Surah Al-Isra
Quran Surah
Surah 17: Al-Isra
الإسراء
Verse count: 111
Opening Bismillah
بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपालु और अत्यन्त दयावान हैं।
Verse 1
سُبۡحَـٰنَ ٱلَّذِىٓ أَسۡرَىٰ بِعَبۡدِهِۦ لَيۡلاً مِّنَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ إِلَى ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡأَقۡصَا ٱلَّذِى بَـٰرَكۡنَا حَوۡلَهُ ۥ لِنُرِيَهُ ۥ مِنۡ ءَايَـٰتِنَآ ۚ إِنَّهُ ۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ
वह ख़ुदा (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है जिसने अपने बन्दों को रातों रात मस्जिदुल हराम (ख़ान ऐ काबा) से मस्जिदुल अक़सा (आसमानी मस्जिद) तक की सैर कराई जिसके चौगिर्द हमने हर किस्म की बरकत मुहय्या कर रखी हैं ताकि हम उसको (अपनी कुदरत की) निशानियाँ दिखाए इसमें शक़ नहीं कि (वह सब कुछ) सुनता (और) देखता है
Verse 2
وَءَاتَيۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَـٰبَ وَجَعَلۡنَـٰهُ هُدًى لِّبَنِىٓ إِسۡرَٲٓءِيلَ أَلَّا تَتَّخِذُواْ مِن دُونِى وَڪِيلاً
और हमने मूसा को किताब (तौरैत) अता की और उस को बनी इसराईल की रहनुमा क़रार दिया (और हुक्म दे दिया) कि ऐ उन लोगों की औलाद जिन्हें हम ने नूह के साथ कश्ती में सवार किया था
Verse 3
ذُرِّيَّةَ مَنۡ حَمَلۡنَا مَعَ نُوحٍ ۚ إِنَّهُ ۥ كَانَ عَبۡدًا شَكُورًا
मेरे सिवा किसी को अपना कारसाज़ न बनाना बेशक नूह बड़ा शुक्र गुज़ार बन्दा था
Verse 4
وَقَضَيۡنَآ إِلَىٰ بَنِىٓ إِسۡرَٲٓءِيلَ فِى ٱلۡكِتَـٰبِ لَتُفۡسِدُنَّ فِى ٱلۡأَرۡضِ مَرَّتَيۡنِ وَلَتَعۡلُنَّ عُلُوًّا ڪَبِيرًا
और हमने बनी इसराईल से इसी किताब (तौरैत) में साफ साफ बयान कर दिया था कि तुम लोग रुए ज़मीन पर दो मरतबा ज़रुर फसाद फैलाओगे और बड़ी सरकशी करोगे
Verse 5
فَإِذَا جَآءَ وَعۡدُ أُولَٮٰهُمَا بَعَثۡنَا عَلَيۡڪُمۡ عِبَادًا لَّنَآ أُوْلِى بَأۡسٍ شَدِيدٍ فَجَاسُواْ خِلَـٰلَ ٱلدِّيَارِ ۚ وَكَانَ وَعۡدًا مَّفۡعُولاً
फिर जब उन दो फसादों में पहले का वक्त अा पहुँचा तो हमने तुम पर कुछ अपने बन्दों (नजतुलनस्र) और उसकी फौज को मुसल्लत (ग़ालिब) कर दिया जो बड़े सख्त लड़ने वाले थे तो वह लोग तुम्हारे घरों के अन्दर घुसे (और खूब क़त्ल व ग़ारत किया) और ख़ुदा के अज़ाब का वायदा जो पूरा होकर रहा
Verse 6
ثُمَّ رَدَدۡنَا لَكُمُ ٱلۡڪَرَّةَ عَلَيۡہِمۡ وَأَمۡدَدۡنَـٰكُم بِأَمۡوَٲلٍ وَبَنِينَ وَجَعَلۡنَـٰكُمۡ أَڪۡثَرَ نَفِيرًا
फिर हमने तुमको दोबारा उन पर ग़लबा देकर तुम्हारे दिन फेरे और माल से और बेटों से तुम्हारी मदद की और तुमको बड़े जत्थे वाला बना दिया
Verse 7
إِنۡ أَحۡسَنتُمۡ أَحۡسَنتُمۡ لِأَنفُسِكُمۡ ۖ وَإِنۡ أَسَأۡتُمۡ فَلَهَا ۚ فَإِذَا جَآءَ وَعۡدُ ٱلۡأَخِرَةِ لِيَسُـۥۤـُٔواْ وُجُوهَڪُمۡ وَلِيَدۡخُلُواْ ٱلۡمَسۡجِدَ ڪَمَا دَخَلُوهُ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَلِيُتَبِّرُواْ مَا عَلَوۡاْ تَتۡبِيرًا
अगर तुम अच्छे काम करोगे तो अपने फायदे के लिए अच्छे काम करोगे और अगर तुम बुरे काम करोगे तो (भी) अपने ही लिए फिर जब दूसरे वक्त क़ा वायदा आ पहुँचा तो (हमने तैतूस रोगी को तुम पर मुसल्लत किया) ताकि वह लोग (मारते मारते) तुम्हारे चेहरे बिगाड़ दें (कि पहचाने न जाओ) और जिस तरह पहली दफा मस्जिद बैतुल मुक़द्दस में घुस गये थे उसी तरह फिर घुस पड़ें और जिस चीज़ पर क़ाबू पाए खूब अच्छी तरह बरबाद कर दी
Verse 8
عَسَىٰ رَبُّكُمۡ أَن يَرۡحَمَكُمۡ ۚ وَإِنۡ عُدتُّمۡ عُدۡنَا ۢ وَجَعَلۡنَا جَهَنَّمَ لِلۡكَـٰفِرِينَ حَصِيرًا
(अब भी अगर तुम चैन से रहो तो) उम्मीद है कि तुम्हारा परवरदिगार तुम पर तरस खाए और अगर (कहीं) वही शरारत करोगे तो हम भी फिर पकड़ेंगे और हमने तो काफिरों के लिए जहन्नुम को क़ैद खाना बना ही रखा है
Verse 9
إِنَّ هَـٰذَا ٱلۡقُرۡءَانَ يَہۡدِى لِلَّتِى هِىَ أَقۡوَمُ وَيُبَشِّرُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ٱلَّذِينَ يَعۡمَلُونَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أَنَّ لَهُمۡ أَجۡرًا كَبِيرًا
इसमें शक़ नहीं कि ये क़ुरान उस राह की हिदायत करता है जो सबसे ज्यादा सीधी है और जो ईमानदार अच्छे अच्छे काम करते हैं उनको ये खुशख़बरी देता है कि उनके लिए बहुत बड़ा अज्र और सवाब (मौजूद) है
Verse 10
وَأَنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡأَخِرَةِ أَعۡتَدۡنَا لَهُمۡ عَذَابًا أَلِيمًا
और ये भी कि बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते हैं उनके लिए हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है
Verse 11
وَيَدۡعُ ٱلۡإِنسَـٰنُ بِٱلشَّرِّ دُعَآءَهُ ۥ بِٱلۡخَيۡرِ ۖ وَكَانَ ٱلۡإِنسَـٰنُ عَجُولاً
और आदमी कभी (आजिज़ होकर अपने हक़ में) बुराई (अज़ाब वग़ैरह की दुआ) इस तरह माँगता है जिस तरह अपने लिए भलाई की दुआ करता है और आदमी तो बड़ा जल्दबाज़ है
Verse 12
وَجَعَلۡنَا ٱلَّيۡلَ وَٱلنَّہَارَ ءَايَتَيۡنِ ۖ فَمَحَوۡنَآ ءَايَةَ ٱلَّيۡلِ وَجَعَلۡنَآ ءَايَةَ ٱلنَّہَارِ مُبۡصِرَةً لِّتَبۡتَغُواْ فَضۡلاً مِّن رَّبِّكُمۡ وَلِتَعۡلَمُواْ عَدَدَ ٱلسِّنِينَ وَٱلۡحِسَابَ ۚ وَڪُلَّ شَىۡءٍ فَصَّلۡنَـٰهُ تَفۡصِيلاً
और हमने रात और दिन को (अपनी क़ुदरत की) दो निशानियाँ क़रार दिया फिर हमने रात की निशानी (चाँद) को धुँधला बनाया और दिन की निशानी (सूरज) को रौशन बनाया (कि सब चीज़े दिखाई दें) ताकि तुम लोग अपने परवरदिगार का फज़ल ढूँढते फिरों और ताकि तुम बरसों की गिनती और हिसाब को जानो (बूझों) और हमने हर चीज़ को खूब अच्छी तरह तफसील से बयान कर दिया है
Verse 13
وَكُلَّ إِنسَـٰنٍ أَلۡزَمۡنَـٰهُ طَـٰٓٮِٕرَهُ ۥ فِى عُنُقِهِۦ ۖ وَنُخۡرِجُ لَهُ ۥ يَوۡمَ ٱلۡقِيَـٰمَةِ ڪِتَـٰبًا يَلۡقَٮٰهُ مَنشُورًا
और हमने हर आदमी के नामए अमल को उसके गले का हार बना दिया है (कि उसकी किस्मत उसके साथ रहे) और क़यामत के दिन हम उसे उसके सामने निकल के रख देगें कि वह उसको एक खुली हुई किताब अपने रुबरु पाएगा
Verse 14
ٱقۡرَأۡ كِتَـٰبَكَ كَفَىٰ بِنَفۡسِكَ ٱلۡيَوۡمَ عَلَيۡكَ حَسِيبًا
और हम उससे कहेंगें कि अपना नामए अमल पढ़ले और आज अपने हिसाब के लिए तू आप ही काफी हैं
Verse 15
مَّنِ ٱهۡتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَہۡتَدِى لِنَفۡسِهِۦ ۖ وَمَن ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيۡہَا ۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزۡرَ أُخۡرَىٰ ۗ وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّىٰ نَبۡعَثَ رَسُولاً
जो शख़्श रुबरु होता है तो बस अपने फायदे के लिए यह पर आता है और जो शख़्श गुमराह होता है तो उसने भटक कर अपना आप बिगाड़ा और कोई शख़्श किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ अपने सर नहीं लेगा और हम तो जब तक रसूल को भेजकर तमाम हुज्जत न कर लें किसी पर अज़ाब नहीं किया करते
Verse 16
وَإِذَآ أَرَدۡنَآ أَن نُّہۡلِكَ قَرۡيَةً أَمَرۡنَا مُتۡرَفِيہَا فَفَسَقُواْ فِيہَا فَحَقَّ عَلَيۡہَا ٱلۡقَوۡلُ فَدَمَّرۡنَـٰهَا تَدۡمِيرًا
और हमको जब किसी बस्ती का वीरान करना मंज़ूर होता है तो हम वहाँ के खुशहालों को (इताअत का) हुक्म देते हैं तो वह लोग उसमें नाफरमानियाँ करने लगे तब वह बस्ती अज़ाब की मुस्तहक़ होगी उस वक्त हमने उसे अच्छी तरह तबाह व बरबाद कर दिया
Verse 17
وَكَمۡ أَهۡلَكۡنَا مِنَ ٱلۡقُرُونِ مِنۢ بَعۡدِ نُوحٍ ۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ بِذُنُوبِ عِبَادِهِۦ خَبِيرَۢا بَصِيرًا
और नूह के बाद से (उस वक्त तक) हमने कितनी उम्मतों को हलाक कर मारा और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार अपने बन्दों के गुनाहों को जानने और देखने के लिए काफी है
Verse 18
مَّن كَانَ يُرِيدُ ٱلۡعَاجِلَةَ عَجَّلۡنَا لَهُ ۥ فِيهَا مَا نَشَآءُ لِمَن نُّرِيدُ ثُمَّ جَعَلۡنَا لَهُ ۥ جَهَنَّمَ يَصۡلَٮٰهَا مَذۡمُومًا مَّدۡحُورًا
(और गवाह याहिद की ज़रुरत नहीं) और जो शख़्श दुनिया का ख्वाहाँ हो तो हम जिसे चाहते और जो चाहते हैं उसी दुनिया में सिरदस्त (फ़ौरन) उसे अता करते हैं (मगर) फिर हमने उसके लिए तो जहन्नुम ठहरा ही रखा है कि वह उसमें बुरी हालत से रौंदा हुआ दाख़िल होगा
Verse 19
وَمَنۡ أَرَادَ ٱلۡأَخِرَةَ وَسَعَىٰ لَهَا سَعۡيَهَا وَهُوَ مُؤۡمِنٌ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ ڪَانَ سَعۡيُهُم مَّشۡكُورًا
और जो शख़्श आख़िर का मुतमइनी हो और उसके लिए खूब जैसी चाहिए कोशिश भी की और वह ईमानदार भी है तो यही वह लोग हैं जिनकी कोशिश मक़बूल होगी
Verse 20
كُلاًّ نُّمِدُّ هَـٰٓؤُلَآءِ وَهَـٰٓؤُلَآءِ مِنۡ عَطَآءِ رَبِّكَ ۚ وَمَا كَانَ عَطَآءُ رَبِّكَ مَحۡظُورًا
(ऐ रसूल) उनको (ग़रज़ सबको) हम ही तुम्हारे परवरदिगार की (अपनी) बख़्शिस से मदद देते हैं और तुम्हारे परवरदिगार की बख़्शिस तो (आम है) किसी पर बन्द नहीं
Verse 21
ٱنظُرۡ كَيۡفَ فَضَّلۡنَا بَعۡضَہُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٍ ۚ وَلَلۡأَخِرَةُ أَكۡبَرُ دَرَجَـٰتٍ وَأَكۡبَرُ تَفۡضِيلاً
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो कि हमने बाज़ लोगों को बाज़ पर कैसी फज़ीलत दी है और आख़िरत के दर्जे तो यक़ीनन (यहाँ से) कहीं बढ़के है और वहाँ की फज़ीलत भी तो कैसी बढ़ कर है
Verse 22
لَّا تَجۡعَلۡ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَتَقۡعُدَ مَذۡمُومًا مَّخۡذُولاً
और देखो कहीं ख़ुदा के साथ दूसरे को (उसका) शरीक न बनाना वरना तुम बुरे हाल में ज़लील रुसवा बैठै के बैठें रह जाओगे
Verse 23
۞ وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعۡبُدُوٓاْ إِلَّآ إِيَّاهُ وَبِٱلۡوَٲلِدَيۡنِ إِحۡسَـٰنًا ۚ إِمَّا يَبۡلُغَنَّ عِندَكَ ٱلۡڪِبَرَ أَحَدُهُمَآ أَوۡ كِلَاهُمَا فَلَا تَقُل لَّهُمَآ أُفٍّ وَلَا تَنۡہَرۡهُمَا وَقُل لَّهُمَا قَوۡلاً ڪَرِيمًا
और तुम्हारे परवरदिगार ने तो हुक्म ही दिया है कि उसके सिवा किसी दूसरे की इबादत न करना और माँ बाप से नेकी करना अगर उनमें से एक या दोनों तेरे सामने बुढ़ापे को पहुँचे (और किसी बात पर खफा हों) तो (ख़बरदार उनके जवाब में उफ तक) न कहना और न उनको झिड़कना और जो कुछ कहना सुनना हो तो बहुत अदब से कहा करो
Verse 24
وَٱخۡفِضۡ لَهُمَا جَنَاحَ ٱلذُّلِّ مِنَ ٱلرَّحۡمَةِ وَقُل رَّبِّ ٱرۡحَمۡهُمَا كَمَا رَبَّيَانِى صَغِيرًا
और उनके सामने नियाज़ (रहमत) से ख़ाकसारी का पहलू झुकाए रखो और उनके हक़ में दुआ करो कि मेरे पालने वाले जिस तरह इन दोनों ने मेरे छोटेपन में मेरी मेरी परवरिश की है
Verse 25
رَّبُّكُمۡ أَعۡلَمُ بِمَا فِى نُفُوسِكُمۡ ۚ إِن تَكُونُواْ صَـٰلِحِينَ فَإِنَّهُ ۥ ڪَانَ لِلۡأَوَّٲبِينَ غَفُورًا
इसी तरह तू भी इन पर रहम फरमा तुम्हारे दिल की बात तुम्हारा परवरदिगार ख़ूब जानता है अगर तुम (वाक़ई) नेक होगे और भूले से उनकी ख़ता की है तो वह तुमको बख्श देगा क्योंकि वह तो तौबा करने वालों का बड़ा बख़शने वाला है
Verse 26
وَءَاتِ ذَا ٱلۡقُرۡبَىٰ حَقَّهُ ۥ وَٱلۡمِسۡكِينَ وَٱبۡنَ ٱلسَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرۡ تَبۡذِيرًا
और क़राबतदारों और मोहताज और परदेसी को उनका हक़ दे दो और ख़बरदार फुज़ूल ख़र्ची मत किया करो
Verse 27
إِنَّ ٱلۡمُبَذِّرِينَ كَانُوٓاْ إِخۡوَٲنَ ٱلشَّيَـٰطِينِ ۖ وَكَانَ ٱلشَّيۡطَـٰنُ لِرَبِّهِۦ كَفُورًا
क्योंकि फुज़ूलख़र्ची करने वाले यक़ीनन शैतानों के भाई है और शैतान अपने परवरदिगार का बड़ा नाशुक्री करने वाला है
Verse 28
وَإِمَّا تُعۡرِضَنَّ عَنۡہُمُ ٱبۡتِغَآءَ رَحۡمَةٍ مِّن رَّبِّكَ تَرۡجُوهَا فَقُل لَّهُمۡ قَوۡلاً مَّيۡسُورًا
और तुमको अपने परवरदिगार के फज़ल व करम के इन्तज़ार में जिसकी तुम को उम्मीद हो (मजबूरन) उन (ग़रीबों) से मुँह मोड़ना पड़े तो नरमी से उनको समझा दो
Verse 29
وَلَا تَجۡعَلۡ يَدَكَ مَغۡلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبۡسُطۡهَا كُلَّ ٱلۡبَسۡطِ فَتَقۡعُدَ مَلُومًا مَّحۡسُورًا
और अपने हाथ को न तो गर्दन से बँधा हुआ (बहुत तंग) कर लो (कि किसी को कुछ दो ही नहीं) और न बिल्कुल खोल दो कि सब कुछ दे डालो और आख़िर तुम को मलामत ज़दा हसरत से बैठना पड़े
Verse 30
إِنَّ رَبَّكَ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقۡدِرُ ۚ إِنَّهُ ۥ كَانَ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرَۢا بَصِيرًا
इसमें शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ (बढ़ा) देता है और जिसकी रोज़ी चाहता है तंग रखता है इसमें शक़ नहीं कि वह अपने बन्दों से बहुत बाख़बर और देखभाल रखने वाला है
Verse 31
وَلَا تَقۡتُلُوٓاْ أَوۡلَـٰدَكُمۡ خَشۡيَةَ إِمۡلَـٰقٍ ۖ نَّحۡنُ نَرۡزُقُهُمۡ وَإِيَّاكُمۡ ۚ إِنَّ قَتۡلَهُمۡ ڪَانَ خِطۡـًٔا كَبِيرًا
और (लोगों) मुफलिसी (ग़रीबी) के ख़ौफ से अपनी औलाद को क़त्ल न करो (क्योंकि) उनको और तुम को (सबको) तो हम ही रोज़ी देते हैं बेशक औलाद का क़त्ल करना बहुत सख्त गुनाह है
Verse 32
وَلَا تَقۡرَبُواْ ٱلزِّنَىٰٓ ۖ إِنَّهُ ۥ كَانَ فَـٰحِشَةً وَسَآءَ سَبِيلاً
और (देखो) ज़िना के पास भी न फटकना क्योंकि बेशक वह बड़ी बेहयाई का काम है और बहुत बुरा चलन है
Verse 33
وَلَا تَقۡتُلُواْ ٱلنَّفۡسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلۡحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظۡلُومًا فَقَدۡ جَعَلۡنَا لِوَلِيِّهِۦ سُلۡطَـٰنًا فَلَا يُسۡرِف فِّى ٱلۡقَتۡلِ ۖ إِنَّهُ ۥ كَانَ مَنصُورًا
और जिस जान का मारना ख़ुदा ने हराम कर दिया है उसके क़त्ल न करना मगर जायज़ तौर पर और जो शख़्श नाहक़ मारा जाए तो हमने उसके वारिस को (क़ातिल पर क़सास का क़ाबू दिया है तो उसे चाहिए कि क़त्ल (ख़ून का बदला लेने) में ज्यादती न करे बेशक वह मदद दिया जाएगा
Verse 34
وَلَا تَقۡرَبُواْ مَالَ ٱلۡيَتِيمِ إِلَّا بِٱلَّتِى هِىَ أَحۡسَنُ حَتَّىٰ يَبۡلُغَ أَشُدَّهُ ۥ ۚ وَأَوۡفُواْ بِٱلۡعَهۡدِ ۖ إِنَّ ٱلۡعَهۡدَ كَانَ مَسۡـُٔولاً
(कि क़त्ल ही करे और माफ न करे) और यतीम जब तक जवानी को पहुँचे उसके माल के क़रीब भी न पहुँच जाना मगर हाँ इस तरह पर कि (यतीम के हक़ में) बेहतर हो और एहद को पूरा करो क्योंकि (क़यामत में) एहद की ज़रुर पूछ गछ होगी
Verse 35
وَأَوۡفُواْ ٱلۡكَيۡلَ إِذَا كِلۡتُمۡ وَزِنُواْ بِٱلۡقِسۡطَاسِ ٱلۡمُسۡتَقِيمِ ۚ ذَٲلِكَ خَيۡرٌ وَأَحۡسَنُ تَأۡوِيلاً
और जब नाप तौल कर देना हो तो पैमाने को पूरा भर दिया करो और (जब तौल कर देना हो तो) बिल्कुल ठीक तराजू से तौला करो (मामले में) यही (तरीक़ा) बेहतर है और अन्जाम (भी उसका) अच्छा है
Verse 36
وَلَا تَقۡفُ مَا لَيۡسَ لَكَ بِهِۦ عِلۡمٌ ۚ إِنَّ ٱلسَّمۡعَ وَٱلۡبَصَرَ وَٱلۡفُؤَادَ كُلُّ أُوْلَـٰٓٮِٕكَ كَانَ عَنۡهُ مَسۡـُٔولاً
और जिस चीज़ का कि तुम्हें यक़ीन न हो (ख्वाह मा ख्वाह) उसके पीछे न पड़ा करो (क्योंकि) कान और ऑंख और दिल इन सबकी (क़यामत के दिना यक़ीनन बाज़पुर्स होती है
Verse 37
وَلَا تَمۡشِ فِى ٱلۡأَرۡضِ مَرَحًا ۖ إِنَّكَ لَن تَخۡرِقَ ٱلۡأَرۡضَ وَلَن تَبۡلُغَ ٱلۡجِبَالَ طُولاً
और (देखो) ज़मीन पर अकड़ कर न चला करो क्योंकि तू (अपने इस धमाके की चाल से) न तो ज़मीन को हरगिज़ फाड़ डालेगा और न (तनकर चलने से) हरगिज़ लम्बाई में पहाड़ों के बराबर पहुँच सकेगा
Verse 38
كُلُّ ذَٲلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ ۥ عِندَ رَبِّكَ مَكۡرُوهًا
(ऐ रसूल) इन सब बातों में से जो बुरी बात है वह तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक नापसन्द है
Verse 39
ذَٲلِكَ مِمَّآ أَوۡحَىٰٓ إِلَيۡكَ رَبُّكَ مِنَ ٱلۡحِكۡمَةِ ۗ وَلَا تَجۡعَلۡ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَتُلۡقَىٰ فِى جَهَنَّمَ مَلُومًا مَّدۡحُورًا
ये बात तो हिकमत की उन बातों में से जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पास ‘वही’ भेजी और ख़ुदा के साथ कोई दूसरा माबूद न बनाना और न तू मलामत ज़दा राइन्द (धुत्कारा) होकर जहन्नुम में झोंक दिया जाएगा
Verse 40
أَفَأَصۡفَٮٰكُمۡ رَبُّڪُم بِٱلۡبَنِينَ وَٱتَّخَذَ مِنَ ٱلۡمَلَـٰٓٮِٕكَةِ إِنَـٰثًا ۚ إِنَّكُمۡ لَتَقُولُونَ قَوۡلاً عَظِيمًا
(ऐ मुशरेकीन मक्का) क्या तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें चुन चुन कर बेटे दिए हैं और खुद बेटियाँ ली हैं (यानि) फरिश्ते इसमें शक़ नहीं कि बड़ी (सख्त) बात कहते हो
Verse 41
وَلَقَدۡ صَرَّفۡنَا فِى هَـٰذَا ٱلۡقُرۡءَانِ لِيَذَّكَّرُواْ وَمَا يَزِيدُهُمۡ إِلَّا نُفُورًا
और हमने तो इसी क़ुरान में तरह तरह से बयान कर दिया ताकि लोग किसी तरह समझें मगर उससे तो उनकी नफरत ही बढ़ती गई
Verse 42
قُل لَّوۡ كَانَ مَعَهُ ۥۤ ءَالِهَةٌ كَمَا يَقُولُونَ إِذًا لَّٱبۡتَغَوۡاْ إِلَىٰ ذِى ٱلۡعَرۡشِ سَبِيلاً
(ऐ रसूल उनसे) तुम कह दो कि अगर ख़ुदा के साथ जैसा ये लोग कहते हैं और माबूद भी होते तो अब तक उन माबूदों ने अर्श तक (पहुँचाने की कोई न कोई राह निकाल ली होती
Verse 43
سُبۡحَـٰنَهُ ۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يَقُولُونَ عُلُوًّا كَبِيرًا
जो बेहूदा बातें ये लोग (ख़ुदा की निस्बत) कहा करते हैं वह उनसे बहुत बढ़के पाक व पाकीज़ा और बरतर है
Verse 44
تُسَبِّحُ لَهُ ٱلسَّمَـٰوَٲتُ ٱلسَّبۡعُ وَٱلۡأَرۡضُ وَمَن فِيہِنَّ ۚ وَإِن مِّن شَىۡءٍ إِلَّا يُسَبِّحُ بِحَمۡدِهِۦ وَلَـٰكِن لَّا تَفۡقَهُونَ تَسۡبِيحَهُمۡ ۗ إِنَّهُ ۥ كَانَ حَلِيمًا غَفُورًا
सातों आसमान और ज़मीन और जो लोग इनमें (सब) उसकी तस्बीह करते हैं और (सारे जहाँन) में कोई चीज़ ऐसी नहीं जो उसकी (हम्द व सना) की तस्बीह न करती हो मगर तुम लोग उनकी तस्बीह नहीं समझते इसमें शक़ नहीं कि वह बड़ा बुर्दबार बख्शने वाला है
Verse 45
وَإِذَا قَرَأۡتَ ٱلۡقُرۡءَانَ جَعَلۡنَا بَيۡنَكَ وَبَيۡنَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡأَخِرَةِ حِجَابًا مَّسۡتُورًا
और जब तुम क़ुरान पढ़ते हो तो हम तुम्हारे और उन लोगों के दरमियान जो आख़िरत का यक़ीन नहीं रखते एक गहरा पर्दा डाल देते हैं
Verse 46
وَجَعَلۡنَا عَلَىٰ قُلُوبِہِمۡ أَكِنَّةً أَن يَفۡقَهُوهُ وَفِىٓ ءَاذَانِہِمۡ وَقۡرًا ۚ وَإِذَا ذَكَرۡتَ رَبَّكَ فِى ٱلۡقُرۡءَانِ وَحۡدَهُ ۥ وَلَّوۡاْ عَلَىٰٓ أَدۡبَـٰرِهِمۡ نُفُورًا
और (गोया) हम उनके कानों में गरानी पैदा कर देते हैं कि न सुन सकें जब तुम क़ुरान में अपने परवरदिगार का तन्हा ज़िक्र करते हो तो कुफ्फार उलटे पावँ नफरत करके (तुम्हारे पास से) भाग खड़े होते हैं
Verse 47
نَّحۡنُ أَعۡلَمُ بِمَا يَسۡتَمِعُونَ بِهِۦۤ إِذۡ يَسۡتَمِعُونَ إِلَيۡكَ وَإِذۡ هُمۡ نَجۡوَىٰٓ إِذۡ يَقُولُ ٱلظَّـٰلِمُونَ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا رَجُلاً مَّسۡحُورًا
जब ये लोग तुम्हारी तरफ कान लगाते हैं तो जो कुछ ये ग़ौर से सुनते हैं हम तो खूब जानते हैं और जब ये लोग बाहम कान में बात करते हैं तो उस वक्त ये ज़ालिम (ईमानदारों से) कहते हैं कि तुम तो बस एक (दीवाने) आदमी के पीछे पड़े हो जिस पर किसी ने जादू कर दिया है
Verse 48
ٱنظُرۡ كَيۡفَ ضَرَبُواْ لَكَ ٱلۡأَمۡثَالَ فَضَلُّواْ فَلَا يَسۡتَطِيعُونَ سَبِيلاً
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो ये कम्बख्त तुम्हारी निस्बत कैसी कैसी फब्तियाँ कहते हैं तो (इसी वजह से) ऐसे गुमराह हुए कि अब (हक़ की) राह किसी तरह पा ही नहीं सकते
Verse 49
وَقَالُوٓاْ أَءِذَا كُنَّا عِظَـٰمًا وَرُفَـٰتًا أَءِنَّا لَمَبۡعُوثُونَ خَلۡقًا جَدِيدًا
और ये लोग कहते हैं कि जब हम (मरने के बाद सड़ गल कर) हड्डियाँ रह जाएँगें और रेज़ा रेज़ा हो जाएँगें तो क्या नये सिरे से पैदा करके उठा खड़े किए जाएँगें
Verse 50
۞ قُلۡ كُونُواْ حِجَارَةً أَوۡ حَدِيدًا
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम (मरने के बाद) चाहे पत्थर बन जाओ या लोहा या कोई और चीज़ जो तुम्हारे ख्याल में बड़ी (सख्त) हो
Verse 51
أَوۡ خَلۡقًا مِّمَّا يَڪۡبُرُ فِى صُدُورِكُمۡ ۚ فَسَيَقُولُونَ مَن يُعِيدُنَا ۖ قُلِ ٱلَّذِى فَطَرَكُمۡ أَوَّلَ مَرَّةٍ ۚ فَسَيُنۡغِضُونَ إِلَيۡكَ رُءُوسَہُمۡ وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هُوَ ۖ قُلۡ عَسَىٰٓ أَن يَكُونَ قَرِيبًا
और उसका ज़िन्दा होना दुश्वार हो वह भी ज़रुर ज़िन्दा हो गई तो ये लोग अनक़रीब ही तुम से पूछेगें भला हमें दोबारा कौन ज़िन्दा करेगा तुम कह दो कि वही (ख़ुदा) जिसने तुमको पहली मरतबा पैदा किया (जब तुम कुछ न थे) इस पर ये लोग तुम्हारे सामने अपने सर मटकाएँगें और कहेगें (अच्छा अगर होगा) तो आख़िर कब तुम कह दो कि बहुत जल्द अनक़रीब ही होगा
Verse 52
يَوۡمَ يَدۡعُوكُمۡ فَتَسۡتَجِيبُونَ بِحَمۡدِهِۦ وَتَظُنُّونَ إِن لَّبِثۡتُمۡ إِلَّا قَلِيلاً
जिस दिन ख़ुदा तुम्हें (इसराफील के ज़रिए से) बुंलाएगा तो उसकी हम्दो सना करते हुए उसकी तामील करोगे (और क़ब्रों से निकलोगे) और तुम ख्याल करोगे कि (मरने के बाद क़ब्रों में) बहुत ही कम ठहरे
Verse 53
وَقُل لِّعِبَادِى يَقُولُواْ ٱلَّتِى هِىَ أَحۡسَنُ ۚ إِنَّ ٱلشَّيۡطَـٰنَ يَنزَغُ بَيۡنَہُمۡ ۚ إِنَّ ٱلشَّيۡطَـٰنَ كَانَ لِلۡإِنسَـٰنِ عَدُوًّا مُّبِينًا
और (ऐ रसूल) मेरे (सच्चे) बन्दों (मोमिनों से कह दो कि वह (काफिरों से) बात करें तो अच्छे तरीक़े से (सख्त कलामी न करें) क्योंकि शैतान तो (ऐसी ही) बातों से फसाद डलवाता है इसमें तो शक़ ही नहीं कि शैतान आदमी का खुला हुआ दुश्मन है
Verse 54
رَّبُّكُمۡ أَعۡلَمُ بِكُمۡ ۖ إِن يَشَأۡ يَرۡحَمۡكُمۡ أَوۡ إِن يَشَأۡ يُعَذِّبۡكُمۡ ۚ وَمَآ أَرۡسَلۡنَـٰكَ عَلَيۡہِمۡ وَڪِيلاً
तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे हाल से खूब वाक़िफ है अगर चाहेगा तुम पर रहम करेगा और अगर चाहेगा तुम पर अज़ाब करेगा और (ऐ रसूल) हमने तुमको कुछ उन लोगों का ज़िम्मेदार बनाकर नहीं भेजा है
Verse 55
وَرَبُّكَ أَعۡلَمُ بِمَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ ۗ وَلَقَدۡ فَضَّلۡنَا بَعۡضَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ عَلَىٰ بَعۡضٍ ۖ وَءَاتَيۡنَا دَاوُ ۥدَ زَبُورًا
और जो लोग आसमानों में है और ज़मीन पर हैं (सब को) तुम्हारा परवरदिगार खूब जानता है और हम ने यक़ीनन बाज़ पैग़म्बरों को बाज़ पर फज़ीलत दी और हम ही ने दाऊद को जूबूर अता की
Verse 56
قُلِ ٱدۡعُواْ ٱلَّذِينَ زَعَمۡتُم مِّن دُونِهِۦ فَلَا يَمۡلِكُونَ كَشۡفَ ٱلضُّرِّ عَنكُمۡ وَلَا تَحۡوِيلاً
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दों कि ख़ुदा के सिवा और जिन लोगों को माबूद समझते हो उनको (वक्त पडे) पुकार के तो देखो कि वह न तो तुम से तुम्हारी तकलीफ ही दफा कर सकते हैं और न उसको बदल सकते हैं
Verse 57
أُوْلَـٰٓٮِٕكَ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ يَبۡتَغُونَ إِلَىٰ رَبِّهِمُ ٱلۡوَسِيلَةَ أَيُّہُمۡ أَقۡرَبُ وَيَرۡجُونَ رَحۡمَتَهُ ۥ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُ ۥۤ ۚ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحۡذُورًا
ये लोग जिनको मुशरेकीन (अपना ख़ुदा समझकर) इबादत करते हैं वह खुद अपने परवरदिगार की क़ुरबत के ज़रिए ढूँढते फिरते हैं कि (देखो) इनमें से कौन ज्यादा कुरबत रखता है और उसकी रहमत की उम्मीद रखते और उसके अज़ाब से डरते हैं इसमें शक़ नहीं कि तेरे परवरदिगार का अज़ाब डरने की चीज़ है
Verse 58
وَإِن مِّن قَرۡيَةٍ إِلَّا نَحۡنُ مُهۡلِڪُوهَا قَبۡلَ يَوۡمِ ٱلۡقِيَـٰمَةِ أَوۡ مُعَذِّبُوهَا عَذَابًا شَدِيدًا ۚ كَانَ ذَٲلِكَ فِى ٱلۡكِتَـٰبِ مَسۡطُورًا
और कोई बस्ती नहीं है मगर रोज़ क़यामत से पहले हम उसे तबाह व बरबाद कर छोड़ेगें या (नाफरमानी) की सज़ा में उस पर सख्त से सख्त अज़ाब करेगें (और) ये बात किताब (लौहे महफूज़) में लिखी जा चुकी है
Verse 59
وَمَا مَنَعَنَآ أَن نُّرۡسِلَ بِٱلۡأَيَـٰتِ إِلَّآ أَن ڪَذَّبَ بِہَا ٱلۡأَوَّلُونَ ۚ وَءَاتَيۡنَا ثَمُودَ ٱلنَّاقَةَ مُبۡصِرَةً فَظَلَمُواْ بِہَا ۚ وَمَا نُرۡسِلُ بِٱلۡأَيَـٰتِ إِلَّا تَخۡوِيفًا
और हमें मौजिज़ात भेजने से किसी चीज़ ने नहीं रोका मगर इसके सिवा कि अगलों ने उन्हें झुठला दिया और हमने क़ौमे समूद को (मौजिज़े से) ऊँटनी अता की जो (हमारी कुदरत की) दिखाने वाली थी तो उन लोगों ने उस पर ज़ुल्म किया यहाँ तक कि मार डाला और हम तो मौजिज़े सिर्फ डराने की ग़रज़ से भेजा करते हैं
Verse 60
وَإِذۡ قُلۡنَا لَكَ إِنَّ رَبَّكَ أَحَاطَ بِٱلنَّاسِ ۚ وَمَا جَعَلۡنَا ٱلرُّءۡيَا ٱلَّتِىٓ أَرَيۡنَـٰكَ إِلَّا فِتۡنَةً لِّلنَّاسِ وَٱلشَّجَرَةَ ٱلۡمَلۡعُونَةَ فِى ٱلۡقُرۡءَانِ ۚ وَنُخَوِّفُهُمۡ فَمَا يَزِيدُهُمۡ إِلَّا طُغۡيَـٰنًا كَبِيرًا
और (ऐ रसूल) वह वक्त याद करो जब तुमसे हमने कह दिया था कि तुम्हारे परवरदिगार ने लोगों को (हर तरफ से) रोक रखा है कि (तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकते और हमने जो ख्वाब तुमाको दिखलाया था तो बस उसे लोगों (के ईमान) की आज़माइश का ज़रिया ठहराया था और (इसी तरह) वह दरख्त जिस पर क़ुरान में लानत की गई है और हम बावजूद कि उन लोगों को (तरह तरह) से डराते हैं मगर हमारा डराना उनकी सख्त सरकशी को बढ़ाता ही गया
Verse 61
وَإِذۡ قُلۡنَا لِلۡمَلَـٰٓٮِٕڪَةِ ٱسۡجُدُواْ لِأَدَمَ فَسَجَدُوٓاْ إِلَّآ إِبۡلِيسَ قَالَ ءَأَسۡجُدُ لِمَنۡ خَلَقۡتَ طِينًا
और जब हम ने फरिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सबने सजदा किया मगर इबलीस वह (गुरुर से) कहने लगा कि क्या मै ऐसे शख़्श को सजदा करुँ जिसे तूने मिट्टी से पैदा किया है
Verse 62
قَالَ أَرَءَيۡتَكَ هَـٰذَا ٱلَّذِى ڪَرَّمۡتَ عَلَىَّ لَٮِٕنۡ أَخَّرۡتَنِ إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡقِيَـٰمَةِ لَأَحۡتَنِكَنَّ ذُرِّيَّتَهُ ۥۤ إِلَّا قَلِيلاً
और (शेख़ी से) बोला भला देखो तो सही यही वह शख़्श है जिसको तूने मुझ पर फज़ीलत दी है अगर तू मुझ को क़यामत तक की मोहलत दे तो मैं (दावे से कहता हूँ कि) कम लोगों के सिवा इसकी नस्ल की जड़ काटता रहूँगा
Verse 63
قَالَ ٱذۡهَبۡ فَمَن تَبِعَكَ مِنۡهُمۡ فَإِنَّ جَهَنَّمَ جَزَآؤُكُمۡ جَزَآءً مَّوۡفُورًا
ख़ुदा ने फरमाया चल (दूर हो) उनमें से जो शख़्श तेरी पैरवी करेगा तो (याद रहे कि) तुम सबकी सज़ा जहन्नुम है और वह भी पूरी पूरी सज़ा है
Verse 64
وَٱسۡتَفۡزِزۡ مَنِ ٱسۡتَطَعۡتَ مِنۡہُم بِصَوۡتِكَ وَأَجۡلِبۡ عَلَيۡہِم بِخَيۡلِكَ وَرَجِلِكَ وَشَارِكۡهُمۡ فِى ٱلۡأَمۡوَٲلِ وَٱلۡأَوۡلَـٰدِ وَعِدۡهُمۡ ۚ وَمَا يَعِدُهُمُ ٱلشَّيۡطَـٰنُ إِلَّا غُرُورًا
और इसमें से जिस पर अपनी (चिकनी चुपड़ी) बात से क़ाबू पा सके वहॉ और अपने (चेलों के लश्कर) सवार और पैदल (सब) से चढ़ाई कर और माल और औलाद में उनके साथ साझा करे और उनसे (खूब झूठे) वायदे कर और शैतान तो उनसे जो वायदे करता है धोखे के सिवा कुछ नहीं होता
Verse 65
إِنَّ عِبَادِى لَيۡسَ لَكَ عَلَيۡهِمۡ سُلۡطَـٰنٌ ۚ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ وَڪِيلاً
बेशक जो मेरे (ख़ास) बन्दें हैं उन पर तेरा ज़ोर नहीं चल (सकता) और कारसाज़ी में तेरा परवरदिगार काफी है
Verse 66
رَّبُّكُمُ ٱلَّذِى يُزۡجِى لَڪُمُ ٱلۡفُلۡكَ فِى ٱلۡبَحۡرِ لِتَبۡتَغُواْ مِن فَضۡلِهِۦۤ ۚ إِنَّهُ ۥ كَانَ بِكُمۡ رَحِيمًا
लोगों) तुम्हारा परवरदिगार वह (क़ादिरे मुत्तलिक़) है जो तुम्हारे लिए समन्दर में जहाज़ों को चलाता है ताकि तुम उसके फज़ल व करम (रोज़ी) की तलाश करो इसमें शक़ नहीं कि वह तुम पर बड़ा मेहरबान है
Verse 67
وَإِذَا مَسَّكُمُ ٱلضُّرُّ فِى ٱلۡبَحۡرِ ضَلَّ مَن تَدۡعُونَ إِلَّآ إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّٮٰكُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ أَعۡرَضۡتُمۡ ۚ وَكَانَ ٱلۡإِنسَـٰنُ كَفُورًا
और जब समन्दर में कभी तुम को कोई तकलीफ पहुँचे तो जिनकी तुम इबादत किया करते थे ग़ायब हो गए मगर बस वही (एक ख़ुदा याद रहता है) उस पर भी जब ख़ुदा ने तुम को छुटकारा देकर खुशकी तक पहुँचा दिया तो फिर तुम इससे मुँह मोड़ बैठें और इन्सान बड़ा ही नाशुक्रा है
Verse 68
أَفَأَمِنتُمۡ أَن يَخۡسِفَ بِكُمۡ جَانِبَ ٱلۡبَرِّ أَوۡ يُرۡسِلَ عَلَيۡڪُمۡ حَاصِبًا ثُمَّ لَا تَجِدُواْ لَكُمۡ وَڪِيلاً
तो क्या तुम उसको इस का भी इत्मिनान हो गया कि वह तुम्हें खुश्की की तरफ (ले जाकर) (क़ारुन की तरह) ज़मीन में धंसा दे या तुम पर (क़ौम) लूत की तरह पत्थरों का मेंह बरसा दे फिर (उस वक्त) तुम किसी को अपना कारसाज़ न पाओगे
Verse 69
أَمۡ أَمِنتُمۡ أَن يُعِيدَكُمۡ فِيهِ تَارَةً أُخۡرَىٰ فَيُرۡسِلَ عَلَيۡكُمۡ قَاصِفًا مِّنَ ٱلرِّيحِ فَيُغۡرِقَكُم بِمَا كَفَرۡتُمۡ ۙ ثُمَّ لَا تَجِدُواْ لَكُمۡ عَلَيۡنَا بِهِۦ تَبِيعًا
या तुमको इसका भी इत्मेनान हो गया कि फिर तुमको दोबारा इसी समन्दर में ले जाएगा उसके बाद हवा का एक ऐसा झोका जो (जहाज़ के) परख़चे उड़ा दे तुम पर भेजे फिर तुम्हें तुम्हारे कुफ्र की सज़ा में डुबा मारे फिर तुम किसी को (ऐसा हिमायती) न पाओगे जो हमारा पीछा करे और (तुम्हें छोड़ा जाए)
Verse 70
۞ وَلَقَدۡ كَرَّمۡنَا بَنِىٓ ءَادَمَ وَحَمَلۡنَـٰهُمۡ فِى ٱلۡبَرِّ وَٱلۡبَحۡرِ وَرَزَقۡنَـٰهُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ وَفَضَّلۡنَـٰهُمۡ عَلَىٰ ڪَثِيرٍ مِّمَّنۡ خَلَقۡنَا تَفۡضِيلاً
और हमने यक़ीनन आदम की औलाद को इज्ज़त दी और खुश्की और तरी में उनको (जानवरों कश्तियों के ज़रिए) लिए लिए फिरे और उन्हें अच्छी अच्छी चीज़ें खाने को दी और अपने बहुतेरे मख़लूक़ात पर उनको अच्छी ख़ासी फज़ीलत दी
Verse 71
يَوۡمَ نَدۡعُواْ ڪُلَّ أُنَاسِۭ بِإِمَـٰمِهِمۡ ۖ فَمَنۡ أُوتِىَ ڪِتَـٰبَهُ ۥ بِيَمِينِهِۦ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ يَقۡرَءُونَ ڪِتَـٰبَهُمۡ وَلَا يُظۡلَمُونَ فَتِيلاً
उस दिन (को याद करो) जब हम तमाम लोगों को उन पेशवाओं के साथ बुलाएँगें तो जिसका नामए अमल उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह लोग (खुश खुश) अपना नामए अमल पढ़ने लगेगें और उन पर रेशा बराबर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
Verse 72
وَمَن كَانَ فِى هَـٰذِهِۦۤ أَعۡمَىٰ فَهُوَ فِى ٱلۡأَخِرَةِ أَعۡمَىٰ وَأَضَلُّ سَبِيلاً
और जो शख़्श इस (दुनिया) में (जान बूझकर) अंधा बना रहा तो वह आख़िरत में भी अंधा ही रहेगा और (नजात) के रास्ते से बहुत दूर भटका सा हुआ
Verse 73
وَإِن ڪَادُواْ لَيَفۡتِنُونَكَ عَنِ ٱلَّذِىٓ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ لِتَفۡتَرِىَ عَلَيۡنَا غَيۡرَهُ ۥ ۖ وَإِذًا لَّٱتَّخَذُوكَ خَلِيلاً
और (ऐ रसूल) हमने तो (क़ुरान) तुम्हारे पास ‘वही’ के ज़रिए भेजा अगर चे लोग तो तुम्हें इससे बहकाने ही लगे थे ताकि तुम क़ुरान के अलावा फिर (दूसरी बातों का) इफ़तेरा बाँधों और (जब तुम ये कर गुज़रते उस वक्त ये लोग तुम को अपना सच्चा दोस्त बना लेते
Verse 74
وَلَوۡلَآ أَن ثَبَّتۡنَـٰكَ لَقَدۡ كِدتَّ تَرۡڪَنُ إِلَيۡهِمۡ شَيْئًا قَلِيلاً
और अगर हम तुमको साबित क़दम न रखते तो ज़रुर तुम भी ज़रा (ज़हूर) झुकने ही लगते
Verse 75
إِذًا لَّأَذَقۡنَـٰكَ ضِعۡفَ ٱلۡحَيَوٰةِ وَضِعۡفَ ٱلۡمَمَاتِ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ عَلَيۡنَا نَصِيرًا
और (अगर तुम ऐसा करते तो) उस वक्त हम तुमको ज़िन्दगी में भी और मरने पर भी दोहरे (अज़ाब) का मज़ा चखा देते और फिर तुम को हमारे मुक़ाबले में कोई मददगार भी न मिलता
Verse 76
وَإِن ڪَادُواْ لَيَسۡتَفِزُّونَكَ مِنَ ٱلۡأَرۡضِ لِيُخۡرِجُوكَ مِنۡهَا ۖ وَإِذًا لَّا يَلۡبَثُونَ خِلَـٰفَكَ إِلَّا قَلِيلاً
और ये लोग तो तुम्हें (सर ज़मीन मक्के) से दिल बर्दाश्त करने ही लगे थे ताकि तुम को वहाँ से (शाम की तरफ) निकाल बाहर करें और ऐसा होता तो तुम्हारे पीछे में ये लोग चन्द रोज़ के सिवा ठहरने भी न पाते
Verse 77
سُنَّةَ مَن قَدۡ أَرۡسَلۡنَا قَبۡلَكَ مِن رُّسُلِنَا ۖ وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحۡوِيلاً
तुमसे पहले जितने रसूल हमने भेजे हैं उनका बराबर यही दस्तूर रहा है और जो दस्तूर हमारे (ठहराए हुए) हैं उनमें तुम तग्य्युर तबद्दुल (रद्दो बदल) न पाओगे
Verse 78
أَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ لِدُلُوكِ ٱلشَّمۡسِ إِلَىٰ غَسَقِ ٱلَّيۡلِ وَقُرۡءَانَ ٱلۡفَجۡرِ ۖ إِنَّ قُرۡءَانَ ٱلۡفَجۡرِ كَانَ مَشۡہُودًا
(ऐ रसूल) सूरज के ढलने से रात के अंधेरे तक नमाज़े ज़ोहर, अस्र, मग़रिब, इशा पढ़ा करो और नमाज़ सुबह (भी) क्योंकि सुबह की नमाज़ पर (दिन और रात दोनों के फरिश्तों की) गवाही होती है
Verse 79
وَمِنَ ٱلَّيۡلِ فَتَهَجَّدۡ بِهِۦ نَافِلَةً لَّكَ عَسَىٰٓ أَن يَبۡعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَّحۡمُودًا
और रात के ख़ास हिस्से में नमाजे तहज्जुद पढ़ा करो ये सुन्नत तुम्हारी खास फज़ीलत हैं क़रीब है कि क़यामत के दिन ख़ुदा तुमको मक़ामे महमूद तक पहुँचा दे
Verse 80
وَقُل رَّبِّ أَدۡخِلۡنِى مُدۡخَلَ صِدۡقٍ وَأَخۡرِجۡنِى مُخۡرَجَ صِدۡقٍ وَٱجۡعَل لِّى مِن لَّدُنكَ سُلۡطَـٰنًا نَّصِيرًا
और ये दुआ माँगा करो कि ऐ मेरे परवरदिगार मुझे (जहाँ) पहुँचा अच्छी तरह पहुँचा और मुझे (जहाँ से निकाल) तो अच्छी तरह निकाल और मुझे ख़ास अपनी बारगाह से एक हुकूमत अता फरमा जिस से (हर क़िस्म की) मदद पहुँचे
Verse 81
وَقُلۡ جَآءَ ٱلۡحَقُّ وَزَهَقَ ٱلۡبَـٰطِلُ ۚ إِنَّ ٱلۡبَـٰطِلَ كَانَ زَهُوقًا
और (ऐ रसूल) कह दो कि (दीन) हक़ आ गया और बातिल नेस्तनाबूद हुआ इसमें शक़ नहीं कि बातिल मिटने वाला ही था
Verse 82
وَنُنَزِّلُ مِنَ ٱلۡقُرۡءَانِ مَا هُوَ شِفَآءٌ وَرَحۡمَةٌ لِّلۡمُؤۡمِنِينَ ۙ وَلَا يَزِيدُ ٱلظَّـٰلِمِينَ إِلَّا خَسَارًا
और हम तो क़ुरान में वही चीज़ नाज़िल करते हैं जो मोमिनों के लिए (सरासर) शिफा और रहमत है (मगर) नाफरमानों को तो घाटे के सिवा कुछ बढ़ाता ही नहीं
Verse 83
وَإِذَآ أَنۡعَمۡنَا عَلَى ٱلۡإِنسَـٰنِ أَعۡرَضَ وَنَـَٔا بِجَانِبِهِۦ ۖ وَإِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ كَانَ يَـُٔوسًا
और जब हमने आदमी को नेअमत अता फरमाई तो (उल्टे) उसने (हमसे) मुँह फेरा और पहलू बचाने लगा और जब उसे कोई तकलीफ छू भी गई तो मायूस हो बैठा
Verse 84
قُلۡ ڪُلٌّ يَعۡمَلُ عَلَىٰ شَاكِلَتِهِۦ فَرَبُّكُمۡ أَعۡلَمُ بِمَنۡ هُوَ أَهۡدَىٰ سَبِيلاً
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि हर (एक अपने तरीक़े पर कारगुज़ारी करता है फिर तुम में से जो शख़्श बिल्कुल ठीक सीधी राह पर है तुम्हारा परवरदिगार (उससे) खूब वाक़िफ है
Verse 85
وَيَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلرُّوحِ ۖ قُلِ ٱلرُّوحُ مِنۡ أَمۡرِ رَبِّى وَمَآ أُوتِيتُم مِّنَ ٱلۡعِلۡمِ إِلَّا قَلِيلاً
और (ऐ रसूल) तुमसे लोग रुह के बारे में सवाल करते हैं तुम (उनके जवाब में) कह दो कि रूह (भी) मेरे परदिगार के हुक्म से (पैदा हुईहै) और तुमको बहुत थोड़ा सा इल्म दिया गया है
Verse 86
وَلَٮِٕن شِئۡنَا لَنَذۡهَبَنَّ بِٱلَّذِىٓ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ بِهِۦ عَلَيۡنَا وَڪِيلاً
(इसकी हक़ीकत नहीं समझ सकते) और (ऐ रसूल) अगर हम चाहे तो जो (क़ुरान) हमने तुम्हारे पास ‘वही’ के ज़रिए भेजा है (दुनिया से) उठा ले जाएँ फिर तुम अपने वास्ते हमारे मुक़ाबले में कोई मददगार न पाओगे
Verse 87
إِلَّا رَحۡمَةً مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّ فَضۡلَهُ ۥ كَانَ عَلَيۡكَ ڪَبِيرًا
मगर ये सिर्फ तुम्हारे परवरदिगार की रहमत है (कि उसने ऐसा किया) इसमें शक़ नहीं कि उसका तुम पर बड़ा फज़ल व करम है
Verse 88
قُل لَّٮِٕنِ ٱجۡتَمَعَتِ ٱلۡإِنسُ وَٱلۡجِنُّ عَلَىٰٓ أَن يَأۡتُواْ بِمِثۡلِ هَـٰذَا ٱلۡقُرۡءَانِ لَا يَأۡتُونَ بِمِثۡلِهِۦ وَلَوۡ كَانَ بَعۡضُہُمۡ لِبَعۡضٍ ظَهِيرًا
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि (अगर सारे दुनिया जहाँन के) आदमी और जिन इस बात पर इकट्ठे हो कि उस क़ुरान का मिसल ले आएँ तो (ना मुमकिन) उसके बराबर नहीं ला सकते अगरचे (उसको कोशिश में) एक का एक मददगार भी बने
Verse 89
وَلَقَدۡ صَرَّفۡنَا لِلنَّاسِ فِى هَـٰذَا ٱلۡقُرۡءَانِ مِن كُلِّ مَثَلٍ فَأَبَىٰٓ أَكۡثَرُ ٱلنَّاسِ إِلَّا ڪُفُورًا
और हमने तो लोगों (के समझाने) के वास्ते इस क़ुरान में हर क़िस्म की मसलें अदल बदल के बयान कर दीं उस पर भी अक्सर लोग बग़ैर नाशुक्री किए नहीं रहते
Verse 90
وَقَالُواْ لَن نُّؤۡمِنَ لَكَ حَتَّىٰ تَفۡجُرَ لَنَا مِنَ ٱلۡأَرۡضِ يَنۢبُوعًا
(ऐ रसूल कुफ्फार मक्के ने) तुमसे कहा कि जब तक तुम हमारे वास्ते ज़मीन से चश्मा (न) बहा निकालोगे हम तो तुम पर हरगिज़ ईमान न लाएँगें
Verse 91
أَوۡ تَكُونَ لَكَ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَعِنَبٍ فَتُفَجِّرَ ٱلۡأَنۡهَـٰرَ خِلَـٰلَهَا تَفۡجِيرًا
या (ये नहीं तो) खजूरों और अंगूरों का तुम्हारा कोई बाग़ हो उसमें तुम बीच बीच में नहरे जारी करके दिखा दो
Verse 92
أَوۡ تُسۡقِطَ ٱلسَّمَآءَ كَمَا زَعَمۡتَ عَلَيۡنَا كِسَفًا أَوۡ تَأۡتِىَ بِٱللَّهِ وَٱلۡمَلَـٰٓٮِٕڪَةِ قَبِيلاً
या जैसा तुम गुमान रखते थे हम पर आसमान ही को टुकड़े (टुकड़े) करके गिराओ या ख़ुदा और फरिश्तों को (अपने क़ौल की तस्दीक़) में हमारे सामने (गवाही में ला खड़ा कर दिया
Verse 93
أَوۡ يَكُونَ لَكَ بَيۡتٌ مِّن زُخۡرُفٍ أَوۡ تَرۡقَىٰ فِى ٱلسَّمَآءِ وَلَن نُّؤۡمِنَ لِرُقِيِّكَ حَتَّىٰ تُنَزِّلَ عَلَيۡنَا كِتَـٰبًا نَّقۡرَؤُهُ ۥ ۗ قُلۡ سُبۡحَانَ رَبِّى هَلۡ كُنتُ إِلَّا بَشَرًا رَّسُولاً
और जब तक तुम हम पर ख़ुदा के यहाँ से एक किताब न नाज़िल करोगे कि हम उसे खुद पढ़ भी लें उस वक्त तक हम तुम्हारे (आसमान पर चढ़ने के भी) क़ायल न होगें (ऐ रसूल) तुम कह दो कि सुबहान अल्लाह मै एक आदमी (ख़ुदा के) रसूल के सिवा आख़िर और क्या हूँ
Verse 94
وَمَا مَنَعَ ٱلنَّاسَ أَن يُؤۡمِنُوٓاْ إِذۡ جَآءَهُمُ ٱلۡهُدَىٰٓ إِلَّآ أَن قَالُوٓاْ أَبَعَثَ ٱللَّهُ بَشَرًا رَّسُولاً
(जो ये बेहूदा बातें करते हो) और जब लोगों के पास हिदायत आ चुकी तो उनको ईमान लाने से इसके सिवा किसी चीज़ ने न रोका कि वह कहने लगे कि क्या ख़ुदा ने आदमी को रसूल बनाकर भेजा है
Verse 95
قُل لَّوۡ كَانَ فِى ٱلۡأَرۡضِ مَلَـٰٓٮِٕڪَةٌ يَمۡشُونَ مُطۡمَٮِٕنِّينَ لَنَزَّلۡنَا عَلَيۡهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ مَلَڪًا رَّسُولاً
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर ज़मीन पर फ़रिश्ते (बसे हुये) होते कि इत्मेनान से चलते फिरते तो हम उन लोगों के पास फ़रिश्ते ही को रसूल बनाकर नाज़िल करते
Verse 96
قُلۡ ڪَفَىٰ بِٱللَّهِ شَہِيدَۢا بَيۡنِى وَبَيۡنَڪُمۡ ۚ إِنَّهُ ۥ كَانَ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرَۢا بَصِيرًا
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि हमारे तुम्हारे दरमियान गवाही के वास्ते बस ख़ुदा काफी है इसमें शक़ नहीं कि वह अपने बन्दों के हाल से खूब वाक़िफ और देखता रहता है
Verse 97
وَمَن يَہۡدِ ٱللَّهُ فَهُوَ ٱلۡمُهۡتَدِ ۖ وَمَن يُضۡلِلۡ فَلَن تَجِدَ لَهُمۡ أَوۡلِيَآءَ مِن دُونِهِۦ ۖ وَنَحۡشُرُهُمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَـٰمَةِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمۡ عُمۡيًا وَبُكۡمًا وَصُمًّا ۖ مَّأۡوَٮٰهُمۡ جَهَنَّمُ ۖ ڪُلَّمَا خَبَتۡ زِدۡنَـٰهُمۡ سَعِيرًا
और ख़ुदा जिसकी हिदायत करे वही हिदायत याफता है और जिसको गुमराही में छोड़ दे तो (याद रखो कि) फिर उसके सिवा किसी को उसका सरपरस्त न पाआगे और क़यामत के दिन हम उन लोगों का मुँह के बल औंधे और गूँगें और बहरे क़ब्रों से उठाएँगें उनका ठिकाना जहन्नुम है कि जब कभी बुझने को होगी तो हम उन लोगों पर (उसे) और भड़का देंगे
Verse 98
ذَٲلِكَ جَزَآؤُهُم بِأَنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِـَٔايَـٰتِنَا وَقَالُوٓاْ أَءِذَا كُنَّا عِظَـٰمًا وَرُفَـٰتًا أَءِنَّا لَمَبۡعُوثُونَ خَلۡقًا جَدِيدًا
ये सज़ा उनकी इस वज़ह से है कि उन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया और कहने लगे कि जब हम (मरने के बाद सड़ गल) कर हड्डियाँ और रेज़ा रेज़ा हो जाएँगीं तो क्या फिर हम नये सिरे से पैदा करके उठाए जाएँगें
Verse 99
۞ أَوَلَمۡ يَرَوۡاْ أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضَ قَادِرٌ عَلَىٰٓ أَن يَخۡلُقَ مِثۡلَهُمۡ وَجَعَلَ لَهُمۡ أَجَلاً لَّا رَيۡبَ فِيهِ فَأَبَى ٱلظَّـٰلِمُونَ إِلَّا كُفُورًا
क्या उन लोगों ने इस पर भी नहीं ग़ौर किया कि वह ख़ुदा जिसने सारे आसमान और ज़मीन बनाए इस पर भी (ज़रुर) क़ादिर है कि उनके ऐसे आदमी दोबारा पैदा करे और उसने उन (की मौत) की एक मियाद मुक़र्रर कर दी है जिसमें ज़रा भी शक़ नहीं उस पर भी ये ज़ालिम इन्कार किए बग़ैर न रहे
Verse 100
قُل لَّوۡ أَنتُمۡ تَمۡلِكُونَ خَزَآٮِٕنَ رَحۡمَةِ رَبِّىٓ إِذًا لَّأَمۡسَكۡتُمۡ خَشۡيَةَ ٱلۡإِنفَاقِ ۚ وَكَانَ ٱلۡإِنسَـٰنُ قَتُورًا
(ऐ रसूल) इनसे कहो कि अगर मेरे परवरदिगार के रहमत के ख़ज़ाने भी तुम्हारे एख़तियार में होते तो भी तुम खर्च हो जाने के डर से (उनको) बन्द रखते और आदमी बड़ा ही तंग दिल है
Verse 101
وَلَقَدۡ ءَاتَيۡنَا مُوسَىٰ تِسۡعَ ءَايَـٰتِۭ بَيِّنَـٰتٍ ۖ فَسۡـَٔلۡ بَنِىٓ إِسۡرَٲٓءِيلَ إِذۡ جَآءَهُمۡ فَقَالَ لَهُ ۥ فِرۡعَوۡنُ إِنِّى لَأَظُنُّكَ يَـٰمُوسَىٰ مَسۡحُورًا
और हमने यक़ीनन मूसा को खुले हुए नौ मौजिज़े अता किए तो (ऐ रसूल) बनी इसराईल से (यही) पूछ देखो कि जब मूसा उनके पास आए तो फिरऔन ने उनसे कहा कि ऐ मूसा मै तो समझता हूँ कि किसी ने तुम पर जादू करके दीवाना बना दिया है
Verse 102
قَالَ لَقَدۡ عَلِمۡتَ مَآ أَنزَلَ هَـٰٓؤُلَآءِ إِلَّا رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ بَصَآٮِٕرَ وَإِنِّى لَأَظُنُّكَ يَـٰفِرۡعَوۡنُ مَثۡبُورًا
मूसा ने कहा तुम ये ज़रुर जानते हो कि ये मौजिज़े सारे आसमान व ज़मीन के परवरदिगार ने नाज़िल किए (और वह भी लोगों की) सूझ बूझ की बातें हैं और ऐ फिरऔन मै तो ख्याल करता हूँ कि तुम पर यामत आई है
Verse 103
فَأَرَادَ أَن يَسۡتَفِزَّهُم مِّنَ ٱلۡأَرۡضِ فَأَغۡرَقۡنَـٰهُ وَمَن مَّعَهُ ۥ جَمِيعًا
फिर फिरऔन ने ये ठान लिया कि बनी इसराईल को (सर ज़मीने) मिò से निकाल बाहर करे तो हमने फिरऔन और जो लोग उसके साथ थे सब को डुबो मारा
Verse 104
وَقُلۡنَا مِنۢ بَعۡدِهِۦ لِبَنِىٓ إِسۡرَٲٓءِيلَ ٱسۡكُنُواْ ٱلۡأَرۡضَ فَإِذَا جَآءَ وَعۡدُ ٱلۡأَخِرَةِ جِئۡنَا بِكُمۡ لَفِيفًا
और उसके बाद हमने बनी इसराईल से कहा कि (अब तुम ही) इस मुल्क में (खूब आराम से) रहो सहो फिर जब आख़िरत का वायदा आ पहुँचेगा तो हम तुम सबको समेट कर ले आएँगें
Verse 105
وَبِٱلۡحَقِّ أَنزَلۡنَـٰهُ وَبِٱلۡحَقِّ نَزَلَ ۗ وَمَآ أَرۡسَلۡنَـٰكَ إِلَّا مُبَشِّرًا وَنَذِيرًا
और (ऐ रसूल) हमने इस क़ुरान को बिल्कुल ठीक नाज़िल किया और बिल्कुल ठीक नाज़िल हुआ और तुमको तो हमने (जन्नत की) खुशखबरी देने वाला और (अज़ाब से) डराने वाला (रसूल) बनाकर भेजा है
Verse 106
وَقُرۡءَانًا فَرَقۡنَـٰهُ لِتَقۡرَأَهُ ۥ عَلَى ٱلنَّاسِ عَلَىٰ مُكۡثٍ وَنَزَّلۡنَـٰهُ تَنزِيلاً
और क़ुरान को हमने थोड़ा थोड़ा करके इसलिए नाज़िल किया कि तुम लोगों के सामने (ज़रुरत पड़ने पर) मोहलत दे देकर उसको पढ़ दिया करो
Verse 107
قُلۡ ءَامِنُواْ بِهِۦۤ أَوۡ لَا تُؤۡمِنُوٓاْ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡعِلۡمَ مِن قَبۡلِهِۦۤ إِذَا يُتۡلَىٰ عَلَيۡہِمۡ يَخِرُّونَ لِلۡأَذۡقَانِ سُجَّدًا
और (इसी वजह से) हमने उसको रफ्ता रफ्ता नाज़िल किया तुम कह दो कि ख्वाह तुम इस पर ईमान लाओ या न लाओ इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों को उसके क़ब्ल ही (आसमानी किताबों का इल्म अता किया गया है उनके सामने जब ये पढ़ा जाता है तो ठुडडियों से (मुँह के बल) सजदे में गिर पड़तें हैं
Verse 108
وَيَقُولُونَ سُبۡحَـٰنَ رَبِّنَآ إِن كَانَ وَعۡدُ رَبِّنَا لَمَفۡعُولاً
और कहते हैं कि हमारा परवरदिगार (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है बेशक हमारे परवरदिगार का वायदा पूरा होना ज़रुरी था
Verse 109
وَيَخِرُّونَ لِلۡأَذۡقَانِ يَبۡكُونَ وَيَزِيدُهُمۡ خُشُوعًا ۩
और ये लोग (सजदे के लिए) मुँह के बल गिर पड़तें हैं और रोते चले जाते हैं और ये क़ुरान उन की ख़ाकसारी के बढ़ाता जाता है (109) (सजदा)
Verse 110
قُلِ ٱدۡعُواْ ٱللَّهَ أَوِ ٱدۡعُواْ ٱلرَّحۡمَـٰنَ ۖ أَيًّا مَّا تَدۡعُواْ فَلَهُ ٱلۡأَسۡمَآءُ ٱلۡحُسۡنَىٰ ۚ وَلَا تَجۡهَرۡ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتۡ بِہَا وَٱبۡتَغِ بَيۡنَ ذَٲلِكَ سَبِيلاً
(ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (तुम को एख़तियार है) ख्वाह उसे अल्लाह (कहकर) पुकारो या रहमान कह कर पुकारो (ग़रज़) जिस नाम को भी पुकारो उसके तो सब नाम अच्छे (से अच्छे) हैं और (ऐ रसूल) न तो अपनी नमाज़ बहुत चिल्ला कर पढ़ो न और न बिल्कुल चुपके से बल्कि उसके दरमियान एक औसत तरीका एख्तेयार कर लो
Verse 111
وَقُلِ ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى لَمۡ يَتَّخِذۡ وَلَدًا وَلَمۡ يَكُن لَّهُ ۥ شَرِيكٌ فِى ٱلۡمُلۡكِ وَلَمۡ يَكُن لَّهُ ۥ وَلِىٌّ مِّنَ ٱلذُّلِّ ۖ وَكَبِّرۡهُ تَكۡبِيرَۢا
और कहो कि हर तरह की तारीफ उसी ख़ुदा को (सज़ावार) है जो न तो कोई औलाद रखता है और न (सारे जहाँन की) सल्तनत में उसका कोई साझेदार है और न उसे किसी तरह की कमज़ोरी है न कोई उसका सरपरस्त हो और उसकी बड़ाई अच्छी तरह करते रहा करो