएंगे फ़ुज़ूल ख़र्ची करके झटपट उनका माल चट कर जाओ और जो (जो वली या सरपरस्त) दौलतमन्द हो तो वह (माले यतीम अपने ख़र्च में लाने से) बचता रहे और (हॉ) जो मोहताज हो वह अलबत्ता (वाजिबी) दस्तूर के मुताबिक़ खा सकता है पस जब उनके माल उनके हवाले करने लगो तो लोगों को उनका गवाह बना लो और (यूं तो) हिसाब लेने को ख़ुदा काफ़ी ही है

Verse 7

لِّلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ ٱلۡوَٲلِدَانِ وَٱلۡأَقۡرَبُونَ وَلِلنِّسَآءِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ ٱلۡوَٲلِدَانِ وَٱلۡأَقۡرَبُونَ مِمَّا قَلَّ مِنۡهُ أَوۡ كَثُرَ ۚ نَصِيبًا مَّفۡرُوضًا

मॉ बाप और क़राबतदारों के तर्के में कुछ हिस्सा ख़ास मर्दों का है और उसी तरह माँ बाब और क़राबतदारो के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास औरतों का भी है ख्वाह तर्क कम हो या ज्यादा (हर शख्स का) हिस्सा (हमारी तरफ़ से) मुक़र्रर किया हुआ है

Verse 8

وَإِذَا حَضَرَ ٱلۡقِسۡمَةَ أُوْلُواْ ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَـٰمَىٰ وَٱلۡمَسَـٰڪِينُ فَٱرۡزُقُوهُم مِّنۡهُ وَقُولُواْ لَهُمۡ قَوۡلاً مَّعۡرُوفًا

और जब (तर्क की) तक़सीम के वक्त (वह) क़राबतदार (जिनका कोई हिस्सा नहीं) और यतीम बच्चे और मोहताज लोग आ जाएं तो उन्हे भी कुछ उसमें से दे दो और उसे अच्छी तरह (उनवाने शाइस्ता से) बात करो

Verse 9

وَلۡيَخۡشَ ٱلَّذِينَ لَوۡ تَرَكُواْ مِنۡ خَلۡفِهِمۡ ذُرِّيَّةً ضِعَـٰفًا خَافُواْ عَلَيۡهِمۡ فَلۡيَتَّقُواْ ٱللَّهَ وَلۡيَقُولُواْ قَوۡلاً سَدِيدًا

और उन लोगों को डरना (और ख्याल करना चाहिये) कि अगर वह लोग ख़ुद अपने बाद (नन्हे नन्हे) नातवॉ बच्चे छोड़ जाते तो उन पर (किस क़दर) तरस आता पस उनको (ग़रीब बच्चों पर सख्ती करने में) ख़ुदा से डरना चाहिये और उनसे सीधी तरह बात करना चाहिए

Verse 10

إِنَّ ٱلَّذِينَ يَأۡڪُلُونَ أَمۡوَٲلَ ٱلۡيَتَـٰمَىٰ ظُلۡمًا إِنَّمَا يَأۡڪُلُونَ فِى بُطُونِهِمۡ نَارًا‌ ۖ وَسَيَصۡلَوۡنَ سَعِيرًا

जो यतीमों के माल नाहक़ चट कर जाया करते हैं वह अपने पेट में बस अंगारे भरते हैं और अनक़रीब जहन्नुम वासिल होंगे

Verse 11

يُوصِيكُمُ ٱللَّهُ فِىٓ أَوۡلَـٰدِڪُمۡ‌ ۖ لِلذَّكَرِ مِثۡلُ حَظِّ ٱلۡأُنثَيَيۡنِ ۚ فَإِن كُنَّ نِسَآءً فَوۡقَ ٱثۡنَتَيۡنِ فَلَهُنَّ ثُلُثَا مَا تَرَكَ‌ ۖ وَإِن كَانَتۡ وَٲحِدَةً فَلَهَا ٱلنِّصۡفُ ۚ وَلِأَبَوَيۡهِ لِكُلِّ وَٲحِدٍ مِّنۡہُمَا ٱلسُّدُسُ مِمَّا تَرَكَ إِن كَانَ لَهُ ۥ وَلَدٌ ۚ فَإِن لَّمۡ يَكُن لَّهُ ۥ وَلَدٌ وَوَرِثَهُ ۥۤ أَبَوَاهُ فَلِأُمِّهِ ٱلثُّلُثُ ۚ فَإِن كَانَ لَهُ ۥۤ إِخۡوَةٌ فَلِأُمِّهِ ٱلسُّدُسُ ۚ مِنۢ بَعۡدِ وَصِيَّةٍ يُوصِى بِہَآ أَوۡ دَيۡنٍ ۗ ءَابَآؤُكُمۡ وَأَبۡنَآؤُكُمۡ لَا تَدۡرُونَ أَيُّهُمۡ أَقۡرَبُ لَكُمۡ نَفۡعًا ۚ فَرِيضَةً مِّنَ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًا

(मुसलमानों) ख़ुदा तुम्हारी औलाद के हक़ में तुमसे वसीयत करता है कि लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर है और अगर (मय्यत की) औलाद में सिर्फ लड़कियॉ ही हों (दो) या (दो) से ज्यादा तो उनका (मक़र्रर हिस्सा) कुल तर्के का दो तिहाई है और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा है और मय्यत के बाप मॉ हर एक का अगर मय्यत की कोई औलाद मौजूद न हो तो माल मुस्तरद का में से मुअय्यन (ख़ास चीज़ों में) छटा हिस्सा है और अगर मय्यत के कोई औलाद न हो और उसके सिर्फ मॉ बाप ही वारिस हों तो मॉ का मुअय्यन (ख़ास चीज़ों में) एक तिहाई हिस्सा तय है और बाक़ी बाप का लेकिन अगर मय्यत के (हक़ीक़ी और सौतेले) भाई भी मौजूद हों तो (अगरचे उन्हें कुछ न मिले) उस वक्त मॉ का हिस्सा छठा ही होगा (और वह भी) मय्यत नें जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तालीम और (अदाए) क़र्ज़ के बाद तुम्हारे बाप हों या बेटे तुम तो यह नहीं जानते हों कि उसमें कौन तुम्हारी नाफ़रमानी में ज्यादा क़रीब है (फिर तुम क्या दख़ल दे सकते हो) हिस्सा तो सिर्फ ख़ुदा की तरफ़ से मुअय्यन होता है क्योंकि ख़ुदा तो ज़रूर हर चीज़ को जानता और तदबीर वाला है

Verse 12

۞ وَلَڪُمۡ نِصۡفُ مَا تَرَكَ أَزۡوَٲجُڪُمۡ إِن لَّمۡ يَكُن لَّهُنَّ وَلَدٌ ۚ فَإِن ڪَانَ لَهُنَّ وَلَدٌ فَلَڪُمُ ٱلرُّبُعُ مِمَّا تَرَڪۡنَ ۚ مِنۢ بَعۡدِ وَصِيَّةٍ يُوصِينَ بِهَآ أَوۡ دَيۡنٍ ۚ وَلَهُنَّ ٱلرُّبُعُ مِمَّا تَرَكۡتُمۡ إِن لَّمۡ يَڪُن لَّكُمۡ وَلَدٌ ۚ فَإِن ڪَانَ لَڪُمۡ وَلَدٌ فَلَهُنَّ ٱلثُّمُنُ مِمَّا تَرَڪۡتُم ۚ مِّنۢ بَعۡدِ وَصِيَّةٍ تُوصُونَ بِهَآ أَوۡ دَيۡنٍ ۗ وَإِن كَانَ رَجُلٌ يُورَثُ ڪَلَـٰلَةً أَوِ ٱمۡرَأَةٌ وَلَهُ ۥۤ أَخٌ أَوۡ أُخۡتٌ فَلِكُلِّ وَٲحِدٍ مِّنۡهُمَا ٱلسُّدُسُ ۚ فَإِن ڪَانُوٓاْ أَڪۡثَرَ مِن ذَٲلِكَ فَهُمۡ شُرَڪَآءُ فِى ٱلثُّلُثِ ۚ مِنۢ بَعۡدِ وَصِيَّةٍ يُوصَىٰ بِہَآ أَوۡ دَيۡنٍ غَيۡرَ مُضَآرٍّ ۚ وَصِيَّةً مِّنَ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَلِيمٌ

और जो कुछ तुम्हारी बीवियां छोड़ कर (मर) जाए पस अगर उनके कोई औलाद न हो तो तुम्हारा आधा है और अगर उनके कोई औलाद हो तो जो कुछ वह तरका छोड़े उसमें से बाज़ चीज़ों में चौथाई तुम्हारा है (और वह भी) औरत ने जिसकी वसीयत की हो और (अदाए) क़र्ज़ के बाद अगर तुम्हारे कोई औलाद न हो तो तुम्हारे तरके में से तुम्हारी बीवियों का बाज़ चीज़ों में चौथाई है और अगर तुम्हारी कोई औलाद हो तो तुम्हारे तर्के में से उनका ख़ास चीज़ों में आठवॉ हिस्सा है (और वह भी) तुमने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और (अदाए) क़र्ज़ के बाद और अगर कोई मर्द या औरत अपनी मादरजिलों (ख्याली) भाई या बहन को वारिस छोड़े तो उनमें से हर एक का ख़ास चीजों में छठा हिस्सा है और अगर उससे ज्यादा हो तो सबके सब एक ख़ास तिहाई में शरीक़ रहेंगे और (ये सब) मय्यत ने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और (अदाए) क़र्ज क़े बाद मगर हॉ वह वसीयत (वारिसों को ख्वाह मख्वाह) नुक्सान पहुंचाने वाली न हो (तब) ये वसीयत ख़ुदा की तरफ़ से है और ख़ुदा तो हर चीज़ का जानने वाला और बुर्दबार है

Verse 13

تِلۡكَ حُدُودُ ٱللَّهِ ۚ وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُ ۥ يُدۡخِلۡهُ جَنَّـٰتٍ تَجۡرِى مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٲلِكَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ

यह ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुई) हदें हैं और ख़ुदा और रसूल की इताअत करे उसको ख़ुदा आख़ेरत में ऐसे (हर भरे) बाग़ों में पहुंचा देगा जिसके नीचे नहरें जारी होंगी और वह उनमें हमेशा (चैन से) रहेंगे और यही तो बड़ी कामयाबी है

Verse 14

وَمَن يَعۡصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُ ۥ وَيَتَعَدَّ حُدُودَهُ ۥ يُدۡخِلۡهُ نَارًا خَـٰلِدًا فِيهَا وَلَهُ ۥ عَذَابٌ مُّهِينٌ

और जिस शख्स से ख़ुदा व रसूल की नाफ़रमानी की और उसकी हदों से गुज़र गया तो बस ख़ुदा उसको जहन्नुम में दाख़िल करेगा

Verse 15

وَٱلَّـٰتِى يَأۡتِينَ ٱلۡفَـٰحِشَةَ مِن نِّسَآٮِٕڪُمۡ فَٱسۡتَشۡہِدُواْ عَلَيۡهِنَّ أَرۡبَعَةً مِّنڪُمۡ‌ ۖ فَإِن شَہِدُواْ فَأَمۡسِكُوهُنَّ فِى ٱلۡبُيُوتِ حَتَّىٰ يَتَوَفَّٮٰهُنَّ ٱلۡمَوۡتُ أَوۡ يَجۡعَلَ ٱللَّهُ لَهُنَّ سَبِيلاً

और वह उसमें हमेशा अपना किया भुगतता रहेगा और उसके लिए बड़ी रूसवाई का अज़ाब है और तुम्हारी औरतों में से जो औरतें बदकारी करें तो उनकी बदकारी पर अपने लोगों में से चार गवाही लो और फिर अगर चारों गवाह उसकी तसदीक़ करें तो (उसकी सज़ा ये है कि) उनको घरों में बन्द रखो यहॉ तक कि मौत आ जाए या ख़ुदा उनकी कोई (दूसरी) राह निकाले

Verse 16

وَٱلَّذَانِ يَأۡتِيَـٰنِهَا مِنڪُمۡ فَـَٔاذُوهُمَا‌ ۖ فَإِن تَابَا وَأَصۡلَحَا فَأَعۡرِضُواْ عَنۡهُمَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ ڪَانَ تَوَّابًا رَّحِيمًا

और तुम लोगों में से जिनसे बदकारी सरज़द हुई हो उनको मारो पीटो फिर अगर वह दोनों (अपनी हरकत से) तौबा करें और इस्लाह कर लें तो उनको छोड़ दो बेशक ख़ुदा बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान है

Verse 17

إِنَّمَا ٱلتَّوۡبَةُ عَلَى ٱللَّهِ لِلَّذِينَ يَعۡمَلُونَ ٱلسُّوٓءَ بِجَهَـٰلَةٍ ثُمَّ يَتُوبُونَ مِن قَرِيبٍ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ يَتُوبُ ٱللَّهُ عَلَيۡہِمۡ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَڪِيمًا

मगर ख़ुदा की बारगाह में तौबा तो सिर्फ उन्हीं लोगों की (ठीक) है जो नादानिस्ता बुरी हरकत कर बैठे (और) फिर जल्दी से तौबा कर ले तो ख़ुदा भी ऐसे लोगों की तौबा क़ुबूल कर लेता है और ख़ुदा तो बड़ा जानने वाला हकीम है

Verse 18

وَلَيۡسَتِ ٱلتَّوۡبَةُ لِلَّذِينَ يَعۡمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ حَتَّىٰٓ إِذَا حَضَرَ أَحَدَهُمُ ٱلۡمَوۡتُ قَالَ إِنِّى تُبۡتُ ٱلۡـَٔـٰنَ وَلَا ٱلَّذِينَ يَمُوتُونَ وَهُمۡ ڪُفَّارٌ ۚ أُوْلَـٰٓٮِٕكَ أَعۡتَدۡنَا لَهُمۡ عَذَابًا أَلِيمًا

और तौबा उन लोगों के लिये (मुफ़ीद) नहीं है जो (उम्र भर) तो बुरे काम करते रहे यहॉ तक कि जब उनमें से किसी के सर पर मौत आ खड़ी हुई तो कहने लगे अब मैंने तौबा की और (इसी तरह) उन लोगों के लिए (भी तौबा) मुफ़ीद नहीं है जो कुफ़्र ही की हालत में मर गये ऐसे ही लोगों के वास्ते हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है

Verse 19

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا يَحِلُّ لَكُمۡ أَن تَرِثُواْ ٱلنِّسَآءَ كَرۡهًا‌ ۖ وَلَا تَعۡضُلُوهُنَّ لِتَذۡهَبُواْ بِبَعۡضِ مَآ ءَاتَيۡتُمُوهُنَّ إِلَّآ أَن يَأۡتِينَ بِفَـٰحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ ۚ وَعَاشِرُوهُنَّ بِٱلۡمَعۡرُوفِ ۚ فَإِن كَرِهۡتُمُوهُنَّ فَعَسَىٰٓ أَن تَكۡرَهُواْ شَيْئًا وَيَجۡعَلَ ٱللَّهُ فِيهِ خَيۡرًا ڪَثِيرًا

ऐ ईमानदारों तुमको ये जायज़ नहीं कि (अपने मुरिस की) औरतों से (निकाह कर) के (ख्वाह मा ख्वाह) ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और जो कुछ तुमने उन्हें (शौहर के तर्के से) दिया है उसमें से कुछ (आपस से कुछ वापस लेने की नीयत से) उन्हें दूसरे के साथ (निकाह करने से) न रोको हॉ जब वह खुल्लम खुल्ला कोई बदकारी करें तो अलबत्ता रोकने में (मज़ाएक़ा (हर्ज)नहीं) और बीवियों के साथ अच्छा सुलूक करते रहो और अगर तुम किसी वजह से उन्हें नापसन्द करो (तो भी सब्र करो क्योंकि) अजब नहीं कि किसी चीज़ को तुम नापसन्द करते हो और ख़ुदा तुम्हारे लिए उसमें बहुत बेहतरी कर दे

Verse 20

وَإِنۡ أَرَدتُّمُ ٱسۡتِبۡدَالَ زَوۡجٍ مَّڪَانَ زَوۡجٍ وَءَاتَيۡتُمۡ إِحۡدَٮٰهُنَّ قِنطَارًا فَلَا تَأۡخُذُواْ مِنۡهُ شَيْئًا ۚ أَتَأۡخُذُونَهُ ۥ بُهۡتَـٰنًا وَإِثۡمًا مُّبِينًا

और अगर तुम एक बीवी (को तलाक़ देकर उस) की जगह दूसरी बीवी (निकाह करके) तबदील करना चाहो तो अगरचे तुम उनमें से एक को (जिसे तलाक़ देना चाहते हो) बहुत सा माल दे चुके हो तो तुम उनमें से कुछ (वापस न लो) क्या तुम्हारी यही गैरत है कि (ख्वाह मा ख्वाह) बोहतान बॉधकर या सरीही जुर्म लगाकर वापस ले लो

Verse 21

وَكَيۡفَ تَأۡخُذُونَهُ ۥ وَقَدۡ أَفۡضَىٰ بَعۡضُڪُمۡ إِلَىٰ بَعۡضٍ وَأَخَذۡنَ مِنڪُم مِّيثَـٰقًا غَلِيظًا

और क्या तुम उसको (वापस लोगे हालॉकि तुममें से) एक दूसरे के साथ ख़िलवत कर चुका है और बीवियॉ तुमसे (निकाह के वक्त नुक़फ़ा वगैरह का) पक्का क़रार ले चुकी हैं

Verse 22

وَلَا تَنكِحُواْ مَا نَكَحَ ءَابَآؤُڪُم مِّنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا قَدۡ سَلَفَ ۚ إِنَّهُ ۥ ڪَانَ فَـٰحِشَةً وَمَقۡتًا وَسَآءَ سَبِيلاً

और जिन औरतों से तुम्हारे बाप दादाओं से (निकाह) जमाअ (अगरचे ज़िना) किया हो तुम उनसे निकाह न करो मगर जो हो चुका (वह तो हो चुका) वह बदकारी और ख़ुदा की नाख़ुशी की बात ज़रूर थी और बहुत बुरा तरीक़ा था

Verse 23

حُرِّمَتۡ عَلَيۡڪُمۡ أُمَّهَـٰتُكُمۡ وَبَنَاتُكُمۡ وَأَخَوَٲتُڪُمۡ وَعَمَّـٰتُكُمۡ وَخَـٰلَـٰتُكُمۡ وَبَنَاتُ ٱلۡأَخِ وَبَنَاتُ ٱلۡأُخۡتِ وَأُمَّهَـٰتُڪُمُ ٱلَّـٰتِىٓ أَرۡضَعۡنَكُمۡ وَأَخَوَٲتُڪُم مِّنَ ٱلرَّضَـٰعَةِ وَأُمَّهَـٰتُ نِسَآٮِٕكُمۡ وَرَبَـٰٓٮِٕبُڪُمُ ٱلَّـٰتِى فِى حُجُورِڪُم مِّن نِّسَآٮِٕكُمُ ٱلَّـٰتِى دَخَلۡتُم بِهِنَّ فَإِن لَّمۡ تَكُونُواْ دَخَلۡتُم بِهِنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡڪُمۡ وَحَلَـٰٓٮِٕلُ أَبۡنَآٮِٕڪُمُ ٱلَّذِينَ مِنۡ أَصۡلَـٰبِڪُمۡ وَأَن تَجۡمَعُواْ بَيۡنَ ٱلۡأُخۡتَيۡنِ إِلَّا مَا قَدۡ سَلَفَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا

(मुसलमानों हसबे जेल) औरतें तुम पर हराम की गयी हैं तुम्हारी माएं (दादी नानी वगैरह सब) और तुम्हारी बेटियॉ (पोतियॉ) नवासियॉ (वगैरह) और तुम्हारी बहनें और तुम्हारी फुफियॉ और तुम्हारी ख़ालाएं और भतीजियॉ और भंजियॉ और तुम्हारी वह माएं जिन्होंने तुमको दूध पिलाया है और तुम्हारी रज़ाई (दूध शरीक) बहनें और तुम्हारी बीवीयों की माँए और वह (मादर ज़िलो) लड़कियां जो तुम्हारी गोद में परवरिश पा चुकी हो और उन औरतों (के पेट) से (पैदा हुई) हैं जिनसे तुम हमबिस्तरी कर चुके हो हाँ अगर तुमने उन बीवियों से (सिर्फ निकाह किया हो) हमबिस्तरी न की तो अलबत्ता उन मादरज़िलों (लड़कियों से) निकाह (करने में) तुम पर कुछ गुनाह नहीं है और तुम्हारे सुलबी लड़को (पोतों नवासों वगैरह) की बीवियॉ (बहुएं) और दो बहनों से एक साथ निकाह करना मगर जो हो चुका (वह माफ़ है) बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

Verse 24

۞ وَٱلۡمُحۡصَنَـٰتُ مِنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا مَلَكَتۡ أَيۡمَـٰنُڪُمۡ‌ ۖ كِتَـٰبَ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ ۚ وَأُحِلَّ لَكُم مَّا وَرَآءَ ذَٲلِڪُمۡ أَن تَبۡتَغُواْ بِأَمۡوَٲلِكُم مُّحۡصِنِينَ غَيۡرَ مُسَـٰفِحِينَ ۚ فَمَا ٱسۡتَمۡتَعۡتُم بِهِۦ مِنۡہُنَّ فَـَٔاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةً ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ فِيمَا تَرَٲضَيۡتُم بِهِۦ مِنۢ بَعۡدِ ٱلۡفَرِيضَةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًا

और शौहरदार औरतें मगर वह औरतें जो (जिहाद में कुफ्फ़ार से) तुम्हारे कब्ज़े में आ जाएं हराम नहीं (ये) ख़ुदा का तहरीरी हुक्म (है जो) तुमपर (फ़र्ज़ किया गया) है और उन औरतों के सिवा (और औरतें) तुम्हारे लिए जायज़ हैं बशर्ते कि बदकारी व ज़िना नहीं बल्कि तुम इफ्फ़त या पाकदामिनी की ग़रज़ से अपने माल (व मेहर) के बदले (निकाह करना) चाहो हॉ जिन औरतों से तुमने मुताअ किया हो तो उन्हें जो मेहर मुअय्यन किया है दे दो और मेहर के मुक़र्रर होने के बाद अगर आपस में (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमें तुमपर कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और मसलेहतों का पहचानने वाला है

Verse 25

وَمَن لَّمۡ يَسۡتَطِعۡ مِنكُمۡ طَوۡلاً أَن يَنڪِحَ ٱلۡمُحۡصَنَـٰتِ ٱلۡمُؤۡمِنَـٰتِ فَمِن مَّا مَلَكَتۡ أَيۡمَـٰنُكُم مِّن فَتَيَـٰتِكُمُ ٱلۡمُؤۡمِنَـٰتِ ۚ وَٱللَّهُ أَعۡلَمُ بِإِيمَـٰنِكُم ۚ بَعۡضُكُم مِّنۢ بَعۡضٍ ۚ فَٱنكِحُوهُنَّ بِإِذۡنِ أَهۡلِهِنَّ وَءَاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ بِٱلۡمَعۡرُوفِ مُحۡصَنَـٰتٍ غَيۡرَ مُسَـٰفِحَـٰتٍ وَلَا مُتَّخِذَٲتِ أَخۡدَانٍ ۚ فَإِذَآ أُحۡصِنَّ فَإِنۡ أَتَيۡنَ بِفَـٰحِشَةٍ فَعَلَيۡہِنَّ نِصۡفُ مَا عَلَى ٱلۡمُحۡصَنَـٰتِ مِنَ ٱلۡعَذَابِ ۚ ذَٲلِكَ لِمَنۡ خَشِىَ ٱلۡعَنَتَ مِنكُمۡ ۚ وَأَن تَصۡبِرُواْ خَيۡرٌ لَّكُمۡ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ

और तुममें से जो शख्स आज़ाद इफ्फ़तदार औरतों से निकाह करने की माली हैसियत से क़ुदरत न रखता हो तो वह तुम्हारी उन मोमिना लौन्डियों से जो तुम्हारे कब्ज़े में हैं निकाह कर सकता है और ख़ुदा तुम्हारे ईमान से ख़ूब वाक़िफ़ है (ईमान की हैसियत से तो) तुममें एक दूसरे का हमजिन्स है पस (बे ताम्मुल) उनके मालिकों की इजाज़त से लौन्डियों से निकाह करो और उनका मेहर हुस्ने सुलूक से दे दो मगर उन्हीं (लौन्डियो) से निकाह करो जो इफ्फ़त के साथ तुम्हारी पाबन्द रहें न तो खुले आम ज़िना करना चाहें और न चोरी छिपे से आशनाई फिर जब तुम्हारी पाबन्द हो चुकी उसके बाद कोई बदकारी करे तो जो सज़ा आज़ाद बीवियों को दी जाती है उसकी आधी (सज़ा) लौन्डियों को दी जाएगी (और लौन्डियों) से निकाह कर भी सकता है तो वह शख्स जिसको ज़िना में मुब्तिला हो जाने का ख़ौफ़ हो और सब्र करे तो तुम्हारे हक़ में ज्यादा बेहतर है और ख़ुदा बख्शने वाला मेहरबान है

Verse 26

يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُبَيِّنَ لَكُمۡ وَيَہۡدِيَڪُمۡ سُنَنَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِڪُمۡ وَيَتُوبَ عَلَيۡكُمۡ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ

ख़ुदा तो ये चाहता है कि (अपने) एहकाम तुम लोगों से साफ़ साफ़ बयान कर दे और जो (अच्छे) लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनके तरीक़े पर चला दे और तुम्हारी तौबा कुबूल करे और ख़ुदा तो (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और हिकमत वाला है

Verse 27

وَٱللَّهُ يُرِيدُ أَن يَتُوبَ عَلَيۡڪُمۡ وَيُرِيدُ ٱلَّذِينَ يَتَّبِعُونَ ٱلشَّہَوَٲتِ أَن تَمِيلُواْ مَيۡلاً عَظِيمًا

और ख़ुदा तो चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़ुबूल

Verse 28

يُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُخَفِّفَ عَنكُمۡ ۚ وَخُلِقَ ٱلۡإِنسَـٰنُ ضَعِيفًا

करे और जो लोग नफ़सियानी ख्वाहिश के पीछे पडे हैं वह ये चाहते हैं कि तुम लोग (राहे हक़ से) बहुत दूर हट जाओ और ख़ुदा चाहता है कि तुमसे बार में तख़फ़ीफ़ कर दें क्योंकि आदमी तो बहुत कमज़ोर पैदा किया गया है

Verse 29

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَأۡڪُلُوٓاْ أَمۡوَٲلَكُم بَيۡنَڪُم بِٱلۡبَـٰطِلِ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَـٰرَةً عَن تَرَاضٍ مِّنكُمۡ ۚ وَلَا تَقۡتُلُوٓاْ أَنفُسَكُمۡ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُمۡ رَحِيمًا

ए ईमानवालों आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खा जाया करो लेकिन (हॉ) तुम लोगों की बाहमी रज़ामन्दी से तिजारत हो (और उसमें एक दूसरे का माल हो तो मुज़ाएक़ा नहीं) और अपना गला आप घूंट के अपनी जान न दो (क्योंकि) ख़ुदा तो ज़रूर तुम्हारे हाल पर मेहरबान है

Verse 30

وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٲلِكَ عُدۡوَٲنًا وَظُلۡمًا فَسَوۡفَ نُصۡلِيهِ نَارًا ۚ وَڪَانَ ذَٲلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًا

और जो शख्स जोरो ज़ुल्म से नाहक़ ऐसा करेगा (ख़ुदकुशी करेगा) तो (याद रहे कि) हम बहुत जल्द उसको जहन्नुम की आग में झोंक देंगे यह ख़ुदा के लिये आसान है

Verse 31

إِن تَجۡتَنِبُواْ ڪَبَآٮِٕرَ مَا تُنۡہَوۡنَ عَنۡهُ نُكَفِّرۡ عَنكُمۡ سَيِّـَٔاتِكُمۡ وَنُدۡخِلۡڪُم مُّدۡخَلاً كَرِيمًا

जिन कामों की तुम्हें मनाही की जाती है अगर उनमें से तुम गुनाहे कबीरा से बचते रहे तो हम तुम्हारे (सग़ीरा) गुनाहों से भी दरगुज़र करेंगे और तुमको बहुत अच्छी इज्ज़त की जगह पहुंचा देंगे

Verse 32

وَلَا تَتَمَنَّوۡاْ مَا فَضَّلَ ٱللَّهُ بِهِۦ بَعۡضَكُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٍ ۚ لِّلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِّمَّا ٱڪۡتَسَبُواْ‌ ۖ وَلِلنِّسَآءِ نَصِيبٌ مِّمَّا ٱكۡتَسَبۡنَ ۚ وَسۡـَٔلُواْ ٱللَّهَ مِن فَضۡلِهِۦۤ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ ڪَانَ بِكُلِّ شَىۡءٍ عَلِيمًا

और ख़ुदा ने जो तुममें से एक दूसरे पर तरजीह दी है उसकी हवस न करो (क्योंकि फ़ज़ीलत तो आमाल से है) मर्दो को अपने किए का हिस्सा है और औरतों को अपने किए का हिस्सा और ये और बात है कि तुम ख़ुदा से उसके फज़ल व करम की ख्वाहिश करो ख़ुदा तो हर चीज़े से वाक़िफ़ है

Verse 33

وَلِڪُلٍّ جَعَلۡنَا مَوَٲلِىَ مِمَّا تَرَكَ ٱلۡوَٲلِدَانِ وَٱلۡأَقۡرَبُونَ ۚ وَٱلَّذِينَ عَقَدَتۡ أَيۡمَـٰنُڪُمۡ فَـَٔاتُوهُمۡ نَصِيبَہُمۡ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ ڪَانَ عَلَىٰ ڪُلِّ شَىۡءٍ شَهِيدًا

और मां बाप (या) और क़राबतदार (ग़रज़) तो शख्स जो तरका छोड़ जाए हमने हर एक का (वाली) वारिस मुक़र्रर कर दिया है और जिन लोगों से तुमने मुस्तहकम (पक्का) एहद किया है उनका मुक़र्रर हिस्सा भी तुम दे दो बेशक ख़ुदा तो हर चीज़ पर गवाह है

Verse 34

ٱلرِّجَالُ قَوَّٲمُونَ عَلَى ٱلنِّسَآءِ بِمَا فَضَّلَ ٱللَّهُ بَعۡضَهُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٍ وَبِمَآ أَنفَقُواْ مِنۡ أَمۡوَٲلِهِمۡ ۚ فَٱلصَّـٰلِحَـٰتُ قَـٰنِتَـٰتٌ حَـٰفِظَـٰتٌ لِّلۡغَيۡبِ بِمَا حَفِظَ ٱللَّهُ ۚ وَٱلَّـٰتِى تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَٱهۡجُرُوهُنَّ فِى ٱلۡمَضَاجِعِ وَٱضۡرِبُوهُنَّ‌ ۖ فَإِنۡ أَطَعۡنَڪُمۡ فَلَا تَبۡغُواْ عَلَيۡہِنَّ سَبِيلاً ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيًّا ڪَبِيرًا

मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि (एक तो) ख़ुदा ने बाज़ आदमियों (मर्द) को बाज़ अदमियों (औरत) पर फ़ज़ीलत दी है और (इसके अलावा) चूंकि मर्दो ने औरतों पर अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं (और) उनके पीठ पीछे जिस तरह ख़ुदा ने हिफ़ाज़त की वह भी (हर चीज़ की) हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो मगर इतना कि खून न निकले और कोई अज़ो न (टूटे) पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाएं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूंढो ख़ुदा तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग़ है

Verse 35

وَإِنۡ خِفۡتُمۡ شِقَاقَ بَيۡنِہِمَا فَٱبۡعَثُواْ حَكَمًا مِّنۡ أَهۡلِهِۦ وَحَكَمًا مِّنۡ أَهۡلِهَآ إِن يُرِيدَآ إِصۡلَـٰحًا يُوَفِّقِ ٱللَّهُ بَيۡنَہُمَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا خَبِيرًا

और ऐ हुक्काम (वक्त) अगर तुम्हें मियॉ बीवी की पूरी नाइत्तेफ़ाक़ी का तरफैन से अन्देशा हो तो एक सालिस (पन्च) मर्द के कुनबे में से एक और सालिस औरत के कुनबे में मुक़र्रर करो अगर ये दोनों सालिस दोनों में मेल करा देना चाहें तो ख़ुदा उन दोनों के दरमियान उसका अच्छा बन्दोबस्त कर देगा ख़ुदा तो बेशक वाक़िफ व ख़बरदार है

Verse 36

۞ وَٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَلَا تُشۡرِكُواْ بِهِۦ شَيْئًا‌ ۖ وَبِٱلۡوَٲلِدَيۡنِ إِحۡسَـٰنًا وَبِذِى ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَـٰمَىٰ وَٱلۡمَسَـٰكِينِ وَٱلۡجَارِ ذِى ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡجَارِ ٱلۡجُنُبِ وَٱلصَّاحِبِ بِٱلۡجَنۢبِ وَٱبۡنِ ٱلسَّبِيلِ وَمَا مَلَكَتۡ أَيۡمَـٰنُكُمۡ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن ڪَانَ مُخۡتَالاً فَخُورًا

और ख़ुदा ही की इबादत करो और किसी को उसका शरीक न बनाओ और मॉ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और रिश्तेदार पड़ोसियों और अजनबी पड़ोसियों और पहलू में बैठने वाले मुसाहिबों और पड़ोसियों और ज़र ख़रीद लौन्डी और गुलाम के साथ एहसान करो बेशक ख़ुदा अकड़ के चलने वालों और शेख़ीबाज़ों को दोस्त नहीं रखता

Verse 37

ٱلَّذِينَ يَبۡخَلُونَ وَيَأۡمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلۡبُخۡلِ وَيَڪۡتُمُونَ مَآ ءَاتَٮٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦ ۗ وَأَعۡتَدۡنَا لِلۡڪَـٰفِرِينَ عَذَابًا مُّهِينًا

ये वह लोग हैं जो ख़ुद तो बुख्ल करते ही हैं और लोगों को भी बुख्ल का हुक्म देते हैं और जो माल ख़ुदा ने अपने फ़ज़ल व (करम) से उन्हें दिया है उसे छिपाते हैं और हमने तो कुफ़राने नेअमत करने वालों के वास्ते सख्त ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है

Verse 38

وَٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمۡوَٲلَهُمۡ رِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَلَا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأَخِرِ ۗ وَمَن يَكُنِ ٱلشَّيۡطَـٰنُ لَهُ ۥ قَرِينًا فَسَآءَ قَرِينًا

और जो लोग महज़ लोगों को दिखाने के वास्ते अपने माल ख़र्च करते हैं और न खुदा ही पर ईमान रखते हैं और न रोजे आख़ेरत पर ख़ुदा भी उनके साथ नहीं क्योंकि उनका साथी तो शैतान है और जिसका साथी शैतान हो तो क्या ही बुरा साथी है

Verse 39

وَمَاذَا عَلَيۡہِمۡ لَوۡ ءَامَنُواْ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأَخِرِ وَأَنفَقُواْ مِمَّا رَزَقَهُمُ ٱللَّهُ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِهِمۡ عَلِيمًا

अगर ये लोग ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाते और जो कुछ ख़ुदा ने उन्हें दिया है उसमें से राहे ख़ुदा में ख़र्च करते तो उन पर क्या आफ़त आ जाती और ख़ुदा तो उनसे ख़ूब वाक़िफ़ है

Verse 40

إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَظۡلِمُ مِثۡقَالَ ذَرَّةٍ‌ ۖ وَإِن تَكُ حَسَنَةً يُضَـٰعِفۡهَا وَيُؤۡتِ مِن لَّدُنۡهُ أَجۡرًا عَظِيمًا

ख़ुदा तो हरगिज़ ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं करता बल्कि अगर ज़र्रा बराबर भी किसी की कोई नेकी हो तो उसको दूना करता है और अपनी तरफ़ से बड़ा सवाब अता फ़रमाता है

Verse 41

فَكَيۡفَ إِذَا جِئۡنَا مِن كُلِّ أُمَّةِۭ بِشَهِيدٍ وَجِئۡنَا بِكَ عَلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ شَہِيدًا

(ख़ैर दुनिया में तो जो चाहे करें) भला उस वक्त क्या हाल होगा जब हम हर गिरोह के गवाह तलब करेंगे और (मोहम्मद) तुमको उन सब पर गवाह की हैसियत में तलब करेंगे

Verse 42

يَوۡمَٮِٕذٍ يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَعَصَوُاْ ٱلرَّسُولَ لَوۡ تُسَوَّىٰ بِہِمُ ٱلۡأَرۡضُ وَلَا يَكۡتُمُونَ ٱللَّهَ حَدِيثًا

उस दिन जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया और रसूल की नाफ़रमानी की ये आरज़ू करेंगे कि काश (वह पेवन्दे ख़ाक हो जाते) और उनके ऊपर से ज़मीन बराबर कर दी जाती और अफ़सोस ये लोग ख़ुदा से कोई बात उस दिन छुपा भी न सकेंगे

Verse 43

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَقۡرَبُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنتُمۡ سُكَـٰرَىٰ حَتَّىٰ تَعۡلَمُواْ مَا تَقُولُونَ وَلَا جُنُبًا إِلَّا عَابِرِى سَبِيلٍ حَتَّىٰ تَغۡتَسِلُواْ ۚ وَإِن كُنتُم مَّرۡضَىٰٓ أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوۡ جَآءَ أَحَدٌ مِّنكُم مِّنَ ٱلۡغَآٮِٕطِ أَوۡ لَـٰمَسۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَلَمۡ تَجِدُواْ مَآءً فَتَيَمَّمُواْ صَعِيدًا طَيِّبًا فَٱمۡسَحُواْ بِوُجُوهِكُمۡ وَأَيۡدِيكُمۡ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَفُوًّا غَفُورًا

ऐ ईमानदारों तुम नशे की हालत में नमाज़ के क़रीब न जाओ ताकि तुम जो कुछ मुंह से कहो समझो भी तो और न जिनाबत की हालत में यहॉ तक कि ग़ुस्ल कर लो मगर राह गुज़र में हो (और गुस्ल मुमकिन नहीं है तो अलबत्ता ज़रूरत नहीं) बल्कि अगर तुम मरीज़ हो और पानी नुक़सान करे या सफ़र में हो तुममें से किसी का पैख़ाना निकल आए या औरतों से सोहबत की हो और तुमको पानी न मयस्सर हो (कि तहारत करो) तो पाक मिट्टी पर तैमूम कर लो और (उस का तरीक़ा ये है कि) अपने मुंह और हाथों पर मिट्टी भरा हाथ फेरो तो बेशक ख़ुदा माफ़ करने वाला है (और) बख्श ने वाला है

Verse 44

أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُواْ نَصِيبًا مِّنَ ٱلۡكِتَـٰبِ يَشۡتَرُونَ ٱلضَّلَـٰلَةَ وَيُرِيدُونَ أَن تَضِلُّواْ ٱلسَّبِيلَ

(ऐ रसूल) क्या तूमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जिन्हें किताबे ख़ुदा का कुछ हिस्सा दिया गया था (मगर) वह लोग (हिदायत के बदले) गुमराही ख़रीदने लगे उनकी ऐन मुराद यह है कि तुम भी राहे रास्त से बहक जाओ

Verse 45

وَٱللَّهُ أَعۡلَمُ بِأَعۡدَآٮِٕكُمۡ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَلِيًّا وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ نَصِيرًا

और ख़ुदा तुम्हारे दुशमनों से ख़ूब वाक़िफ़ है और दोस्ती के लिए बस ख़ुदा काफ़ी है और हिमायत के वास्ते भी ख़ुदा ही काफ़ी है

Verse 46

مِّنَ ٱلَّذِينَ هَادُواْ يُحَرِّفُونَ ٱلۡكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِۦ وَيَقُولُونَ سَمِعۡنَا وَعَصَيۡنَا وَٱسۡمَعۡ غَيۡرَ مُسۡمَعٍ وَرَٲعِنَا لَيَّۢا بِأَلۡسِنَتِہِمۡ وَطَعۡنًا فِى ٱلدِّينِ ۚ وَلَوۡ أَنَّہُمۡ قَالُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَا وَٱسۡمَعۡ وَٱنظُرۡنَا لَكَانَ خَيۡرًا لَّهُمۡ وَأَقۡوَمَ وَلَـٰكِن لَّعَنَہُمُ ٱللَّهُ بِكُفۡرِهِمۡ فَلَا يُؤۡمِنُونَ إِلَّا قَلِيلاً

(ऐ रसूल) यहूद से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बातों में उनके महल व मौक़े से हेर फेर डाल देते हैं और अपनी ज़बानों को मरोड़कर और दीन पर तानाज़नी की राह से तुमसे समेअना व असैना (हमने सुना और नाफ़रमानी की) और वसमअ गैरा मुसमइन (तुम मेरी सुनो ख़ुदा तुमको न सुनवाए) राअना मेरा ख्याल करो मेरे चरवाहे कहा करते हैं और अगर वह इसके बदले समेअना व अताअना (हमने सुना और माना) और इसमाआ (मेरी सुनो) और (राअना) के एवज़ उनजुरना (हमपर निगाह रख) कहते तो उनके हक़ में कहीं बेहतर होता और बिल्कुल सीधी बात थी मगर उनपर तो उनके कुफ़्र की वजह से ख़ुदा की फ़िटकार है

Verse 47

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَـٰبَ ءَامِنُواْ بِمَا نَزَّلۡنَا مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَكُم مِّن قَبۡلِ أَن نَّطۡمِسَ وُجُوهًا فَنَرُدَّهَا عَلَىٰٓ أَدۡبَارِهَآ أَوۡ نَلۡعَنَہُمۡ كَمَا لَعَنَّآ أَصۡحَـٰبَ ٱلسَّبۡتِ ۚ وَكَانَ أَمۡرُ ٱللَّهِ مَفۡعُولاً

पस उनमें से चन्द लोगों के सिवा और लोग ईमान ही न लाएंगे ऐ अहले किताब जो (किताब) हमने नाज़िल की है और उस (किताब) की भी तस्दीक़ करती है जो तुम्हारे पास है उस पर ईमान लाओ मगर क़ब्ल इसके कि हम कुछ लोगों के चेहरे बिगाड़कर उनके पुश्त की तरफ़ फेर दें या जिस तरह हमने असहाबे सबत (हफ्ते वालों) पर फिटकार बरसायी वैसी ही फिटकार उनपर भी करें

Verse 48

إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغۡفِرُ أَن يُشۡرَكَ بِهِۦ وَيَغۡفِرُ مَا دُونَ ذَٲلِكَ لِمَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُشۡرِكۡ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱفۡتَرَىٰٓ إِثۡمًا عَظِيمًا

और ख़ुदा का हुक्म किया कराया हुआ काम समझो ख़ुदा उस जुर्म को तो अलबत्ता नहीं माफ़ करता कि उसके साथ शिर्क किया जाए हॉ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे माफ़ कर दे और जिसने (किसी को) ख़ुदा का शरीक बनाया तो उसने बड़े गुनाह का तूफान बॉधा

Verse 49

أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يُزَكُّونَ أَنفُسَہُم ۚ بَلِ ٱللَّهُ يُزَكِّى مَن يَشَآءُ وَلَا يُظۡلَمُونَ فَتِيلاً

(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जो आप बड़े मुक़द्दस बनते हैं (मगर उससे क्या होता है) बल्कि ख़ुदा जिसे चाहता है मुक़द्दस बनाता है और ज़ुल्म तो किसी पर धागे के बराबर हो ही गा नहीं

Verse 50

ٱنظُرۡ كَيۡفَ يَفۡتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ‌ ۖ وَكَفَىٰ بِهِۦۤ إِثۡمًا مُّبِينًا

(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो ये लोग ख़ुदा पर कैसे कैसे झूठ तूफ़ान जोड़ते हैं और खुल्लम खुल्ला गुनाह के वास्ते तो यही काफ़ी है

Verse 51

أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُواْ نَصِيبًا مِّنَ ٱلۡڪِتَـٰبِ يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡجِبۡتِ وَٱلطَّـٰغُوتِ وَيَقُولُونَ لِلَّذِينَ كَفَرُواْ هَـٰٓؤُلَآءِ أَهۡدَىٰ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ سَبِيلاً

(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के (हाल पर) नज़र नहीं की जिन्हें किताबे ख़ुदा का कुछ हिस्सा दिया गया था और (फिर) शैतान और बुतों का कलमा पढ़ने लगे और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया है उनकी निस्बत कहने लगे कि ये तो ईमान लाने वालों से ज्यादा राहे रास्त पर हैं

Verse 52

أُوْلَـٰٓٮِٕكَ ٱلَّذِينَ لَعَنَہُمُ ٱللَّهُ‌ ۖ وَمَن يَلۡعَنِ ٱللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ ۥ نَصِيرًا

(ऐ रसूल) यही वह लोग हैं जिनपर ख़ुदा ने लानत की है और जिस पर ख़ुदा ने लानत की है तुम उनका मददगार हरगिज़ किसी को न पाओगे

Verse 53

أَمۡ لَهُمۡ نَصِيبٌ مِّنَ ٱلۡمُلۡكِ فَإِذًا لَّا يُؤۡتُونَ ٱلنَّاسَ نَقِيرًا

क्या (दुनिया) की सल्तनत में कुछ उनका भी हिस्सा है कि इस वजह से लोगों को भूसी भर भी न देंगे

Verse 54

أَمۡ يَحۡسُدُونَ ٱلنَّاسَ عَلَىٰ مَآ ءَاتَٮٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦ‌ ۖ فَقَدۡ ءَاتَيۡنَآ ءَالَ إِبۡرَٲهِيمَ ٱلۡكِتَـٰبَ وَٱلۡحِكۡمَةَ وَءَاتَيۡنَـٰهُم مُّلۡكًا عَظِيمًا

या ख़ुदा ने जो अपने फ़ज़ल से (तुम) लोगों को (कुरान) अता फ़रमाया है इसके रश्क पर चले जाते हैं (तो उसका क्या इलाज है) हमने तो इबराहीम की औलाद को किताब और अक्ल की बातें अता फ़रमायी हैं और उनको बहुत बड़ी सल्तनत भी दी

Verse 55

فَمِنۡہُم مَّنۡ ءَامَنَ بِهِۦ وَمِنۡہُم مَّن صَدَّ عَنۡهُ ۚ وَكَفَىٰ بِجَهَنَّمَ سَعِيرًا

फिर कुछ लोग तो इस (किताब) पर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उससे इन्कार किया और इसकी सज़ा के लिए जहन्नुम की दहकती हुई आग काफ़ी है

Verse 56

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بِـَٔايَـٰتِنَا سَوۡفَ نُصۡلِيہِمۡ نَارًا كُلَّمَا نَضِجَتۡ جُلُودُهُم بَدَّلۡنَـٰهُمۡ جُلُودًا غَيۡرَهَا لِيَذُوقُواْ ٱلۡعَذَابَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَزِيزًا حَكِيمًا

(याद रहे) कि जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया उन्हें ज़रूर अनक़रीब जहन्नुम की आग में झोंक देंगे (और जब उनकी खालें जल कर) जल जाएंगी तो हम उनके लिए दूसरी खालें बदल कर पैदा करे देंगे ताकि वह अच्छी तरह अज़ाब का मज़ा चखें बेशक ख़ुदा हरचीज़ पर ग़ालिब और हिकमत वाला है

Verse 57

وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ سَنُدۡخِلُهُمۡ جَنَّـٰتٍ تَجۡرِى مِن تَحۡتِہَا ٱلۡأَنۡہَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيہَآ أَبَدًا‌ ۖ لَّهُمۡ فِيہَآ أَزۡوَٲجٌ مُّطَهَّرَةٌ‌ ۖ وَنُدۡخِلُهُمۡ ظِلاًّ ظَلِيلاً

और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम किए हम उनको अनक़रीब ही (बेहिश्त के) ऐसे ऐसे (हरे भरे) बाग़ों में जा पहुंचाएंगे जिन के नीचे नहरें जारी होंगी और उनमें हमेशा रहेंगे वहां उनकी साफ़ सुथरी बीवियॉ होंगी और उन्हे घनी छॉव में ले जाकर रखेंगे

Verse 58

۞ إِنَّ ٱللَّهَ يَأۡمُرُكُمۡ أَن تُؤَدُّواْ ٱلۡأَمَـٰنَـٰتِ إِلَىٰٓ أَهۡلِهَا وَإِذَا حَكَمۡتُم بَيۡنَ ٱلنَّاسِ أَن تَحۡكُمُواْ بِٱلۡعَدۡلِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ نِعِمَّا يَعِظُكُم بِهِۦۤ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ سَمِيعَۢا بَصِيرًا

ऐ ईमानदारों ख़ुदा तुम्हें हुक्म देता है कि लोगों की अमानतें अमानत रखने वालों के हवाले कर दो और जब लोगों के बाहमी झगड़ों का फैसला करने लगो तो इन्साफ़ से फैसला करो (ख़ुदा तुमको) इसकी क्या ही अच्छी नसीहत करता है इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा सबकी सुनता है (और सब कुछ) देखता है

Verse 59

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَأَطِيعُواْ ٱلرَّسُولَ وَأُوْلِى ٱلۡأَمۡرِ مِنكُمۡ‌ ۖ فَإِن تَنَـٰزَعۡتُمۡ فِى شَىۡءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمۡ تُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأَخِرِ ۚ ذَٲلِكَ خَيۡرٌ وَأَحۡسَنُ تَأۡوِيلاً

ऐ ईमानदारों ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की और जो तुममें से साहेबाने हुकूमत हों उनकी इताअत करो और अगर तुम किसी बात में झगड़ा करो पस अगर तुम ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हो तो इस अम्र में ख़ुदा और रसूल की तरफ़ रूजू करो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अन्जाम की राह से बहुत अच्छा है

Verse 60

أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يَزۡعُمُونَ أَنَّهُمۡ ءَامَنُواْ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبۡلِكَ يُرِيدُونَ أَن يَتَحَاكَمُوٓاْ إِلَى ٱلطَّـٰغُوتِ وَقَدۡ أُمِرُوٓاْ أَن يَكۡفُرُواْ بِهِۦ وَيُرِيدُ ٱلشَّيۡطَـٰنُ أَن يُضِلَّهُمۡ ضَلَـٰلاَۢ بَعِيدًا

(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों की (हालत) पर नज़र नहीं की जो ये ख्याली पुलाओ पकाते हैं कि जो किताब तुझ पर नाज़िल की गयी और जो किताबें तुम से पहले नाज़िल की गयी (सब पर ईमान है) लाए और दिली तमन्ना ये है कि सरकशों को अपना हाकिम बनाएं हालॉकि उनको हुक्म दिया गया कि उसकी बात न मानें और शैतान तो यह चाहता है कि उन्हें बहका के बहुत दूर ले जाए

Verse 61

وَإِذَا قِيلَ لَهُمۡ تَعَالَوۡاْ إِلَىٰ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ وَإِلَى ٱلرَّسُولِ رَأَيۡتَ ٱلۡمُنَـٰفِقِينَ يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُودًا

और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा ने जो किताब नाज़िल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफ़िक़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुंह फेर लेते हैं

Verse 62

فَكَيۡفَ إِذَآ أَصَـٰبَتۡهُم مُّصِيبَةُۢ بِمَا قَدَّمَتۡ أَيۡدِيهِمۡ ثُمَّ جَآءُوكَ يَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ إِنۡ أَرَدۡنَآ إِلَّآ إِحۡسَـٰنًا وَتَوۡفِيقًا

कि जब उनपर उनके करतूत की वजह से कोई मुसीबत पड़ती है तो क्योंकर तुम्हारे पास ख़ुदा की क़समें खाते हैं कि हमारा मतलब नेकी और मेल मिलाप के सिवा कुछ न था ये वह लोग हैं कि कुछ ख़ुदा ही उनके दिल की हालत ख़ूब जानता है

Verse 63

أُوْلَـٰٓٮِٕكَ ٱلَّذِينَ يَعۡلَمُ ٱللَّهُ مَا فِى قُلُوبِہِمۡ فَأَعۡرِضۡ عَنۡہُمۡ وَعِظۡهُمۡ وَقُل لَّهُمۡ فِىٓ أَنفُسِہِمۡ قَوۡلاَۢ بَلِيغًا

पस तुम उनसे दरगुज़र करो और उनको नसीहत करो और उनसे उनके दिल में असर करने वाली बात कहो और हमने कोई रसूल नहीं भेजा मगर इस वास्ते कि ख़ुदा के हुक्म से लोग उसकी इताअत करें

Verse 64

وَمَآ أَرۡسَلۡنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا لِيُطَاعَ بِإِذۡنِ ٱللَّهِ ۚ وَلَوۡ أَنَّهُمۡ إِذ ظَّلَمُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ جَآءُوكَ فَٱسۡتَغۡفَرُواْ ٱللَّهَ وَٱسۡتَغۡفَرَ لَهُمُ ٱلرَّسُولُ لَوَجَدُواْ ٱللَّهَ تَوَّابًا رَّحِيمًا

और (रसूल) जब उन लोगों ने (नाफ़रमानी करके) अपनी जानों पर जुल्म किया था अगर तुम्हारे पास चले आते और ख़ुदा से माफ़ी मॉगते और रसूल (तुम) भी उनकी मग़फ़िरत चाहते तो बेशक वह लोग ख़ुदा को बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पाते

Verse 65

فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤۡمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيۡنَهُمۡ ثُمَّ لَا يَجِدُواْ فِىٓ أَنفُسِہِمۡ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيۡتَ وَيُسَلِّمُواْ تَسۡلِيمًا

पस (ऐ रसूल) तुम्हारे परवरदिगार की क़सम ये लोग सच्चे मोमिन न होंगे तावक्ते क़ि अपने बाहमी झगड़ों में तुमको अपना हाकिम (न) बनाएं फिर (यही नहीं बल्कि) जो कुछ तुम फैसला करो उससे किसी तरह दिलतंग भी न हों बल्कि ख़ुशी ख़ुशी उसको मान लें

Verse 66

وَلَوۡ أَنَّا كَتَبۡنَا عَلَيۡہِمۡ أَنِ ٱقۡتُلُوٓاْ أَنفُسَكُمۡ أَوِ ٱخۡرُجُواْ مِن دِيَـٰرِكُم مَّا فَعَلُوهُ إِلَّا قَلِيلٌ مِّنۡہُمۡ‌ ۖ وَلَوۡ أَنَّہُمۡ فَعَلُواْ مَا يُوعَظُونَ بِهِۦ لَكَانَ خَيۡرًا لَّهُمۡ وَأَشَدَّ تَثۡبِيتًا

(इस्लामी शरीयत में तो उनका ये हाल है) और अगर हम बनी इसराइल की तरह उनपर ये हुक्म जारी कर देते कि तुम अपने आपको क़त्ल कर डालो या शहर बदर हो जाओ तो उनमें से चन्द आदमियों के सिवा ये लोग तो उसको न करते और अगर ये लोग इस बात पर अमल करते जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है तो उनके हक़ में बहुत बेहतर होता

Verse 67

وَإِذًا لَّأَتَيۡنَـٰهُم مِّن لَّدُنَّآ أَجۡرًا عَظِيمًا

और (दीन में भी) बहुत साबित क़दमी से जमे रहते और इस सूरत में हम भी अपनी तरफ़ से ज़रूर बड़ा अच्छा बदला देते

Verse 68

وَلَهَدَيۡنَـٰهُمۡ صِرَٲطًا مُّسۡتَقِيمًا

और उनको राहे रास्त की भी ज़रूर हिदायत करते

Verse 69

وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ مَعَ ٱلَّذِينَ أَنۡعَمَ ٱللَّهُ عَلَيۡہِم مِّنَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ وَٱلصِّدِّيقِينَ وَٱلشُّہَدَآءِ وَٱلصَّـٰلِحِينَ ۚ وَحَسُنَ أُوْلَـٰٓٮِٕكَ رَفِيقًا

और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल की इताअत की तो ऐसे लोग उन (मक़बूल) बन्दों के साथ होंगे जिन्हें ख़ुदा ने अपनी नेअमतें दी हैं यानि अम्बिया और सिद्दीक़ीन और शोहदा और सालेहीन और ये लोग क्या ही अच्छे रफ़ीक़ हैं

Verse 70

ذَٲلِكَ ٱلۡفَضۡلُ مِنَ ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ عَلِيمًا

ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है और ख़ुदा तो वाक़िफ़कारी में बस है

Verse 71

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ خُذُواْ حِذۡرَڪُمۡ فَٱنفِرُواْ ثُبَاتٍ أَوِ ٱنفِرُواْ جَمِيعًا

ऐ ईमानवालों (जिहाद के वक्त) अपनी हिफ़ाज़त के (ज़राए) अच्छी तरह देखभाल लो फिर तुम्हें इख्तेयार है ख्वाह दस्ता दस्ता निकलो या सबके सब इकट्ठे होकर निकल खड़े हो

Verse 72

وَإِنَّ مِنكُمۡ لَمَن لَّيُبَطِّئَنَّ فَإِنۡ أَصَـٰبَتۡكُم مُّصِيبَةٌ قَالَ قَدۡ أَنۡعَمَ ٱللَّهُ عَلَىَّ إِذۡ لَمۡ أَكُن مَّعَهُمۡ شَہِيدًا

और तुममें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (जेहाद से) ज़रूर पीछे रहेंगे फिर अगर इत्तेफ़ाक़न तुमपर कोई मुसीबत आ पड़ी तो कहने लगे ख़ुदा ने हमपर बड़ा फ़ज़ल किया कि उनमें (मुसलमानों) के साथ मौजूद न हुआ

Verse 73

وَلَٮِٕنۡ أَصَـٰبَكُمۡ فَضۡلٌ مِّنَ ٱللَّهِ لَيَقُولَنَّ كَأَن لَّمۡ تَكُنۢ بَيۡنَكُمۡ وَبَيۡنَهُ ۥ مَوَدَّةٌ يَـٰلَيۡتَنِى كُنتُ مَعَهُمۡ فَأَفُوزَ فَوۡزًا عَظِيمًا

और अगर तुमपर ख़ुदा ने फ़ज़ल किया (और दुश्मन पर ग़ालिब आए) तो इस तरह अजनबी बनके कि गोया तुममें उसमें कभी मोहब्बत ही न थी यूं कहने लगा कि ऐ काश उनके साथ होता तो मैं भी बड़ी कामयाबी हासिल करता

Verse 74

۞ فَلۡيُقَـٰتِلۡ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يَشۡرُونَ ٱلۡحَيَوٰةَ ٱلدُّنۡيَا بِٱلۡأَخِرَةِ ۚ وَمَن يُقَـٰتِلۡ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَيُقۡتَلۡ أَوۡ يَغۡلِبۡ فَسَوۡفَ نُؤۡتِيهِ أَجۡرًا عَظِيمًا

पस जो लोग दुनिया की ज़िन्दगी (जान तक) आख़ेरत के वास्ते दे डालने को मौजूद हैं उनको ख़ुदा की राह में जेहाद करना चाहिए और जिसने ख़ुदा की राह में जेहाद किया फिर शहीद हुआ तो गोया ग़ालिब आया तो (बहरहाल) हम तो अनक़रीब ही उसको बड़ा अज्र अता फ़रमायेंगे

Verse 75

وَمَا لَكُمۡ لَا تُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلۡمُسۡتَضۡعَفِينَ مِنَ ٱلرِّجَالِ وَٱلنِّسَآءِ وَٱلۡوِلۡدَٲنِ ٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَآ أَخۡرِجۡنَا مِنۡ هَـٰذِهِ ٱلۡقَرۡيَةِ ٱلظَّالِمِ أَهۡلُهَا وَٱجۡعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ وَلِيًّا وَٱجۡعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ نَصِيرًا

(और मुसलमानों) तुमको क्या हो गया है कि ख़ुदा की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों (को कुफ्फ़ार के पंजे से छुड़ाने) के वास्ते जेहाद नहीं करते जो (हालते मजबूरी में) ख़ुदा से दुआएं मॉग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती (मक्का) से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और तू ख़ुद ही किसी को अपनी तरफ़ से हमारा मददगार बना

Verse 76

ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ يُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ‌ ۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ يُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱلطَّـٰغُوتِ فَقَـٰتِلُوٓاْ أَوۡلِيَآءَ ٱلشَّيۡطَـٰنِ‌ ۖ إِنَّ كَيۡدَ ٱلشَّيۡطَـٰنِ كَانَ ضَعِيفًا

(पस देखो) ईमानवाले तो ख़ुदा की राह में लड़ते हैं और कुफ्फ़ार शैतान की राह में लड़ते मरते हैं पस (मुसलमानों) तुम शैतान के हवा ख़ाहों से लड़ो और (कुछ परवाह न करो) क्योंकि शैतान का दाओ तो बहुत ही बोदा है

Verse 77

أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ قِيلَ لَهُمۡ كُفُّوٓاْ أَيۡدِيَكُمۡ وَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيۡہِمُ ٱلۡقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌ مِّنۡہُمۡ يَخۡشَوۡنَ ٱلنَّاسَ كَخَشۡيَةِ ٱللَّهِ أَوۡ أَشَدَّ خَشۡيَةً ۚ وَقَالُواْ رَبَّنَا لِمَ كَتَبۡتَ عَلَيۡنَا ٱلۡقِتَالَ لَوۡلَآ أَخَّرۡتَنَآ إِلَىٰٓ أَجَلٍ قَرِيبٍ ۗ قُلۡ مَتَـٰعُ ٱلدُّنۡيَا قَلِيلٌ وَٱلۡأَخِرَةُ خَيۡرٌ لِّمَنِ ٱتَّقَىٰ وَلَا تُظۡلَمُونَ فَتِيلاً

(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों (के हाल) पर नज़र नहीं की जिनको (जेहाद की आरज़ू थी) और उनको हुक्म दिया गया था कि (अभी) अपने हाथ रोके रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिए जाओ मगर जब जिहाद (उनपर वाजिब किया गया तो) उनमें से कुछ लोग (बोदेपन में) लोगों से इस तरह डरने लगे जैसे कोई ख़ुदा से डरे बल्कि उससे कहीं ज्यादा और (घबराकर) कहने लगे ख़ुदाया तूने हमपर जेहाद क्यों वाजिब कर दिया हमको कुछ दिनों की और मोहलत क्यों न दी (ऐ रसूल) उनसे कह दो कि दुनिया की आसाइश बहुत थोड़ा सा है और जो (ख़ुदा से) डरता है उसकी आख़ेरत उससे कहीं बेहतर है

Verse 78

أَيۡنَمَا تَكُونُواْ يُدۡرِككُّمُ ٱلۡمَوۡتُ وَلَوۡ كُنتُمۡ فِى بُرُوجٍ مُّشَيَّدَةٍ ۗ وَإِن تُصِبۡهُمۡ حَسَنَةٌ يَقُولُواْ هَـٰذِهِۦ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ‌ ۖ وَإِن تُصِبۡهُمۡ سَيِّئَةٌ يَقُولُواْ هَـٰذِهِۦ مِنۡ عِندِكَ ۚ قُلۡ كُلٌّ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِ‌ ۖ فَمَالِ هَـٰٓؤُلَآءِ ٱلۡقَوۡمِ لَا يَكَادُونَ يَفۡقَهُونَ حَدِيثًا

और वहां रेशा (बाल) बराबर भी तुम लोगों पर जुल्म नहीं किया जाएगा तुम चाहे जहॉ हो मौत तो तुमको ले डालेगी अगरचे तुम कैसे ही मज़बूत पक्के गुम्बदों में जा छुपो और उनको अगर कोई भलाई पहुंचती है तो कहने लगते हैं कि ये ख़ुदा की तरफ़ से है और अगर उनको कोई तकलीफ़ पहुंचती है तो (शरारत से) कहने लगते हैं कि (ऐ रसूल) ये तुम्हारी बदौलत है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि सब ख़ुदा की तरफ़ से है पस उन लोगों को क्या हो गया है कि र्कोई बात ही नहीं समझते

Verse 79

مَّآ أَصَابَكَ مِنۡ حَسَنَةٍ فَمِنَ ٱللَّهِ‌ ۖ وَمَآ أَصَابَكَ مِن سَيِّئَةٍ فَمِن نَّفۡسِكَ ۚ وَأَرۡسَلۡنَـٰكَ لِلنَّاسِ رَسُولاً ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَہِيدًا

हालॉकि (सच तो यूं है कि) जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुदा की तरफ़ से है और जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुद तुम्हारी बदौलत है और (ऐ रसूल) हमने तुमको लोगों के पास पैग़म्बर बनाकर भेजा है और (इसके लिए) ख़ुदा की गवाही काफ़ी है

Verse 80

مَّن يُطِعِ ٱلرَّسُولَ فَقَدۡ أَطَاعَ ٱللَّهَ‌ ۖ وَمَن تَوَلَّىٰ فَمَآ أَرۡسَلۡنَـٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيظًا

जिसने रसूल की इताअत की तो उसने ख़ुदा की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ ख्याल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है

Verse 81

وَيَقُولُونَ طَاعَةٌ فَإِذَا بَرَزُواْ مِنۡ عِندِكَ بَيَّتَ طَآٮِٕفَةٌ مِّنۡہُمۡ غَيۡرَ ٱلَّذِى تَقُولُ‌ ۖ وَٱللَّهُ يَكۡتُبُ مَا يُبَيِّتُونَ‌ ۖ فَأَعۡرِضۡ عَنۡہُمۡ وَتَوَكَّلۡ عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلاً

(ये लोग तुम्हारे सामने) तो कह देते हैं कि हम (आपके) फ़रमाबरदार हैं लेकिन जब तुम्हारे पास से बाहर निकले तो उनमें से कुछ लोग जो कुछ तुमसे कह चुके थे उसके ख़िलाफ़ रातों को मशवरा करते हैं हालॉकि (ये नहीं समझते) ये लोग रातों को जो कुछ भी मशवरा करते हैं उसे ख़ुदा लिखता जाता है पास तुम उन लोगों की कुछ परवाह न करो और ख़ुदा पर भरोसा रखो और ख़ुदा कारसाज़ी के लिए काफ़ी है

Verse 82

أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ ٱلۡقُرۡءَانَ ۚ وَلَوۡ كَانَ مِنۡ عِندِ غَيۡرِ ٱللَّهِ لَوَجَدُواْ فِيهِ ٱخۡتِلَـٰفًا ڪَثِيرًا

तो क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते और (ये नहीं ख्याल करते कि) अगर ख़ुदा के सिवा किसी और की तरफ़ से (आया) होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते

Verse 83

وَإِذَا جَآءَهُمۡ أَمۡرٌ مِّنَ ٱلۡأَمۡنِ أَوِ ٱلۡخَوۡفِ أَذَاعُواْ بِهِۦ‌ ۖ وَلَوۡ رَدُّوهُ إِلَى ٱلرَّسُولِ وَإِلَىٰٓ أُوْلِى ٱلۡأَمۡرِ مِنۡہُمۡ لَعَلِمَهُ ٱلَّذِينَ يَسۡتَنۢبِطُونَهُ ۥ مِنۡہُمۡ ۗ وَلَوۡلَا فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡڪُمۡ وَرَحۡمَتُهُ ۥ لَٱتَّبَعۡتُمُ ٱلشَّيۡطَـٰنَ إِلَّا قَلِيلاً

और जब उनके (मुसलमानों के) पास अमन या ख़ौफ़ की ख़बर आयी तो उसे फ़ौरन मशहूर कर देते हैं हालॉकि अगर वह उसकी ख़बर को रसूल (या) और ईमानदारो में से जो साहबाने हुकूमत तक पहुंचाते तो बेशक जो लोग उनमें से उसकी तहक़ीक़ करने वाले हैं (पैग़म्बर या वली) उसको समझ लेते कि (मशहूर करने की ज़रूरत है या नहीं) और (मुसलमानों) अगर तुमपर ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) और उसकी मेहरबानी न होती तो चन्द आदमियों के सिवा तुम सबके सब शैतान की पैरवी करने लगते

Verse 84

فَقَـٰتِلۡ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ لَا تُكَلَّفُ إِلَّا نَفۡسَكَ ۚ وَحَرِّضِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ‌ ۖ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَكُفَّ بَأۡسَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ۚ وَٱللَّهُ أَشَدُّ بَأۡسًا وَأَشَدُّ تَنكِيلاً

पस (ऐ रसूल) तुम ख़ुदा की राह में जिहाद करो और तुम अपनी ज़ात के सिवा किसी और के ज़िम्मेदार नहीं हो और ईमानदारों को (जेहाद की) तरग़ीब दो और अनक़रीब ख़ुदा काफ़िरों की हैबत रोक देगा और ख़ुदा की हैबत सबसे ज्यादा है और उसकी सज़ा बहुत सख्त है

Verse 85

مَّن يَشۡفَعۡ شَفَـٰعَةً حَسَنَةً يَكُن لَّهُ ۥ نَصِيبٌ مِّنۡہَا‌ ۖ وَمَن يَشۡفَعۡ شَفَـٰعَةً سَيِّئَةً يَكُن لَّهُ ۥ كِفۡلٌ مِّنۡهَا ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىۡءٍ مُّقِيتًا

जो शख्स अच्छे काम की सिफ़ारिश करे तो उसको भी उस काम के सवाब से कुछ हिस्सा मिलेगा और जो बुरे काम की सिफ़ारिश करे तो उसको भी उसी काम की सज़ा का कुछ हिस्सा मिलेगा और ख़ुदा तो हर चीज़ पर निगेहबान है

Verse 86

وَإِذَا حُيِّيتُم بِتَحِيَّةٍ فَحَيُّواْ بِأَحۡسَنَ مِنۡہَآ أَوۡ رُدُّوهَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَىۡءٍ حَسِيبًا

और जब कोई शख्स सलाम करे तो तुम भी उसके जवाब में उससे बेहतर तरीक़े से सलाम करो या वही लफ्ज़ जवाब में कह दो बेशक ख़ुदा हर चीज़ का हिसाब करने वाला है

Verse 87

ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ لَيَجۡمَعَنَّكُمۡ إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡقِيَـٰمَةِ لَا رَيۡبَ فِيهِ ۗ وَمَنۡ أَصۡدَقُ مِنَ ٱللَّهِ حَدِيثًا

अल्लाह तो वही परवरदिगार है जिसके सिवा कोई क़ाबिले परस्तिश नहीं वह तुमको क़यामत के दिन जिसमें ज़रा भी शक नहीं ज़रूर इकट्ठा करेगा और ख़ुदा से बढ़कर बात में सच्चा कौन होगा

Verse 88

۞ فَمَا لَكُمۡ فِى ٱلۡمُنَـٰفِقِينَ فِئَتَيۡنِ وَٱللَّهُ أَرۡكَسَہُم بِمَا كَسَبُوٓاْ ۚ أَتُرِيدُونَ أَن تَهۡدُواْ مَنۡ أَضَلَّ ٱللَّهُ‌ ۖ وَمَن يُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ ۥ سَبِيلاً

(मुसलमानों) फिर तुमको क्या हो गया है कि तुम मुनाफ़िक़ों के बारे में दो फ़रीक़ हो गए हो (एक मुवाफ़िक़ एक मुख़ालिफ़) हालॉकि ख़ुद ख़ुदा ने उनके करतूतों की बदौलत उनकी अक्लों को उलट पुलट दिया है क्या तुम ये चाहते हो कि जिसको ख़ुदा ने गुमराही में छोड़ दिया है तुम उसे राहे रास्त पर ले आओ हालॉकि ख़ुदा ने जिसको गुमराही में छोड़ दिया है उसके लिए तुममें से कोई शख्स रास्ता निकाल ही नहीं सकता

Verse 89

وَدُّواْ لَوۡ تَكۡفُرُونَ كَمَا كَفَرُواْ فَتَكُونُونَ سَوَآءً‌ ۖ فَلَا تَتَّخِذُواْ مِنۡہُمۡ أَوۡلِيَآءَ حَتَّىٰ يُہَاجِرُواْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَخُذُوهُمۡ وَٱقۡتُلُوهُمۡ حَيۡثُ وَجَدتُّمُوهُمۡ‌ ۖ وَلَا تَتَّخِذُواْ مِنۡہُمۡ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا

उन लोगों की ख्वाहिश तो ये है कि जिस तरह वह काफ़िर हो गए तुम भी काफ़िर हो जाओ ताकि तुम उनके बराबर हो जाओ पस जब तक वह ख़ुदा की राह में हिजरत न करें तो उनमें से किसी को दोस्त न बनाओ फिर अगर वह उससे भी मुंह मोड़ें तो उन्हें गिरफ्तार करो और जहॉ पाओ उनको क़त्ल करो और उनमें से किसी को न अपना दोस्त बनाओ न मददगार

Verse 90

إِلَّا ٱلَّذِينَ يَصِلُونَ إِلَىٰ قَوۡمِۭ بَيۡنَكُمۡ وَبَيۡنَہُم مِّيثَـٰقٌ أَوۡ جَآءُوكُمۡ حَصِرَتۡ صُدُورُهُمۡ أَن يُقَـٰتِلُوكُمۡ أَوۡ يُقَـٰتِلُواْ قَوۡمَهُمۡ ۚ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَسَلَّطَهُمۡ عَلَيۡكُمۡ فَلَقَـٰتَلُوكُمۡ ۚ فَإِنِ ٱعۡتَزَلُوكُمۡ فَلَمۡ يُقَـٰتِلُوكُمۡ وَأَلۡقَوۡاْ إِلَيۡكُمُ ٱلسَّلَمَ فَمَا جَعَلَ ٱللَّهُ لَكُمۡ عَلَيۡہِمۡ سَبِيلاً

मगर जो लोग किसी ऐसी क़ौम से जा मिलें कि तुममें और उनमें (सुलह का) एहद व पैमान हो चुका है या तुमसे जंग करने या अपनी क़ौम के साथ लड़ने से दिलतंग होकर तुम्हारे पास आए हों (तो उन्हें आज़ार न पहुंचाओ) और अगर ख़ुदा चाहता तो उनको तुमपर ग़लबा देता तो वह तुमसे ज़रूर लड़ पड़ते पस अगर वह तुमसे किनारा कशी करे और तुमसे न लड़े और तुम्हारे पास सुलाह का पैग़ाम दे तो तुम्हारे लिए उन लोगों पर आज़ार पहुंचाने की ख़ुदा ने कोई सबील नहीं निकाली

Verse 91

سَتَجِدُونَ ءَاخَرِينَ يُرِيدُونَ أَن يَأۡمَنُوكُمۡ وَيَأۡمَنُواْ قَوۡمَهُمۡ كُلَّ مَا رُدُّوٓاْ إِلَى ٱلۡفِتۡنَةِ أُرۡكِسُواْ فِيہَا ۚ فَإِن لَّمۡ يَعۡتَزِلُوكُمۡ وَيُلۡقُوٓاْ إِلَيۡكُمُ ٱلسَّلَمَ وَيَكُفُّوٓاْ أَيۡدِيَهُمۡ فَخُذُوهُمۡ وَٱقۡتُلُوهُمۡ حَيۡثُ ثَقِفۡتُمُوهُمۡ ۚ وَأُوْلَـٰٓٮِٕكُمۡ جَعَلۡنَا لَكُمۡ عَلَيۡہِمۡ سُلۡطَـٰنًا مُّبِينًا

अनक़रीब तुम कुछ ऐसे और लोगों को भी पाओगे जो चाहते हैं कि तुमसे भी अमन में रहें और अपनी क़ौम से भी अमन में रहें (मगर) जब कभी झगड़े की तरफ़ बुलाए गए तो उसमें औंधे मुंह के बल गिर पड़े पस अगर वह तुमसे न किनारा कशी करें और न तुम्हें सुलह का पैग़ाम दें और न लड़ाई से अपने हाथ रोकें पस उनको पकड़ों और जहॉ पाओ उनको क़त्ल करो और यही वह लोग हैं जिनपर हमने तुम्हें सरीही ग़लबा अता फ़रमाया

Verse 92

وَمَا كَانَ لِمُؤۡمِنٍ أَن يَقۡتُلَ مُؤۡمِنًا إِلَّا خَطَـًٔا ۚ وَمَن قَتَلَ مُؤۡمِنًا خَطَـًٔا فَتَحۡرِيرُ رَقَبَةٍ مُّؤۡمِنَةٍ وَدِيَةٌ مُّسَلَّمَةٌ إِلَىٰٓ أَهۡلِهِۦۤ إِلَّآ أَن يَصَّدَّقُواْ ۚ فَإِن كَانَ مِن قَوۡمٍ عَدُوٍّ لَّكُمۡ وَهُوَ مُؤۡمِنٌ فَتَحۡرِيرُ رَقَبَةٍ مُّؤۡمِنَةٍ‌ ۖ وَإِن ڪَانَ مِن قَوۡمِۭ بَيۡنَڪُمۡ وَبَيۡنَهُم مِّيثَـٰقٌ فَدِيَةٌ مُّسَلَّمَةٌ إِلَىٰٓ أَهۡلِهِۦ وَتَحۡرِيرُ رَقَبَةٍ مُّؤۡمِنَةٍ‌ ۖ فَمَن لَّمۡ يَجِدۡ فَصِيَامُ شَهۡرَيۡنِ مُتَتَابِعَيۡنِ تَوۡبَةً مِّنَ ٱللَّهِ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَڪِيمًا

और किसी ईमानदार को ये जायज़ नहीं कि किसी मोमिन को जान से मार डाले मगर धोखे से (क़त्ल किया हो तो दूसरी बात है) और जो शख्स किसी मोमिन को धोखे से (भी) मार डाले तो (उसपर) एक ईमानदार गुलाम का आज़ाद करना और मक़तूल के क़राबतदारों को खूंन बहा देना (लाज़िम) है मगर जब वह लोग माफ़ करें फिर अगर मक़तूल उन लोगों में से हो वह जो तुम्हारे दुशमन (काफ़िर हरबी) हैं और ख़ुद क़ातिल मोमिन है तो (सिर्फ) एक मुसलमान ग़ुलाम का आज़ाद करना और अगर मक़तूल उन (काफ़िर) लोगों में का हो जिनसे तुम से एहद व पैमान हो चुका है तो (क़ातिल पर) वारिसे मक़तूल को ख़ून बहा देना और एक बन्दए मोमिन का आज़ाद करना (वाजिब) है फ़िर जो शख्स (ग़ुलाम आज़ाद करने को) न पाये तो उसका कुफ्फ़ारा ख़ुदा की तरफ़ से लगातार दो महीने के रोज़े हैं और ख़ुदा ख़ूब वाकिफ़कार (और) हिकमत वाला है

Verse 93

وَمَن يَقۡتُلۡ مُؤۡمِنًا مُّتَعَمِّدًا فَجَزَآؤُهُ ۥ جَهَنَّمُ خَـٰلِدًا فِيہَا وَغَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيۡهِ وَلَعَنَهُ ۥ وَأَعَدَّ لَهُ ۥ عَذَابًا عَظِيمًا

और जो शख्स किसी मोमिन को जानबूझ के मार डाले (ग़ुलाम की आज़ादी वगैरह उसका कुफ्फ़ारा नहीं बल्कि) उसकी सज़ा दोज़क है और वह उसमें हमेशा रहेगा उसपर ख़ुदा ने (अपना) ग़ज़ब ढाया है और उसपर लानत की है और उसके लिए बड़ा सख्त अज़ाब तैयार कर रखा है

Verse 94

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا ضَرَبۡتُمۡ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَتَبَيَّنُواْ وَلَا تَقُولُواْ لِمَنۡ أَلۡقَىٰٓ إِلَيۡڪُمُ ٱلسَّلَـٰمَ لَسۡتَ مُؤۡمِنًا تَبۡتَغُونَ عَرَضَ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا فَعِندَ ٱللَّهِ مَغَانِمُ ڪَثِيرَةٌ ۚ كَذَٲلِكَ ڪُنتُم مِّن قَبۡلُ فَمَنَّ ٱللَّهُ عَلَيۡڪُمۡ فَتَبَيَّنُوٓاْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرًا

ऐ ईमानदारों जब तुम ख़ुदा की राह में (जेहाद करने को) सफ़र करो तो (किसी के क़त्ल करने में जल्दी न करो बल्कि) अच्छी तरह जॉच कर लिया करो और जो शख्स (इज़हारे इस्लाम की ग़रज़ से) तुम्हे सलाम करे तो तुम बे सोचे समझे न कह दिया करो कि तू ईमानदार नहीं है (इससे ज़ाहिर होता है) कि तुम (फ़क्त) दुनियावी आसाइश की तमन्ना रखते हो मगर इसी बहाने क़त्ल करके लूट लो और ये नहीं समझते कि (अगर यही है) तो ख़ुदा के यहॉ बहुत से ग़नीमतें हैं (मुसलमानों) पहले तुम ख़ुद भी तो ऐसे ही थे फिर ख़ुदा ने तुमपर एहसान किया (कि बेखटके मुसलमान हो गए) ग़रज़ ख़ूब छानबीन कर लिया करो बेशक ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है

Verse 95

لَّا يَسۡتَوِى ٱلۡقَـٰعِدُونَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ غَيۡرُ أُوْلِى ٱلضَّرَرِ وَٱلۡمُجَـٰهِدُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ بِأَمۡوَٲلِهِمۡ وَأَنفُسِہِمۡ ۚ فَضَّلَ ٱللَّهُ ٱلۡمُجَـٰهِدِينَ بِأَمۡوَٲلِهِمۡ وَأَنفُسِہِمۡ عَلَى ٱلۡقَـٰعِدِينَ دَرَجَةً ۚ وَكُلاًّ وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلۡحُسۡنَىٰ ۚ وَفَضَّلَ ٱللَّهُ ٱلۡمُجَـٰهِدِينَ عَلَى ٱلۡقَـٰعِدِينَ أَجۡرًا عَظِيمًا

माज़ूर लोगों के सिवा जेहाद से मुंह छिपा के घर में बैठने वाले और ख़ुदा की राह में अपने जान व माल से जिहाद करने वाले हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते (बल्कि) अपने जान व माल से जिहाद करने वालों को घर बैठे रहने वालें पर ख़ुदा ने दरजे के एतबार से बड़ी फ़ज़ीलत दी है (अगरचे) ख़ुदा ने सब ईमानदारों से (ख्वाह जिहाद करें या न करें) भलाई का वायदा कर लिया है मगर ग़ाज़ियों को खाना नशीनों पर अज़ीम सवाब के एतबार से ख़ुदा ने बड़ी फ़ज़ीलत दी है

Verse 96

دَرَجَـٰتٍ مِّنۡهُ وَمَغۡفِرَةً وَرَحۡمَةً ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا

(यानी उन्हें) अपनी तरफ़ से बड़े बड़े दरजे और बख्शिश और रहमत (अता फ़रमाएगा) और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

Verse 97

إِنَّ ٱلَّذِينَ تَوَفَّٮٰهُمُ ٱلۡمَلَـٰٓٮِٕكَةُ ظَالِمِىٓ أَنفُسِہِمۡ قَالُواْ فِيمَ كُنتُمۡ‌ ۖ قَالُواْ كُنَّا مُسۡتَضۡعَفِينَ فِى ٱلۡأَرۡضِ ۚ قَالُوٓاْ أَلَمۡ تَكُنۡ أَرۡضُ ٱللَّهِ وَٲسِعَةً فَتُہَاجِرُواْ فِيہَا ۚ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ مَأۡوَٮٰهُمۡ جَهَنَّمُ‌ ۖ وَسَآءَتۡ مَصِيرًا

बेशक जिन लोगों की क़ब्जे रूह फ़रिश्ते ने उस वक़त की है कि (दारूल हरब में पड़े) अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे और फ़रिश्ते कब्जे रूह के बाद हैरत से कहते हैं तुम किस (हालत) ग़फ़लत में थे तो वह (माज़ेरत के लहजे में) कहते है कि हम तो रूए ज़मीन में बेकस थे तो फ़रिश्ते कहते हैं कि ख़ुदा की (ऐसी लम्बी चौड़ी) ज़मीन में इतनी सी गुन्जाइश न थी कि तुम (कहीं) हिजरत करके चले जाते पस ऐसे लोगों का ठिकाना जहन्नुम है और वह बुरा ठिकाना है

Verse 98

إِلَّا ٱلۡمُسۡتَضۡعَفِينَ مِنَ ٱلرِّجَالِ وَٱلنِّسَآءِ وَٱلۡوِلۡدَٲنِ لَا يَسۡتَطِيعُونَ حِيلَةً وَلَا يَہۡتَدُونَ سَبِيلاً

मगर जो मर्द और औरतें और बच्चे इस क़दर बेबस हैं कि न तो (दारूल हरब से निकलने की) काई तदबीर कर सकते हैं और उनकी रिहाई की कोई राह दिखाई देती है

Verse 99

فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَعۡفُوَ عَنۡہُمۡ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَفُوًّا غَفُورًا

तो उम्मीद है कि ख़ुदा ऐसे लोगों से दरगुज़रे और ख़ुदा तो बड़ा माफ़ करने वाला और बख्शने वाला है

Verse 100

۞ وَمَن يُہَاجِرۡ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ يَجِدۡ فِى ٱلۡأَرۡضِ مُرَٲغَمًا كَثِيرًا وَسَعَةً ۚ وَمَن يَخۡرُجۡ مِنۢ بَيۡتِهِۦ مُهَاجِرًا إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ثُمَّ يُدۡرِكۡهُ ٱلۡمَوۡتُ فَقَدۡ وَقَعَ أَجۡرُهُ ۥ عَلَى ٱللَّهِ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا

और जो शख्स ख़ुदा की राह में हिजरत करेगा तो वह रूए ज़मीन में बा फ़राग़त (चैन से रहने सहने के) बहुत से कुशादा मक़ाम पाएगा और जो शख्स अपने घर से जिलावतन होके ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ़ निकल ख़ड़ा हुआ फिर उसे (मंज़िले मक़सूद) तक पहुंचने से पहले मौत आ जाए तो ख़ुदा पर उसका सवाब लाज़िम हो गया और ख़ुदा तो बड़ा बख्श ने वाला मेहरबान है ही

Verse 101

وَإِذَا ضَرَبۡتُمۡ فِى ٱلۡأَرۡضِ فَلَيۡسَ عَلَيۡكُمۡ جُنَاحٌ أَن تَقۡصُرُواْ مِنَ ٱلصَّلَوٰةِ إِنۡ خِفۡتُمۡ أَن يَفۡتِنَكُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓاْ ۚ إِنَّ ٱلۡكَـٰفِرِينَ كَانُواْ لَكُمۡ عَدُوًّا مُّبِينًا

(मुसलमानों जब तुम रूए ज़मीन पर सफ़र करो) और तुमको इस अम्र का ख़ौफ़ हो कि कुफ्फ़ार (असनाए नमाज़ में) तुमसे फ़साद करेंगे तो उसमें तुम्हारे वास्ते कुछ मुज़ाएक़ा नहीं कि नमाज़ में कुछ कम कर दिया करो बेशक कुफ्फ़ार तो तुम्हारे ख़ुल्लम ख़ुल्ला दुश्मन हैं

Verse 102

وَإِذَا كُنتَ فِيہِمۡ فَأَقَمۡتَ لَهُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَلۡتَقُمۡ طَآٮِٕفَةٌ مِّنۡہُم مَّعَكَ وَلۡيَأۡخُذُوٓاْ أَسۡلِحَتَہُمۡ فَإِذَا سَجَدُواْ فَلۡيَكُونُواْ مِن وَرَآٮِٕڪُمۡ وَلۡتَأۡتِ طَآٮِٕفَةٌ أُخۡرَىٰ لَمۡ يُصَلُّواْ فَلۡيُصَلُّواْ مَعَكَ وَلۡيَأۡخُذُواْ حِذۡرَهُمۡ وَأَسۡلِحَتَہُمۡ ۗ وَدَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَوۡ تَغۡفُلُونَ عَنۡ أَسۡلِحَتِكُمۡ وَأَمۡتِعَتِكُمۡ فَيَمِيلُونَ عَلَيۡڪُم مَّيۡلَةً وَٲحِدَةً ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيۡڪُمۡ إِن كَانَ بِكُمۡ أَذًى مِّن مَّطَرٍ أَوۡ كُنتُم مَّرۡضَىٰٓ أَن تَضَعُوٓاْ أَسۡلِحَتَكُمۡ‌ ۖ وَخُذُواْ حِذۡرَكُمۡ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ أَعَدَّ لِلۡكَـٰفِرِينَ عَذَابًا مُّهِينًا

और (ऐ रसूल) तुम मुसलमानों में मौजूद हो और (लड़ाई हो रही हो) कि तुम उनको नमाज़ पढ़ाने लगो तो (दो गिरोह करके) एक को लड़ाई के वास्ते छोड़ दो (और) उनमें से एक जमाअत तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़े और अपने हरबे तैयार अपने साथ लिए रहे फिर जब (पहली रकअत के) सजदे कर (दूसरी रकअत फुरादा पढ़) ले तो तुम्हारे पीछे पुश्त पनाह बनें और दूसरी जमाअत जो (लड़ रही थी और) जब तक नमाज़ नहीं पढ़ने पायी है और (तुम्हारी दूसरी रकअत में) तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़े और अपनी हिफ़ाज़त की चीजे अौर अपने हथियार (नमाज़ में साथ) लिए रहे कुफ्फ़ार तो ये चाहते ही हैं कि काश अपने हथियारों और अपने साज़ व सामान से ज़रा भी ग़फ़लत करो तो एक बारगी सबके सब तुम पर टूट पड़ें हॉ अलबत्ता उसमें कुछ मुज़ाएक़ा नहीं कि (इत्तेफ़ाक़न) तुमको बारिश के सबब से कुछ तकलीफ़ पहुंचे या तुम बीमार हो तो अपने हथियार (नमाज़ में) उतार के रख दो और अपनी हिफ़ाज़त करते रहो और ख़ुदा ने तो काफ़िरों के लिए ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है

Verse 103

فَإِذَا قَضَيۡتُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱذۡڪُرُواْ ٱللَّهَ قِيَـٰمًا وَقُعُودًا وَعَلَىٰ جُنُوبِڪُمۡ ۚ فَإِذَا ٱطۡمَأۡنَنتُمۡ فَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ كَانَتۡ عَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ كِتَـٰبًا مَّوۡقُوتًا

फिर जब तुम नमाज़ अदा कर चुको तो उठते बैठते लेटते (ग़रज़ हर हाल में) ख़ुदा को याद करो फिर जब तुम (दुश्मनों से) मुतमईन हो जाओ तो (अपने मअमूल) के मुताबिक़ नमाज़ पढ़ा करो क्योंकि नमाज़ तो ईमानदारों पर वक्त मुतय्यन करके फ़र्ज़ की गयी है

Verse 104

وَلَا تَهِنُواْ فِى ٱبۡتِغَآءِ ٱلۡقَوۡمِ‌ ۖ إِن تَكُونُواْ تَأۡلَمُونَ فَإِنَّهُمۡ يَأۡلَمُونَ كَمَا تَأۡلَمُونَ‌ ۖ وَتَرۡجُونَ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا يَرۡجُونَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا

और (मुसलमानों) दुशमनों के पीछा करने में सुस्ती न करो अगर लड़ाई में तुमको तकलीफ़ पहुंचती है तो जैसी तुमको तकलीफ़ पहुंचती है उनको भी वैसी ही अज़ीयत होती है और (तुमको) ये भी (उम्मीद है कि) तुम ख़ुदा से वह वह उम्मीदें रखते हो जो (उनको) नसीब नहीं और ख़ुदा तो सबसे वाक़िफ़ (और) हिकमत वाला है

Verse 105

إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَـٰبَ بِٱلۡحَقِّ لِتَحۡكُمَ بَيۡنَ ٱلنَّاسِ بِمَآ أَرَٮٰكَ ٱللَّهُ ۚ وَلَا تَكُن لِّلۡخَآٮِٕنِينَ خَصِيمًا

(ऐ रसूल) हमने तुमपर बरहक़ किताब इसलिए नाज़िल की है कि ख़ुदा ने तुम्हारी हिदायत की है उसी तरह लोगों के दरमियान फ़ैसला करो और ख्यानत करने वालों के तरफ़दार न बनो

Verse 106

وَٱسۡتَغۡفِرِ ٱللَّهَ‌ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا

और (अपनी उम्मत के लिये) ख़ुदा से मग़फ़िरत की दुआ मॉगों बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

Verse 107

وَلَا تُجَـٰدِلۡ عَنِ ٱلَّذِينَ يَخۡتَانُونَ أَنفُسَہُمۡ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ خَوَّانًا أَثِيمًا

और (ऐ रसूल) तुम (उन बदमाशों) की तरफ़ होकर (लोगों से) न लड़ो जो अपने ही (लोगों) से दग़ाबाज़ी करते हैं बेशक ख़ुदा ऐसे शख्स को दोस्त नहीं रखता जो दग़ाबाज़ गुनाहगार हो

Verse 108

يَسۡتَخۡفُونَ مِنَ ٱلنَّاسِ وَلَا يَسۡتَخۡفُونَ مِنَ ٱللَّهِ وَهُوَ مَعَهُمۡ إِذۡ يُبَيِّتُونَ مَا لَا يَرۡضَىٰ مِنَ ٱلۡقَوۡلِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِمَا يَعۡمَلُونَ مُحِيطًا

लोगों से तो अपनी शरारत छुपाते हैं और (ख़ुदा से नहीं छुपा सकते) हालॉकि वह तो उस वक्त भी उनके साथ साथ है जब वह लोग रातों को (बैठकर) उन बातों के मशवरे करते हैं जिनसे ख़ुदा राज़ी नहीं और ख़ुदा तो उनकी सब करतूतों को (इल्म के अहाते में) घेरे हुए है

Verse 109

هَـٰٓأَنتُمۡ هَـٰٓؤُلَآءِ جَـٰدَلۡتُمۡ عَنۡہُمۡ فِى ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا فَمَن يُجَـٰدِلُ ٱللَّهَ عَنۡہُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَـٰمَةِ أَم مَّن يَكُونُ عَلَيۡہِمۡ وَڪِيلاً

(मुसलमानों) ख़बरदार हो जाओ भला दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी में तो तुम उनकी तरफ़ होकर लड़ने खडे हो गए (मगर ये तो बताओ) फिर क़यामत के दिन उनका तरफ़दार बनकर ख़ुदा से कौन लड़ेगा या कौन उनका वकील होगा

Verse 110

وَمَن يَعۡمَلۡ سُوٓءًا أَوۡ يَظۡلِمۡ نَفۡسَهُ ۥ ثُمَّ يَسۡتَغۡفِرِ ٱللَّهَ يَجِدِ ٱللَّهَ غَفُورًا رَّحِيمًا

और जो शख्स कोई बुरा काम करे या (किसी तरह) अपने नफ्स पर ज़ुल्म करे उसके बाद ख़ुदा से अपनी मग़फ़िरत की दुआ मॉगे तो ख़ुदा को बड़ा बख्शने वाला मेहरबान पाएगा

Verse 111

وَمَن يَكۡسِبۡ إِثۡمًا فَإِنَّمَا يَكۡسِبُهُ ۥ عَلَىٰ نَفۡسِهِۦ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا

और जो शख्स कोई गुनाह करता है तो उससे कुछ अपना ही नुक़सान करता है और ख़ुदा तो (हर चीज़ से) वाक़िफ़ (और) बड़ी तदबीर वाला है

Verse 112

وَمَن يَكۡسِبۡ خَطِيٓـَٔةً أَوۡ إِثۡمًا ثُمَّ يَرۡمِ بِهِۦ بَرِيٓـًٔا فَقَدِ ٱحۡتَمَلَ بُہۡتَـٰنًا وَإِثۡمًا مُّبِينًا

और जो शख्स कोई ख़ता या गुनाह करे फिर उसे किसी बेक़सूर के सर थोपे तो उसने एक बड़े (इफ़तेरा) और सरीही गुनाह को अपने ऊपर लाद लिया

Verse 113

وَلَوۡلَا فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡكَ وَرَحۡمَتُهُ ۥ لَهَمَّت طَّآٮِٕفَةٌ مِّنۡهُمۡ أَن يُضِلُّوكَ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّآ أَنفُسَہُمۡ‌ ۖ وَمَا يَضُرُّونَكَ مِن شَىۡءٍ ۚ وَأَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَـٰبَ وَٱلۡحِكۡمَةَ وَعَلَّمَكَ مَا لَمۡ تَكُن تَعۡلَمُ ۚ وَكَانَ فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡكَ عَظِيمًا

और (ऐ रसूल) अगर तुमपर ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) और उसकी मेहरबानी न होती तो उन (बदमाशों) में से एक गिरोह तुमको गुमराह करने का ज़रूर क़सद करता हालॉकि वह लोग बस अपने आप को गुमराह कर रहे हैं और यह लोग तुम्हें कुछ भी ज़रर नहीं पहुंचा सकते और ख़ुदा ही ने तो (मेहरबानी की कि) तुमपर अपनी किताब और हिकमत नाज़िल की और जो बातें तुम नहीं जानते थे तुम्हें सिखा दी और तुम पर तो ख़ुदा का बड़ा फ़ज़ल है

Verse 114

۞ لَّا خَيۡرَ فِى ڪَثِيرٍ مِّن نَّجۡوَٮٰهُمۡ إِلَّا مَنۡ أَمَرَ بِصَدَقَةٍ أَوۡ مَعۡرُوفٍ أَوۡ إِصۡلَـٰحِۭ بَيۡنَ ٱلنَّاسِ ۚ وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٲلِكَ ٱبۡتِغَآءَ مَرۡضَاتِ ٱللَّهِ فَسَوۡفَ نُؤۡتِيهِ أَجۡرًا عَظِيمًا

(ऐ रसूल) उनके राज़ की बातों में अक्सर में भलाई (का तो नाम तक) नहीं मगर (हॉ) जो शख्स किसी को सदक़ा देने या अच्छे काम करे या लोगों के दरमियान मेल मिलाप कराने का हुक्म दे (तो अलबत्ता एक बात है) और जो शख्स (महज़) ख़ुदा की ख़ुशनूदी की ख्वाहिश में ऐसे काम करेगा तो हम अनक़रीब ही उसे बड़ा अच्छा बदला अता फरमाएंगे

Verse 115

وَمَن يُشَاقِقِ ٱلرَّسُولَ مِنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُ ٱلۡهُدَىٰ وَيَتَّبِعۡ غَيۡرَ سَبِيلِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ نُوَلِّهِۦ مَا تَوَلَّىٰ وَنُصۡلِهِۦ جَهَنَّمَ‌ ۖ وَسَآءَتۡ مَصِيرًا

और जो शख्स राहे रास्त के ज़ाहिर होने के बाद रसूल से सरकशी करे और मोमिनीन के तरीक़े के सिवा किसी और राह पर चले तो जिधर वह फिर गया है हम भी उधर ही फेर देंगे और (आख़िर) उसे जहन्नुम में झोंक देंगे और वह तो बहुत ही बुरा ठिकाना

Verse 116

إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغۡفِرُ أَن يُشۡرَكَ بِهِۦ وَيَغۡفِرُ مَا دُونَ ذَٲلِكَ لِمَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُشۡرِكۡ بِٱللَّهِ فَقَدۡ ضَلَّ ضَلَـٰلاَۢ بَعِيدًا

ख़ुदा बेशक उसको तो नहीं बख्शता कि उसका कोई और शरीक बनाया जाए हॉ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे बख्श दे और (माज़ अल्लाह) जिसने किसी को ख़ुदा का शरीक बनाया तो वह बस भटक के बहुत दूर जा पड़ा

Verse 117

إِن يَدۡعُونَ مِن دُونِهِۦۤ إِلَّآ إِنَـٰثًا وَإِن يَدۡعُونَ إِلَّا شَيۡطَـٰنًا مَّرِيدًا

मुशरेकीन ख़ुदा को छोड़कर बस औरतों ही की परसतिश करते हैं (यानी बुतों की जो उनके) ख्याल में औरतें हैं (दर हक़ीक़त) ये लोग सरकश शैतान की परसतिश करते हैं

Verse 118

لَّعَنَهُ ٱللَّهُ‌ ۢ وَقَالَ لَأَتَّخِذَنَّ مِنۡ عِبَادِكَ نَصِيبًا مَّفۡرُوضًا

जिसपर ख़ुदा ने लानत की है और जिसने (इब्तिदा ही में) कहा था कि (ख़ुदावन्दा) मैं तेरे बन्दों में से कुछ ख़ास लोगों को (अपनी तरफ) ज़रूर ले लूंगा

Verse 119

وَلَأُضِلَّنَّهُمۡ وَلَأُمَنِّيَنَّهُمۡ وَلَأَمُرَنَّهُمۡ فَلَيُبَتِّڪُنَّ ءَاذَانَ ٱلۡأَنۡعَـٰمِ وَلَأَمُرَنَّہُمۡ فَلَيُغَيِّرُنَّ خَلۡقَ ٱللَّهِ ۚ وَمَن يَتَّخِذِ ٱلشَّيۡطَـٰنَ وَلِيًّا مِّن دُونِ ٱللَّهِ فَقَدۡ خَسِرَ خُسۡرَانًا مُّبِينًا

और फिर उन्हें ज़रूर गुमराह करूंगा और उन्हें बड़ी बड़ी उम्मीदें भी ज़रूर दिलाऊंगा और यक़ीनन उन्हें सिखा दूंगा फिर वो (बुतों के वास्ते) जानवरों के काम ज़रूर चीर फाड़ करेंगे और अलबत्ता उनसे कह दूंगा बस फिर वो (मेरी तालीम के मुवाफ़िक़) ख़ुदा की बनाई हुई सूरत को ज़रूर बदल डालेंगे और (ये याद रहे कि) जिसने ख़ुदा को छोड़कर शैतान को अपना सरपरस्त बनाया तो उसने खुल्लम खुल्ला सख्त घाटा उठाया

Verse 120

يَعِدُهُمۡ وَيُمَنِّيہِمۡ‌ ۖ وَمَا يَعِدُهُمُ ٱلشَّيۡطَـٰنُ إِلَّا غُرُورًا

शैतान उनसे अच्छे अच्छे वायदे भी करता है (और बड़ी बड़ी) उम्मीदें भी दिलाता है और शैतान उनसे जो कुछ वायदे भी करता है वह बस निरा धोखा (ही धोखा) है

Verse 121

أُوْلَـٰٓٮِٕكَ مَأۡوَٮٰهُمۡ جَهَنَّمُ وَلَا يَجِدُونَ عَنۡہَا مَحِيصًا

यही तो वह लोग हैं जिनका ठिकाना बस जहन्नुम है और वहॉ से भागने की जगह भी न पाएंगे

Verse 122

وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ سَنُدۡخِلُهُمۡ جَنَّـٰتٍ تَجۡرِى مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيہَآ أَبَدًا‌ ۖ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقًّا ۚ وَمَنۡ أَصۡدَقُ مِنَ ٱللَّهِ قِيلاً

और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन्हें हम अनक़रीब ही (बेहिश्त के) उन (हरे भरे) बाग़ों में जा पहुंचाएगें जिनके (दरख्तों के) नीचे नहरें जारी होंगी और ये लोग उसमें हमेशा आबादुल आबाद तक रहेंगे (ये उनसे) ख़ुदा का पक्का वायदा है और ख़ुदा से ज्यादा (अपनी) बात में सच्चा कौन होगा

Verse 123

لَّيۡسَ بِأَمَانِيِّكُمۡ وَلَآ أَمَانِىِّ أَهۡلِ ٱلۡڪِتَـٰبِ ۗ مَن يَعۡمَلۡ سُوٓءًا يُجۡزَ بِهِۦ وَلَا يَجِدۡ لَهُ ۥ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا

न तुम लोगों की आरज़ू से (कुछ काम चल सकता है) न अहले किताब की तमन्ना से कुछ हासिल हो सकता है बल्कि (जैसा काम वैसा दाम) जो बुरा काम करेगा उसे उसका बदला दिया जाएगा और फिर ख़ुदा के सिवा किसी को न तो अपना सरपरस्त पाएगा और न मददगार

Verse 124

وَمَن يَعۡمَلۡ مِنَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ مِن ذَڪَرٍ أَوۡ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤۡمِنٌ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ يَدۡخُلُونَ ٱلۡجَنَّةَ وَلَا يُظۡلَمُونَ نَقِيرًا

और जो शख्स अच्छे अच्छे काम करेगा (ख्वाह) मर्द हो या औरत और ईमानदार (भी) हो तो ऐसे लोग बेहिश्त में (बेखटके) जा पहुंचेंगे और उनपर तिल भी ज़ुल्म न किया जाएगा

Verse 125

وَمَنۡ أَحۡسَنُ دِينًا مِّمَّنۡ أَسۡلَمَ وَجۡهَهُ ۥ لِلَّهِ وَهُوَ مُحۡسِنٌ وَٱتَّبَعَ مِلَّةَ إِبۡرَٲهِيمَ حَنِيفًا ۗ وَٱتَّخَذَ ٱللَّهُ إِبۡرَٲهِيمَ خَلِيلاً

और उस शख्स से दीन में बेहतर कौन होगा जिसने ख़ुदा के सामने अपना सरे तसलीम झुका दिया और नेको कार भी है और इबराहीम के तरीके पर चलता है जो बातिल से कतरा कर चलते थे और ख़ुदा ने इब्राहिम को तो अपना ख़लिस दोस्त बना लिया

Verse 126

وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَمَا فِى ٱلۡأَرۡضِ ۚ وَڪَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَىۡءٍ مُّحِيطًا

और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही का है और ख़ुदा ही सब चीज़ को (अपनी) कुदरत से घेरे हुए है

Verse 127

وَيَسۡتَفۡتُونَكَ فِى ٱلنِّسَآءِ‌ ۖ قُلِ ٱللَّهُ يُفۡتِيڪُمۡ فِيهِنَّ وَمَا يُتۡلَىٰ عَلَيۡڪُمۡ فِى ٱلۡكِتَـٰبِ فِى يَتَـٰمَى ٱلنِّسَآءِ ٱلَّـٰتِى لَا تُؤۡتُونَهُنَّ مَا كُتِبَ لَهُنَّ وَتَرۡغَبُونَ أَن تَنكِحُوهُنَّ وَٱلۡمُسۡتَضۡعَفِينَ مِنَ ٱلۡوِلۡدَٲنِ وَأَن تَقُومُواْ لِلۡيَتَـٰمَىٰ بِٱلۡقِسۡطِ ۚ وَمَا تَفۡعَلُواْ مِنۡ خَيۡرٍ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِهِۦ عَلِيمًا

(ऐ रसूल) ये लोग तुमसे (यतीम लड़कियों) से निकाह के बारे में फ़तवा तलब करते हैं तुम उनसे कह दो कि ख़ुदा तुम्हें उनसे (निकाह करने) की इजाज़त देता है और जो हुक्म मनाही का कुरान में तुम्हें (पहले) सुनाया जा चुका है वह हक़ीक़तन उन यतीम लड़कियों के वास्ते था जिन्हें तुम उनका मुअय्यन किया हुआ हक़ नहीं देते और चाहते हो (कि यूं ही) उनसे निकाह कर लो और उन कमज़ोर नातवॉ (कमजोर) बच्चों के बारे में हुक्म फ़रमाता है और (वो) ये है कि तुम यतीमों के हुक़ूक़ के बारे में इन्साफ पर क़ायम रहो और (यक़ीन रखो कि) जो कुछ तुम नेकी करोगे तो ख़ुदा ज़रूर वाक़िफ़कार है

Verse 128

وَإِنِ ٱمۡرَأَةٌ خَافَتۡ مِنۢ بَعۡلِهَا نُشُوزًا أَوۡ إِعۡرَاضًا فَلَا جُنَاحَ عَلَيۡہِمَآ أَن يُصۡلِحَا بَيۡنَہُمَا صُلۡحًا ۚ وَٱلصُّلۡحُ خَيۡرٌ ۗ وَأُحۡضِرَتِ ٱلۡأَنفُسُ ٱلشُّحَّ ۚ وَإِن تُحۡسِنُواْ وَتَتَّقُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرًا

और अगर कोई औरत अपने शौहर की ज्यादती व बेतवज्जोही से (तलाक़ का) ख़ौफ़ रखती हो तो मियॉ बीवी के बाहम किसी तरह मिलाप कर लेने में दोनों (में से किसी पर) कुछ गुनाह नहीं है और सुलह तो (बहरहाल) बेहतर है और बुख्ल से तो क़रीब क़रीब हर तबियत के हम पहलू है और अगर तुम नेकी करो और परहेजदारी करो तो ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है (वही तुमको अज्र देगा)

Verse 129

وَلَن تَسۡتَطِيعُوٓاْ أَن تَعۡدِلُواْ بَيۡنَ ٱلنِّسَآءِ وَلَوۡ حَرَصۡتُمۡ‌ ۖ فَلَا تَمِيلُواْ ڪُلَّ ٱلۡمَيۡلِ فَتَذَرُوهَا كَٱلۡمُعَلَّقَةِ ۚ وَإِن تُصۡلِحُواْ وَتَتَّقُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا

और अगरचे तुम बहुतेरा चाहो (लेकिन) तुममें इतनी सकत तो हरगिज़ नहीं है कि अपनी कई बीवियों में (पूरा पूरा) इन्साफ़ कर सको (मगर) ऐसा भी तो न करो कि (एक ही की तरफ़) हमातन माएल हो जाओ कि (दूसरी को अधड़ में) लटकी हुई छोड़ दो और अगर बाहम मेल कर लो और (ज्यादती से) बचे रहो तो ख़ुदा यक़ीनन बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

Verse 130

وَإِن يَتَفَرَّقَا يُغۡنِ ٱللَّهُ ڪُلاًّ مِّن سَعَتِهِۦ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ وَٲسِعًا حَكِيمًا

और अगर दोनों मियॉ बीवी एक दूसरे से बाज़रिए तलाक़ जुदा हो जाएं तो ख़ुदा अपने वसी ख़ज़ाने से (फ़रागुल बाली अता फ़रमाकर) दोनों को (एक दूसरे से) बेनियाज़ कर देगा और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश और तदबीर वाला है और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज सब कुछ) ख़ुदा ही का है

Verse 131

وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَمَا فِى ٱلۡأَرۡضِ ۗ وَلَقَدۡ وَصَّيۡنَا ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَـٰبَ مِن قَبۡلِڪُمۡ وَإِيَّاكُمۡ أَنِ ٱتَّقُواْ ٱللَّهَ ۚ وَإِن تَكۡفُرُواْ فَإِنَّ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَمَا فِى ٱلۡأَرۡضِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَنِيًّا حَمِيدًا

और जिन लोगों को तुमसे पहले किताबे ख़ुदा अता की गयी है उनको और तुमको भी उसकी हमने वसीयत की थी कि (ख़ुदा) (की नाफ़रमानी) से डरते रहो और अगर (कहीं) तुमने कुफ़्र इख्तेयार किया तो (याद रहे कि) जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज सब कुछ) ख़ुदा ही का है (जो चाहे कर सकता है) और ख़ुदा तो सबसे बेपरवा और (हमा सिफ़त) मौसूफ़ हर हम्द वाला है

Verse 132

وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَمَا فِى ٱلۡأَرۡضِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلاً

जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज सब कुछ) ख़ास ख़ुदा ही का है और ख़ुदा तो कारसाज़ी के लिये काफ़ी है

Verse 133

إِن يَشَأۡ يُذۡهِبۡڪُمۡ أَيُّہَا ٱلنَّاسُ وَيَأۡتِ بِـَٔاخَرِينَ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ ذَٲلِكَ قَدِيرًا

ऐ लोगों अगर ख़ुदा चाहे तो तुमको (दुनिया के परदे से) बिल्कुल उठा ले और (तुम्हारे बदले) दूसरों को ला (बसाए) और ख़ुदा तो इसपर क़ादिर व तवाना है

Verse 134

مَّن كَانَ يُرِيدُ ثَوَابَ ٱلدُّنۡيَا فَعِندَ ٱللَّهِ ثَوَابُ ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأَخِرَةِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ سَمِيعَۢا بَصِيرًا

और जो शख्स (अपने आमाल का) बदला दुनिया ही में चाहता है तो ख़ुदा के पास दुनिया व आख़िरत दोनों का अज्र मौजूद है और ख़ुदा तो हर शख्स की सुनता और सबको देखता है

Verse 135

۞ يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُونُواْ قَوَّٲمِينَ بِٱلۡقِسۡطِ شُہَدَآءَ لِلَّهِ وَلَوۡ عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمۡ أَوِ ٱلۡوَٲلِدَيۡنِ وَٱلۡأَقۡرَبِينَ ۚ إِن يَكُنۡ غَنِيًّا أَوۡ فَقِيرًا فَٱللَّهُ أَوۡلَىٰ بِہِمَا‌ ۖ فَلَا تَتَّبِعُواْ ٱلۡهَوَىٰٓ أَن تَعۡدِلُواْ ۚ وَإِن تَلۡوُ ۥۤاْ أَوۡ تُعۡرِضُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرًا

ऐ ईमानवालों मज़बूती के साथ इन्साफ़ पर क़ायम रहो और ख़ुदा के लये गवाही दो अगरचे (ये गवाही) ख़ुद तुम्हारे या तुम्हारे मॉ बाप या क़राबतदारों के लिए खिलाफ़ (ही क्यो) न हो ख्वाह मालदार हो या मोहताज (क्योंकि) ख़ुदा तो (तुम्हारी बनिस्बत) उनपर ज्यादा मेहरबान है तो तुम (हक़ से) कतराने में ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और अगर घुमा फिरा के गवाही दोगे या बिल्कुल इन्कार करोगे तो (याद रहे जैसी करनी वैसी भरनी क्योंकि) जो कुछ तुम करते हो ख़ुद उससे ख़ूब वाक़िफ़ है

Verse 136

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ ءَامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَٱلۡكِتَـٰبِ ٱلَّذِى نَزَّلَ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَٱلۡڪِتَـٰبِ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ مِن قَبۡلُ ۚ وَمَن يَكۡفُرۡ بِٱللَّهِ وَمَلَـٰٓٮِٕكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأَخِرِ فَقَدۡ ضَلَّ ضَلَـٰلاَۢ بَعِيدًا

ऐ ईमानवालों ख़ुदा और उसके रसूल (मोहम्मद) पर और उसकी किताब पर जो उसने अपने रसूल (मोहम्मद) पर नाज़िल की है और उस किताब पर जो उसने पहले नाज़िल की ईमान लाओ और (ये भी याद रहे कि) जो शख्स ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और रोज़े आख़िरत का मुन्किर हुआ तो वह राहे रास्त से भटक के जूर जा पड़ा

Verse 137

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ثُمَّ كَفَرُواْ ثُمَّ ءَامَنُواْ ثُمَّ كَفَرُواْ ثُمَّ ٱزۡدَادُواْ كُفۡرًا لَّمۡ يَكُنِ ٱللَّهُ لِيَغۡفِرَ لَهُمۡ وَلَا لِيَہۡدِيَہُمۡ سَبِيلاَۢ

बेशक जो लोग ईमान लाए उसके बाद फ़िर काफ़िर हो गए फिर ईमान लाए और फिर उसके बाद काफ़िर हो गये और कुफ़्र में बढ़ते चले गए तो ख़ुदा उनकी मग़फ़िरत करेगा और न उन्हें राहे रास्त की हिदायत ही करेगा

Verse 138

بَشِّرِ ٱلۡمُنَـٰفِقِينَ بِأَنَّ لَهُمۡ عَذَابًا أَلِيمًا

(ऐ रसूल) मुनाफ़िक़ों को ख़ुशख़बरी दे दो कि उनके लिए ज़रूर दर्दनाक अज़ाब है

Verse 139

ٱلَّذِينَ يَتَّخِذُونَ ٱلۡكَـٰفِرِينَ أَوۡلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۚ أَيَبۡتَغُونَ عِندَهُمُ ٱلۡعِزَّةَ فَإِنَّ ٱلۡعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا

जो लोग मोमिनों को छोड़कर काफ़िरों को अपना सरपरस्त बनाते हैं क्या उनके पास इज्ज़त (व आबरू) की तलाश करते हैं इज्ज़त सारी बस ख़ुदा ही के लिए ख़ास है

Verse 140

وَقَدۡ نَزَّلَ عَلَيۡڪُمۡ فِى ٱلۡكِتَـٰبِ أَنۡ إِذَا سَمِعۡتُمۡ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ يُكۡفَرُ بِہَا وَيُسۡتَہۡزَأُ بِہَا فَلَا تَقۡعُدُواْ مَعَهُمۡ حَتَّىٰ يَخُوضُواْ فِى حَدِيثٍ غَيۡرِهِۦۤ ۚ إِنَّكُمۡ إِذًا مِّثۡلُهُمۡ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ جَامِعُ ٱلۡمُنَـٰفِقِينَ وَٱلۡكَـٰفِرِينَ فِى جَهَنَّمَ جَمِيعًا

(मुसलमानों) हालॉकि ख़ुदा तुम पर अपनी किताब कुरान में ये हुक्म नाज़िल कर चुका है कि जब तुम सुन लो कि ख़ुदा की आयतों से ईन्कार किया जाता है और उससे मसख़रापन किया जाता है तो तुम उन (कुफ्फ़ार) के साथ मत बैठो यहॉ तक कि वह किसी दूसरी बात में ग़ौर करने लगें वरना तुम भी उस वक्त उनके बराबर हो जाओगे उसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा तमाम मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों को (एक न एक दिन) जहन्नुम में जमा ही करेगा

Verse 141

ٱلَّذِينَ يَتَرَبَّصُونَ بِكُمۡ فَإِن كَانَ لَكُمۡ فَتۡحٌ مِّنَ ٱللَّهِ قَالُوٓاْ أَلَمۡ نَكُن مَّعَكُمۡ وَإِن كَانَ لِلۡكَـٰفِرِينَ نَصِيبٌ قَالُوٓاْ أَلَمۡ نَسۡتَحۡوِذۡ عَلَيۡكُمۡ وَنَمۡنَعۡكُم مِّنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۚ فَٱللَّهُ يَحۡكُمُ بَيۡنَڪُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَـٰمَةِ ۗ وَلَن يَجۡعَلَ ٱللَّهُ لِلۡكَـٰفِرِينَ عَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ سَبِيلاً

(वो मुनाफ़ेकीन) जो तुम्हारे मुन्तज़िर है (कि देखिए फ़तेह होती है या शिकस्त) तो अगर ख़ुदा की तरफ़ से तुम्हें फ़तेह हुई तो कहने लगे कि क्या हम तुम्हारे साथ न थे और अगर (फ़तेह का) हिस्सा काफ़िरों को मिला तो (काफ़िरों के तरफ़दार बनकर) कहते हैं क्या हम तुमपर ग़ालिब न आ गए थे (मगर क़सदन तुमको छोड़ दिया) और तुमको मोमिनीन (के हाथों) से हमने बचाया नहीं था (मुनाफ़िक़ों) क़यामत के दिन तो ख़ुदा तुम्हारे दरमियान फैसला करेगा और ख़ुदा ने काफ़िरों को मोमिनीन पर वर (ऊँचा) रहने की हरगिज़ कोई राह नहीं क़रार दी है

Verse 142

إِنَّ ٱلۡمُنَـٰفِقِينَ يُخَـٰدِعُونَ ٱللَّهَ وَهُوَ خَـٰدِعُهُمۡ وَإِذَا قَامُوٓاْ إِلَى ٱلصَّلَوٰةِ قَامُواْ كُسَالَىٰ يُرَآءُونَ ٱلنَّاسَ وَلَا يَذۡكُرُونَ ٱللَّهَ إِلَّا قَلِيلاً

बेशक मुनाफ़िक़ीन (अपने ख्याल में) ख़ुदा को फरेब देते हैं हालॉकि ख़ुदा ख़ुद उन्हें धोखा देता है और ये लोग जब नमाज़ पढ़ने खड़े होते हैं तो (बे दिल से) अलकसाए हुए खड़े होते हैं और सिर्फ लोगों को दिखाते हैं और दिल से तो ख़ुदा को कुछ यूं ही सा याद करते हैं

Verse 143

مُّذَبۡذَبِينَ بَيۡنَ ذَٲلِكَ لَآ إِلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ وَلَآ إِلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ وَمَن يُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ ۥ سَبِيلاً

इस कुफ़्र व ईमान के बीच अधड़ में पड़े झूल रहे हैं न उन (मुसलमानों) की तरफ़ न उन काफ़िरों की तरफ़ और (ऐ रसूल) जिसे ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे उसकी (हिदायत की) तुम हरगिज़ सबील नहीं कर सकते

Verse 144

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَتَّخِذُواْ ٱلۡكَـٰفِرِينَ أَوۡلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۚ أَتُرِيدُونَ أَن تَجۡعَلُواْ لِلَّهِ عَلَيۡڪُمۡ سُلۡطَـٰنًا مُّبِينًا

ऐ ईमान वालों मोमिनीन को छोड़कर काफ़िरों को (अपना) सरपरस्त न बनाओ क्या ये तुम चाहते हो कि ख़ुदा का सरीही इल्ज़ाम अपने सर क़ायम कर लो

Verse 145

إِنَّ ٱلۡمُنَـٰفِقِينَ فِى ٱلدَّرۡكِ ٱلۡأَسۡفَلِ مِنَ ٱلنَّارِ وَلَن تَجِدَ لَهُمۡ نَصِيرًا

इसमें तो शक ही नहीं कि मुनाफ़िक जहन्नुम के सबसे नीचे तबके में होंगे और (ऐ रसूल) तुम वहॉ किसी को उनका हिमायती भी न पाओगे

Verse 146

إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُواْ وَأَصۡلَحُواْ وَٱعۡتَصَمُواْ بِٱللَّهِ وَأَخۡلَصُواْ دِينَهُمۡ لِلَّهِ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ مَعَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ‌ ۖ وَسَوۡفَ يُؤۡتِ ٱللَّهُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ أَجۡرًا عَظِيمًا

मगर (हॉ) जिन लोगों ने (निफ़ाक़ से) तौबा कर ली और अपनी हालत दुरूस्त कर ली और ख़ुदा से लगे लिपटे रहे और अपने दीन को महज़ ख़ुदा के वास्ते निरा खरा कर लिया तो ये लोग मोमिनीन के साथ (बेहिश्त में) होंगे और मोमिनीन को ख़ुदा अनक़रीब ही बड़ा (अच्छा) बदला अता फ़रमाएगा

Verse 147

مَّا يَفۡعَلُ ٱللَّهُ بِعَذَابِڪُمۡ إِن شَكَرۡتُمۡ وَءَامَنتُمۡ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ شَاڪِرًا عَلِيمًا

अगर तुमने ख़ुदा का शुक्र किया और उसपर ईमान लाए तो ख़ुदा तुम पर अज़ाब करके क्या करेगा बल्कि ख़ुदा तो (ख़ुद शुक्र करने वालों का) क़दरदॉ और वाक़िफ़कार है

Verse 148

۞ لَّا يُحِبُّ ٱللَّهُ ٱلۡجَهۡرَ بِٱلسُّوٓءِ مِنَ ٱلۡقَوۡلِ إِلَّا مَن ظُلِمَ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ سَمِيعًا عَلِيمًا

ख़ुदा (किसी को) हॉक पुकार कर बुरा कहने को पसन्द नहीं करता मगर मज़लूम (ज़ालिम की बुराई बयान कर सकता है) और ख़ुदा तो (सबकी) सुनता है (और हर एक को) जानता है

Verse 149

إِن تُبۡدُواْ خَيۡرًا أَوۡ تُخۡفُوهُ أَوۡ تَعۡفُواْ عَن سُوٓءٍ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَفُوًّا قَدِيرًا

अगर खुल्लम खुल्ला नेकी करते हो या छिपा कर या किसी की बुराई से दरगुज़र करते हो तो तो ख़ुदा भी बड़ा दरगुज़र करने वाला (और) क़ादिर है

Verse 150

إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكۡفُرُونَ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيُرِيدُونَ أَن يُفَرِّقُواْ بَيۡنَ ٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيَقُولُونَ نُؤۡمِنُ بِبَعۡضٍ وَنَڪۡفُرُ بِبَعۡضٍ وَيُرِيدُونَ أَن يَتَّخِذُواْ بَيۡنَ ذَٲلِكَ سَبِيلاً

बेशक जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों से इन्कार करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूलों में तफ़रक़ा डालना चाहते हैं और कहते हैं कि हम बाज़ (पैग़म्बरों) पर ईमान लाए हैं और बाज़ का इन्कार करते हैं और चाहते हैं कि इस (कुफ़्र व ईमान) के दरमियान एक दूसरी राह निकलें

Verse 151

أُوْلَـٰٓٮِٕكَ هُمُ ٱلۡكَـٰفِرُونَ حَقًّا ۚ وَأَعۡتَدۡنَا لِلۡكَـٰفِرِينَ عَذَابًا مُّهِينًا

यही लोग हक़ीक़तन काफ़िर हैं और हमने काफ़िरों के वास्ते ज़िल्लत देने वाला अज़ाब तैयार कर रखा है

Verse 152

وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَلَمۡ يُفَرِّقُواْ بَيۡنَ أَحَدٍ مِّنۡہُمۡ أُوْلَـٰٓٮِٕكَ سَوۡفَ يُؤۡتِيهِمۡ أُجُورَهُمۡ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا

और जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों पर ईमान लाए और उनमें से किसी में तफ़रक़ा नहीं करते तो ऐसे ही लोगों को ख़ुदा बहुत जल्द उनका अज्र अता फ़रमाएगा और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

Verse 153

يَسۡـَٔلُكَ أَهۡلُ ٱلۡكِتَـٰبِ أَن تُنَزِّلَ عَلَيۡہِمۡ كِتَـٰبًا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ۚ فَقَدۡ سَأَلُواْ مُوسَىٰٓ أَكۡبَرَ مِن ذَٲلِكَ فَقَالُوٓاْ أَرِنَا ٱللَّهَ جَهۡرَةً فَأَخَذَتۡهُمُ ٱلصَّـٰعِقَةُ بِظُلۡمِهِمۡ ۚ ثُمَّ ٱتَّخَذُواْ ٱلۡعِجۡلَ مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَتۡهُمُ ٱلۡبَيِّنَـٰتُ فَعَفَوۡنَا عَن ذَٲلِكَ ۚ وَءَاتَيۡنَا مُوسَىٰ سُلۡطَـٰنًا مُّبِينًا

(ऐ रसूल) अहले किताब (यहूदी) जो तुमसे (ये) दरख्वास्त करते हैं कि तुम उनपर एक किताब आसमान से उतरवा दो (तुम उसका ख्याल न करो क्योंकि) ये लोग मूसा से तो इससे कहीं बढ़ (बढ़) के दरख्वास्त कर चुके हैं चुनान्चे कहने लगे कि हमें ख़ुदा को खुल्लम खुल्ला दिखा दो तब उनकी शरारत की वजह से बिजली ने ले डाला फिर (बावजूद के) उन लोगों के पास तौहीद की वाजैए और रौशन (दलीलें) आ चुकी थी उसके बाद भी उन लोगों ने बछड़े को (ख़ुदा) बना लिया फिर हमने उससे भी दरगुज़र किया और मूसा को हमने सरीही ग़लबा अता किया

Verse 154

وَرَفَعۡنَا فَوۡقَهُمُ ٱلطُّورَ بِمِيثَـٰقِهِمۡ وَقُلۡنَا لَهُمُ ٱدۡخُلُواْ ٱلۡبَابَ سُجَّدًا وَقُلۡنَا لَهُمۡ لَا تَعۡدُواْ فِى ٱلسَّبۡتِ وَأَخَذۡنَا مِنۡہُم مِّيثَـٰقًا غَلِيظًا

और हमने उनके एहद व पैमान की वजह से उनके (सर) पर (कोहे) तूर को लटका दिया और हमने उनसे कहा कि (शहर के) दरवाज़े में सजदा करते हुए दाख़िल हो और हमने (ये भी) कहा कि तुम हफ्ते के दिन (हमारे हुक्म से) तजावुज़ न करना और हमने उनसे बहुत मज़बूत एहदो पैमान ले लिया

Verse 155

فَبِمَا نَقۡضِہِم مِّيثَـٰقَهُمۡ وَكُفۡرِهِم بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَقَتۡلِهِمُ ٱلۡأَنۢبِيَآءَ بِغَيۡرِ حَقٍّ وَقَوۡلِهِمۡ قُلُوبُنَا غُلۡفُۢ ۚ بَلۡ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَيۡہَا بِكُفۡرِهِمۡ فَلَا يُؤۡمِنُونَ إِلَّا قَلِيلاً

फिर उनके अपने एहद तोड़ डालने और एहकामे ख़ुदा से इन्कार करने और नाहक़ अम्बिया को क़त्ल करने और इतरा कर ये कहने की वजह से कि हमारे दिलों पर ग़िलाफ़ चढे हुए हैं (ये तो नहीं) बल्कि ख़ुदा ने उनके कुफ़्र की वजह से उनके दिलों पर मोहर कर दी है तो चन्द आदमियों के सिवा ये लोग ईमान नहीं लाते

Verse 156

وَبِكُفۡرِهِمۡ وَقَوۡلِهِمۡ عَلَىٰ مَرۡيَمَ بُہۡتَـٰنًا عَظِيمًا

और उनके काफ़िर होने और मरियम पर बहुत बड़ा बोहतान बॉधने कि वजह से

Verse 157

وَقَوۡلِهِمۡ إِنَّا قَتَلۡنَا ٱلۡمَسِيحَ عِيسَى ٱبۡنَ مَرۡيَمَ رَسُولَ ٱللَّهِ وَمَا قَتَلُوهُ وَمَا صَلَبُوهُ وَلَـٰكِن شُبِّهَ لَهُمۡ ۚ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ ٱخۡتَلَفُواْ فِيهِ لَفِى شَكٍّ مِّنۡهُ ۚ مَا لَهُم بِهِۦ مِنۡ عِلۡمٍ إِلَّا ٱتِّبَاعَ ٱلظَّنِّ ۚ وَمَا قَتَلُوهُ يَقِينَۢا

और उनके यह कहने की वजह से कि हमने मरियम के बेटे ईसा (स.) ख़ुदा के रसूल को क़त्ल कर डाला हालॉकि न तो उन लोगों ने उसे क़त्ल ही किया न सूली ही दी उनके लिए (एक दूसरा शख्स ईसा) से मुशाबेह कर दिया गया और जो लोग इस बारे में इख्तेलाफ़ करते हैं यक़ीनन वह लोग (उसके हालत) की तरफ़ से धोखे में (आ पड़े) हैं उनको उस (वाक़िये) की ख़बर ही नहीं मगर फ़क्त अटकल के पीछे (पड़े) हैं और ईसा को उन लोगों ने यक़ीनन क़त्ल नहीं किया

Verse 158

بَل رَّفَعَهُ ٱللَّهُ إِلَيۡهِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا

बल्कि ख़ुदा ने उन्हें अपनी तरफ़ उठा लिया और ख़ुदा तो बड़ा ज़बरदस्त तदबीर वाला है

Verse 159

وَإِن مِّنۡ أَهۡلِ ٱلۡكِتَـٰبِ إِلَّا لَيُؤۡمِنَنَّ بِهِۦ قَبۡلَ مَوۡتِهِۦ‌ ۖ وَيَوۡمَ ٱلۡقِيَـٰمَةِ يَكُونُ عَلَيۡہِمۡ شَہِيدًا

और (जब ईसा मेहदी मौऊद के ज़हूर के वक्त आसमान से उतरेंगे तो) अहले किताब में से कोई शख्स ऐसा न होगा जो उनपर उनके मरने के क़ब्ल ईमान न लाए और ख़ुद ईसा क़यामत के दिन उनके ख़िलाफ़ गवाही देंगे

Verse 160

فَبِظُلۡمٍ مِّنَ ٱلَّذِينَ هَادُواْ حَرَّمۡنَا عَلَيۡہِمۡ طَيِّبَـٰتٍ أُحِلَّتۡ لَهُمۡ وَبِصَدِّهِمۡ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ كَثِيرًا

ग़रज़ यहूदियों की (उन सब) शरारतों और गुनाह की वजह से हमने उनपर वह साफ़ सुथरी चीजें ज़ो उनके लिए हलाल की गयी थीं हराम कर दी और उनके ख़ुदा की राह से बहुत से लोगों को रोकने कि वजह से भी

Verse 161

وَأَخۡذِهِمُ ٱلرِّبَوٰاْ وَقَدۡ نُہُواْ عَنۡهُ وَأَكۡلِهِمۡ أَمۡوَٲلَ ٱلنَّاسِ بِٱلۡبَـٰطِلِ ۚ وَأَعۡتَدۡنَا لِلۡكَـٰفِرِينَ مِنۡہُمۡ عَذَابًا أَلِيمًا

और बावजूद मुमानिअत सूद खा लेने और नाहक़ ज़बरदस्ती लोगों के माल खाने की वजह से उनमें से जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया उनके वास्ते हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है

Verse 162

لَّـٰكِنِ ٱلرَّٲسِخُونَ فِى ٱلۡعِلۡمِ مِنۡہُمۡ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَ يُؤۡمِنُونَ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبۡلِكَ ۚ وَٱلۡمُقِيمِينَ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ وَٱلۡمُؤۡتُونَ ٱلزَّڪَوٰةَ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأَخِرِ أُوْلَـٰٓٮِٕكَ سَنُؤۡتِيہِمۡ أَجۡرًا عَظِيمًا

लेकिन (ऐ रसूल) उनमें से जो लोग इल्म (दीन) में बड़े मज़बूत पाए पर फ़ायज़ हैं वह और ईमान वाले तो जो (किताब) तुमपर नाज़िल हुई है (सब पर ईमान रखते हैं) और से नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात अदा करते हैं और ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत का यक़ीन रखते हैं ऐसे ही लोगों को हम अनक़रीब बहुत बड़ा अज्र अता फ़रमाएंगे

Verse 163

۞ إِنَّآ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ كَمَآ أَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰ نُوحٍ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ مِنۢ بَعۡدِهِۦ ۚ وَأَوۡحَيۡنَآ إِلَىٰٓ إِبۡرَٲهِيمَ وَإِسۡمَـٰعِيلَ وَإِسۡحَـٰقَ وَيَعۡقُوبَ وَٱلۡأَسۡبَاطِ وَعِيسَىٰ وَأَيُّوبَ وَيُونُسَ وَهَـٰرُونَ وَسُلَيۡمَـٰنَ ۚ وَءَاتَيۡنَا دَاوُ ۥدَ زَبُورًا

(ऐ रसूल) हमने तुम्हारे पास (भी) तो इसी तरह ‘वही’ भेजी जिस तरह नूह और उसके बाद वाले पैग़म्बरों पर भेजी थी और जिस तरह इबराहीम और इस्माइल और इसहाक़ और याक़ूब और औलादे याक़ूब व ईसा व अय्यूब व युनुस व हारून व सुलेमान के पास ‘वही’ भेजी थी और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता की

Verse 164

وَرُسُلاً قَدۡ قَصَصۡنَـٰهُمۡ عَلَيۡكَ مِن قَبۡلُ وَرُسُلاً لَّمۡ نَقۡصُصۡهُمۡ عَلَيۡكَ ۚ وَكَلَّمَ ٱللَّهُ مُوسَىٰ تَڪۡلِيمًا

जिनका हाल हमने तुमसे पहले ही बयान कर दिया और बहुत से ऐसे रसूल (भेजे) जिनका हाल तुमसे बयान नहीं किया और ख़ुदा ने मूसा से (बहुत सी) बातें भी कीं

Verse 165

رُّسُلاً مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةُۢ بَعۡدَ ٱلرُّسُلِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا

और हमने नेक लोगों को बेहिश्त की ख़ुशख़बरी देने वाले और बुरे लोगों को अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बर (भेजे) ताकि पैग़म्बरों के आने के बाद लोगों की ख़ुदा पर कोई हुज्जत बाक़ी न रह जाए और ख़ुदा तो बड़ा ज़बरदस्त हकीम है (ये कुफ्फ़ार नहीं मानते न मानें)

Verse 166

لَّـٰكِنِ ٱللَّهُ يَشۡہَدُ بِمَآ أَنزَلَ إِلَيۡكَ‌ ۖ أَنزَلَهُ ۥ بِعِلۡمِهِۦ‌ ۖ وَٱلۡمَلَـٰٓٮِٕكَةُ يَشۡهَدُونَ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَہِيدًا

मगर ख़ुदा तो इस पर गवाही देता है जो कुछ तुम पर नाज़िल किया है ख़ूब समझ बूझ कर नाज़िल किया है (बल्कि) उसकी गवाही तो फ़रिश्ते तक देते हैं हालॉकि ख़ुदा गवाही के लिए काफ़ी है

Verse 167

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَصَدُّواْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ قَدۡ ضَلُّواْ ضَلَـٰلاَۢ بَعِيدًا

बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया और ख़ुदा की राह से (लोगों) को रोका वह राहे रास्त से भटक के बहुत दूर जा पडे

Verse 168

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَظَلَمُواْ لَمۡ يَكُنِ ٱللَّهُ لِيَغۡفِرَ لَهُمۡ وَلَا لِيَہۡدِيَهُمۡ طَرِيقًا

बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया और (उस पर) ज़ुल्म (भी) करते रहे न तो ख़ुदा उनको बख्शेगा ही और न ही उन्हें किसी तरीक़े की हिदायत करेगा

Verse 169

إِلَّا طَرِيقَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيہَآ أَبَدًا ۚ وَكَانَ ذَٲلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًا

मगर (हॉ) जहन्नुम का रास्ता (दिखा देगा) जिसमें ये लोग हमेशा (पडे) रहेंगे और ये तो ख़ुदा के वास्ते बहुत ही आसान बात है

Verse 170

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلنَّاسُ قَدۡ جَآءَكُمُ ٱلرَّسُولُ بِٱلۡحَقِّ مِن رَّبِّكُمۡ فَـَٔامِنُواْ خَيۡرًا لَّكُمۡ ۚ وَإِن تَكۡفُرُواْ فَإِنَّ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا

ऐ लोगों तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से रसूल (मोहम्मद) दीने हक़ के साथ आ चुके हैं ईमान लाओ (यही) तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अगर इन्कार करोगे तो (समझ रखो कि) जो कुछ ज़मीन और आसमानों में है सब ख़ुदा ही का है और ख़ुदा बड़ा वाक़िफ़कार हकीम है

Verse 171

يَـٰٓأَهۡلَ ٱلۡڪِتَـٰبِ لَا تَغۡلُواْ فِى دِينِڪُمۡ وَلَا تَقُولُواْ عَلَى ٱللَّهِ إِلَّا ٱلۡحَقَّ ۚ إِنَّمَا ٱلۡمَسِيحُ عِيسَى ٱبۡنُ مَرۡيَمَ رَسُولُ ٱللَّهِ وَڪَلِمَتُهُ ۥۤ أَلۡقَٮٰهَآ إِلَىٰ مَرۡيَمَ وَرُوحٌ مِّنۡهُ‌ ۖ فَـَٔامِنُواْ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ‌ ۖ وَلَا تَقُولُواْ ثَلَـٰثَةٌ ۚ ٱنتَهُواْ خَيۡرًا لَّڪُمۡ ۚ إِنَّمَا ٱللَّهُ إِلَـٰهٌ وَٲحِدٌ‌ ۖ سُبۡحَـٰنَهُ ۥۤ أَن يَكُونَ لَهُ ۥ وَلَدٌ‌ ۢ لَّهُ ۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَمَا فِى ٱلۡأَرۡضِ ۗ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَڪِيلاً

ऐ अहले किताब अपने दीन में हद (एतदाल) से तजावुज़ न करो और ख़ुदा की शान में सच के सिवा (कोई दूसरी बात) न कहो मरियम के बेटे ईसा मसीह (न ख़ुदा थे न ख़ुदा के बेटे) पस ख़ुदा के एक रसूल और उसके कलमे (हुक्म) थे जिसे ख़ुदा ने मरियम के पास भेज दिया था (कि हामला हो जा) और ख़ुदा की तरफ़ से एक जान थे पस ख़ुदा और उसके रसूलों पर ईमान लाओ और तीन (ख़ुदा) के क़ायल न बनो (तसलीस से) बाज़ रहो (और) अपनी भलाई (तौहीद) का क़सद करो अल्लाह तो बस यकता माबूद है वह उस (नुक्स) से पाक व पाकीज़ा है उसका कोई लड़का हो (उसे लड़के की हाजत ही क्या है) जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब तो उसी का है और ख़ुदा तो कारसाज़ी में काफ़ी है

Verse 172

لَّن يَسۡتَنكِفَ ٱلۡمَسِيحُ أَن يَكُونَ عَبۡدًا لِّلَّهِ وَلَا ٱلۡمَلَـٰٓٮِٕكَةُ ٱلۡمُقَرَّبُونَ ۚ وَمَن يَسۡتَنكِفۡ عَنۡ عِبَادَتِهِۦ وَيَسۡتَڪۡبِرۡ فَسَيَحۡشُرُهُمۡ إِلَيۡهِ جَمِيعًا

न तो मसीह ही ख़ुदा का बन्दा होने से हरगिज़ इन्कार कर सकते हैं और न (ख़ुदा के) मुक़र्रर फ़रिश्ते और (याद रहे) जो शख्स उसके बन्दा होने से इन्कार करेगा और शेख़ी करेगा तो अनक़रीब ही ख़ुदा उन सबको अपनी तरफ़ उठा लेगा (और हर एक को उसके काम की सज़ा देगा)

Verse 173

فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَيُوَفِّيهِمۡ أُجُورَهُمۡ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضۡلِهِۦ‌ ۖ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱسۡتَنكَفُواْ وَٱسۡتَكۡبَرُواْ فَيُعَذِّبُهُمۡ عَذَابًا أَلِيمًا وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا

पस जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया है और अच्छे (अच्छे) काम किए हैं उनका उन्हें सवाब पूरा पूरा भर देगा बल्कि अपने फ़ज़ल (व करम) से कुछ और ज्यादा ही देगा और लोग उसका बन्दा होने से इन्कार करते थे और शेख़ी करते थे उन्हें तो दर्दनाक अज़ाब में मुब्तिला करेगा और लुत्फ़ ये है कि वह लोग ख़ुदा के सिवा न अपना सरपरस्त ही पाएंगे और न मददगार

Verse 174

يَـٰٓأَيُّہَا ٱلنَّاسُ قَدۡ جَآءَكُم بُرۡهَـٰنٌ مِّن رَّبِّكُمۡ وَأَنزَلۡنَآ إِلَيۡكُمۡ نُورًا مُّبِينًا

ऐ लोगों इसमें तो शक ही नहीं कि तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से (दीने हक़ की) दलील आ चुकी और हम तुम्हारे पास एक चमकता हुआ नूर नाज़िल कर चुके हैं

Verse 175

فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِٱللَّهِ وَٱعۡتَصَمُواْ بِهِۦ فَسَيُدۡخِلُهُمۡ فِى رَحۡمَةٍ مِّنۡهُ وَفَضۡلٍ وَيَہۡدِيہِمۡ إِلَيۡهِ صِرَٲطًا مُّسۡتَقِيمًا

पस जो लोग ख़ुदा पर ईमान लाए और उसी से लगे लिपटे रहे तो ख़ुदा भी उन्हें अनक़रीब ही अपनी रहमत व फ़ज़ल के सादाब बाग़ो में पहुंचा देगा और उन्हे अपने हुज़ूरी का सीधा रास्ता दिखा देगा 175

Verse 176

يَسۡتَفۡتُونَكَ قُلِ ٱللَّهُ يُفۡتِيڪُمۡ فِى ٱلۡكَلَـٰلَةِ ۚ إِنِ ٱمۡرُؤٌاْ هَلَكَ لَيۡسَ لَهُ ۥ وَلَدٌ وَلَهُ ۥۤ أُخۡتٌ فَلَهَا نِصۡفُ مَا تَرَكَ ۚ وَهُوَ يَرِثُهَآ إِن لَّمۡ يَكُن لَّهَا وَلَدٌ ۚ فَإِن كَانَتَا ٱثۡنَتَيۡنِ فَلَهُمَا ٱلثُّلُثَانِ مِمَّا تَرَكَ ۚ وَإِن كَانُوٓاْ إِخۡوَةً رِّجَالاً وَنِسَآءً فَلِلذَّكَرِ مِثۡلُ حَظِّ ٱلۡأُنثَيَيۡنِ ۗ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَڪُمۡ أَن تَضِلُّواْ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىۡءٍ عَلِيمُۢ

(ऐ रसूल) तुमसे लोग फ़तवा तलब करते हैं तुम कह दो कि कलाला (भाई बहन) के बारे में ख़ुदा तो ख़ुद तुम्हे फ़तवा देता है कि अगर कोई ऐसा शख्स मर जाए कि उसके न कोई लड़का बाला हो (न मॉ बाप) और उसके (सिर्फ) एक बहन हो तो उसका तर्के से आधा होगा (और अगर ये बहन मर जाए) और उसके कोई औलाद न हो (न मॉ बाप) तो उसका वारिस बस यही भाई होगा और अगर दो बहनें (ज्यादा) हों तो उनको (भाई के) तर्के से दो तिहाई मिलेगा और अगर किसी के वारिस भाई बहन दोनों (मिले जुले) हों तो मर्द को औरत के हिस्से का दुगना मिलेगा तुम लोगों के भटकने के ख्याल से ख़ुदा अपने एहकाम वाजेए करके बयान फ़रमाता है और ख़ुदा तो हर चीज़ से वाक़िफ़ है