Read calmly and use the previous/next links at the bottom to move through the surahs in order.
Quran Surah

Surah Ash-Shura

Quran Surah

Surah 42: Ash-Shura

الشورى

Verse count: 53

Opening Bismillah

بِسْمِ اللَّـهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ

अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपालु और अत्यन्त दयावान हैं।

Verse 1

حمٓ

हा मीम

Verse 2

عٓسٓقٓ

ऐन सीन काफ़

Verse 3

كَذَٲلِكَ يُوحِىٓ إِلَيۡكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكَ ٱللَّهُ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ

(ऐ रसूल) ग़ालिब व दाना ख़ुदा तुम्हारी तरफ़ और जो (पैग़म्बर) तुमसे पहले गुज़रे उनकी तरफ यूँ ही वही भेजता रहता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है ग़रज़ सब कुछ उसी का है

Verse 4

لَهُ ۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَمَا فِى ٱلۡأَرۡضِ‌ ۖ وَهُوَ ٱلۡعَلِىُّ ٱلۡعَظِيمُ

और वह तो (बड़ा) आलीशान (और) बुर्ज़ुग है

Verse 5

تَكَادُ ٱلسَّمَـٰوَٲتُ يَتَفَطَّرۡنَ مِن فَوۡقِهِنَّ ۚ وَٱلۡمَلَـٰٓٮِٕكَةُ يُسَبِّحُونَ بِحَمۡدِ رَبِّہِمۡ وَيَسۡتَغۡفِرُونَ لِمَن فِى ٱلۡأَرۡضِ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلۡغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ

(उनकी बातों से) क़रीब है कि सारे आसमान (उसकी हैबत के मारे) अपने ऊपर वार से फट पड़े और फ़रिश्ते तो अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तसबीह करते हैं और जो लोग ज़मीन में हैं उनके लिए (गुनाहों की) माफी माँगा करते हैं सुन रखो कि ख़ुदा ही यक़ीनन बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

Verse 6

وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦۤ أَوۡلِيَآءَ ٱللَّهُ حَفِيظٌ عَلَيۡہِمۡ وَمَآ أَنتَ عَلَيۡہِم بِوَكِيلٍ

और जिन लोगों ने ख़ुदा को छोड़ कर (और) अपने सरपरस्त बना रखे हैं ख़ुदा उनकी निगरानी कर रहा है (ऐ रसूल) तुम उनके निगेहबान नहीं हो

Verse 7

وَكَذَٲلِكَ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ قُرۡءَانًا عَرَبِيًّا لِّتُنذِرَ أُمَّ ٱلۡقُرَىٰ وَمَنۡ حَوۡلَهَا وَتُنذِرَ يَوۡمَ ٱلۡجَمۡعِ لَا رَيۡبَ فِيهِ ۚ فَرِيقٌ فِى ٱلۡجَنَّةِ وَفَرِيقٌ فِى ٱلسَّعِيرِ

और हमने तुम्हारे पास अरबी क़ुरान यूँ भेजा ताकि तुम मक्का वालों को और जो लोग इसके इर्द गिर्द रहते हैं उनको डराओ और (उनको) क़यामत के दिन से भी डराओ जिस (के आने) में कुछ भी शक़ नहीं (उस दिन) एक फरीक़ (मानने वाला) जन्नत में होगा और फरीक़ (सानी) दोज़ख़ में

Verse 8

وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَهُمۡ أُمَّةً وَٲحِدَةً وَلَـٰكِن يُدۡخِلُ مَن يَشَآءُ فِى رَحۡمَتِهِۦ ۚ وَٱلظَّـٰلِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِىٍّ وَلَا نَصِيرٍ

और अगर ख़ुदा चाहता तो इन सबको एक ही गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है (हिदायत करके) अपनी रहमत में दाख़िल कर लेता है और ज़ालिमों का तो (उस दिन) न कोई यार है और न मददगार

Verse 9

أَمِ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦۤ أَوۡلِيَآءَ‌ ۖ فَٱللَّهُ هُوَ ٱلۡوَلِىُّ وَهُوَ يُحۡىِ ٱلۡمَوۡتَىٰ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىۡءٍ قَدِيرٌ

क्या उन लोगों ने ख़ुदा के सिवा (दूसरे) कारसाज़ बनाए हैं तो कारसाज़ बस ख़ुदा ही है और वही मुर्दों को ज़िन्दा करेगा और वही हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है

Verse 10

وَمَا ٱخۡتَلَفۡتُمۡ فِيهِ مِن شَىۡءٍ فَحُكۡمُهُ ۥۤ إِلَى ٱللَّهِ ۚ ذَٲلِكُمُ ٱللَّهُ رَبِّى عَلَيۡهِ تَوَڪَّلۡتُ وَإِلَيۡهِ أُنِيبُ

और तुम लोग जिस चीज़ में बाहम एख्तेलाफ़ात रखते हो उसका फैसला ख़ुदा ही के हवाले है वही ख़ुदा तो मेरा परवरदिगार है मैं उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी की तरफ रूजू करता हूँ

Verse 11

فَاطِرُ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ ۚ جَعَلَ لَكُم مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ أَزۡوَٲجًا وَمِنَ ٱلۡأَنۡعَـٰمِ أَزۡوَٲجًا‌ ۖ يَذۡرَؤُكُمۡ فِيهِ ۚ لَيۡسَ كَمِثۡلِهِۦ شَىۡءٌ‌ ۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ

सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला (वही) है उसी ने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिन्स के जोड़े बनाए और चारपायों के जोड़े भी (उसी ने बनाए) उस (तरफ) में तुमको फैलाता रहता है कोई चीज़ उसकी मिसल नहीं और वह हर चीज़ को सुनता देखता है

Verse 12

لَهُ ۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ‌ ۖ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقۡدِرُ ۚ إِنَّهُ ۥ بِكُلِّ شَىۡءٍ عَلِيمٌ

सारे आसमान व ज़मीन की कुन्जियाँ उसके पास हैं जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ कर देता है (जिसके लिए) चाहता है तंग कर देता है बेशक वह हर चीज़ से ख़ूब वाक़िफ़ है

Verse 13

۞ شَرَعَ لَكُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِۦ نُوحًا وَٱلَّذِىٓ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ وَمَا وَصَّيۡنَا بِهِۦۤ إِبۡرَٲهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰٓ‌ ۖ أَنۡ أَقِيمُواْ ٱلدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُواْ فِيهِ ۚ كَبُرَ عَلَى ٱلۡمُشۡرِكِينَ مَا تَدۡعُوهُمۡ إِلَيۡهِ ۚ ٱللَّهُ يَجۡتَبِىٓ إِلَيۡهِ مَن يَشَآءُ وَيَہۡدِىٓ إِلَيۡهِ مَن يُنِيبُ

उसने तुम्हारे लिए दीन का वही रास्ता मुक़र्रर किया जिस (पर चलने का) नूह को हुक्म दिया था और (ऐ रसूल) उसी की हमने तुम्हारे पास वही भेजी है और उसी का इब्राहीम और मूसा और ईसा को भी हुक्म दिया था (वह) ये (है कि) दीन को क़ायम रखना और उसमें तफ़रक़ा न डालना जिस दीन की तरफ तुम मुशरेकीन को बुलाते हो वह उन पर बहुत शाक़ ग़ुज़रता है ख़ुदा जिसको चाहता है अपनी बारगाह का बरगुज़ीदा कर लेता है और जो उसकी तरफ रूजू करे (अपनी तरफ़ (पहुँचने) का रास्ता दिखा देता है

Verse 14

وَمَا تَفَرَّقُوٓاْ إِلَّا مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلۡعِلۡمُ بَغۡيَۢا بَيۡنَہُمۡ ۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتۡ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى لَّقُضِىَ بَيۡنَہُمۡ ۚ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُورِثُواْ ٱلۡكِتَـٰبَ مِنۢ بَعۡدِهِمۡ لَفِى شَكٍّ مِّنۡهُ مُرِيبٍ

और ये लोग मुतफ़र्रिक़ हुए भी तो इल्म (हक़) आ चुकने के बाद और (वह भी) महज़ आपस की ज़िद से और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक वक्ते मुक़र्रर तक के लिए (क़यामत का) वायदा न हो चुका होता तो उनमें कबका फैसला हो चुका होता और जो लोग उनके बाद (ख़ुदा की) किताब के वारिस हुए वह उसकी तरफ से बहुत सख्त शुबहे में (पड़े हुए) हैं

Verse 15

فَلِذَٲلِكَ فَٱدۡعُ‌ ۖ وَٱسۡتَقِمۡ ڪَمَآ أُمِرۡتَ‌ ۖ وَلَا تَتَّبِعۡ أَهۡوَآءَهُمۡ‌ ۖ وَقُلۡ ءَامَنتُ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِن ڪِتَـٰبٍ‌ ۖ وَأُمِرۡتُ لِأَعۡدِلَ بَيۡنَكُمُ‌ ۖ ٱللَّهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمۡ‌ ۖ لَنَآ أَعۡمَـٰلُنَا وَلَكُمۡ أَعۡمَـٰلُڪُمۡ‌ ۖ لَا حُجَّةَ بَيۡنَنَا وَبَيۡنَكُمُ‌ ۖ ٱللَّهُ يَجۡمَعُ بَيۡنَنَا‌ ۖ وَإِلَيۡهِ ٱلۡمَصِيرُ

तो (ऐ रसूल) तुम (लोगों को) उसी (दीन) की तरफ बुलाते रहे जो और जैसा तुमको हुक्म हुआ है (उसी पर क़ायम रहो और उनकी नफ़सियानी ख्वाहिशों की पैरवी न करो और साफ़ साफ़ कह दो कि जो किताब ख़ुदा ने नाज़िल की है उस पर मैं ईमान रखता हूँ और मुझे हुक्म हुआ है कि मैं तुम्हारे एख्तेलाफात के (दरमेयान) इन्साफ़ (से फ़ैसला) करूँ ख़ुदा ही हमारा भी परवरदिगार है और वही तुम्हारा भी परवरदिगार है हमारी कारगुज़ारियाँ हमारे ही लिए हैं और तुम्हारी कारस्तानियाँ तुम्हारे वास्ते हममें और तुममें तो कुछ हुज्जत (व तक़रार की ज़रूरत) नहीं ख़ुदा ही हम (क़यामत में) सबको इकट्ठा करेगा

Verse 16

وَٱلَّذِينَ يُحَآجُّونَ فِى ٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ مَا ٱسۡتُجِيبَ لَهُ ۥ حُجَّتُهُمۡ دَاحِضَةٌ عِندَ رَبِّہِمۡ وَعَلَيۡہِمۡ غَضَبٌ وَلَهُمۡ عَذَابٌ شَدِيدٌ

और उसी की तरफ लौट कर जाना है और जो लोग उसके मान लिए जाने के बाद ख़ुदा के बारे में (ख्वाहमख्वाह) झगड़ा करते हैं उनके परवरदिगार के नज़दीक उनकी दलील लग़ो बातिल है और उन पर (ख़ुदा का) ग़ज़ब और उनके लिए सख्त अज़ाब है

Verse 17

ٱللَّهُ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ ٱلۡكِتَـٰبَ بِٱلۡحَقِّ وَٱلۡمِيزَانَ ۗ وَمَا يُدۡرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ قَرِيبٌ

ख़ुदा ही तो है जिसने सच्चाई के साथ किताब नाज़िल की और अदल (व इन्साफ़ भी नाज़िल किया) और तुमको क्या मालूम यायद क़यामत क़रीब ही हो

Verse 18

يَسۡتَعۡجِلُ بِہَا ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِہَا‌ ۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مُشۡفِقُونَ مِنۡہَا وَيَعۡلَمُونَ أَنَّهَا ٱلۡحَقُّ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱلَّذِينَ يُمَارُونَ فِى ٱلسَّاعَةِ لَفِى ضَلَـٰلِۭ بَعِيدٍ

(फिर ये ग़फ़लत कैसी) जो लोग इस पर ईमान नहीं रखते वह तो इसके लिए जल्दी कर रहे हैं और जो मोमिन हैं वह उससे डरते हैं और जानते हैं कि क़यामत यक़ीनी बरहक़ है आगाह रहो कि जो लोग क़यामत के बारे में शक़ किया करते हैं वह बड़े परले दर्जे की गुमराही में हैं

Verse 19

ٱللَّهُ لَطِيفُۢ بِعِبَادِهِۦ يَرۡزُقُ مَن يَشَآءُ‌ ۖ وَهُوَ ٱلۡقَوِىُّ ٱلۡعَزِيزُ

और ख़ुदा अपने बन्दों (के हाल) पर बड़ा मेहरबान है जिसको (जितनी) रोज़ी चाहता है देता है वह ज़ोर वाला ज़बरदस्त है

Verse 20

مَن كَانَ يُرِيدُ حَرۡثَ ٱلۡأَخِرَةِ نَزِدۡ لَهُ ۥ فِى حَرۡثِهِۦ‌ ۖ وَمَن كَانَ يُرِيدُ حَرۡثَ ٱلدُّنۡيَا نُؤۡتِهِۦ مِنۡہَا وَمَا لَهُ ۥ فِى ٱلۡأَخِرَةِ مِن نَّصِيبٍ

जो शख़्श आखेरत की खेती का तालिब हो हम उसके लिए उसकी खेती में अफ़ज़ाइश करेंगे और दुनिया की खेती का ख़ास्तगार हो तो हम उसको उसी में से देंगे मगर आखेरत में फिर उसका कुछ हिस्सा न होगा

Verse 21

أَمۡ لَهُمۡ شُرَڪَـٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُ ۚ وَلَوۡلَا ڪَلِمَةُ ٱلۡفَصۡلِ لَقُضِىَ بَيۡنَہُمۡ ۗ وَإِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ

क्या उन लोगों के (बनाए हुए) ऐसे शरीक हैं जिन्होंने उनके लिए ऐसा दीन मुक़र्रर किया है जिसकी ख़ुदा ने इजाज़त नहीं दी और अगर फ़ैसले (के दिन) का वायदा न होता तो उनमें यक़ीनी अब तक फैसला हो चुका होता और ज़ालिमों के वास्ते ज़रूर दर्दनाक अज़ाब है

Verse 22

تَرَى ٱلظَّـٰلِمِينَ مُشۡفِقِينَ مِمَّا ڪَسَبُواْ وَهُوَ وَاقِعُۢ بِهِمۡ ۗ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فِى رَوۡضَاتِ ٱلۡجَنَّاتِ‌ ۖ لَهُم مَّا يَشَآءُونَ عِندَ رَبِّهِمۡ ۚ ذَٲلِكَ هُوَ ٱلۡفَضۡلُ ٱلۡكَبِيرُ

(क़यामत के दिन) देखोगे कि ज़ालिम लोग अपने आमाल (के वबाल) से डर रहे होंगे और वह उन पर पड़ कर रहेगा और जिन्होने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे काम किए वह बेहिश्त के बाग़ों में होंगे वह जो कुछ चाहेंगे उनके लिए उनके परवरदिगार की बारगाह में (मौजूद) है यही तो (ख़ुदा का) बड़ा फज़ल है

Verse 23

ذَٲلِكَ ٱلَّذِى يُبَشِّرُ ٱللَّهُ عِبَادَهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ ۗ قُل لَّآ أَسۡـَٔلُكُمۡ عَلَيۡهِ أَجۡرًا إِلَّا ٱلۡمَوَدَّةَ فِى ٱلۡقُرۡبَىٰ ۗ وَمَن يَقۡتَرِفۡ حَسَنَةً نَّزِدۡ لَهُ ۥ فِيہَا حُسۡنًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ شَكُورٌ

यही (ईनाम) है जिसकी ख़ुदा अपने उन बन्दों को ख़ुशख़बरी देता है जो ईमान लाए और नेक काम करते रहे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं इस (तबलीग़े रिसालत) का अपने क़रातबदारों (अहले बैत) की मोहब्बत के सिवा तुमसे कोई सिला नहीं मांगता और जो शख़्श नेकी हासिल करेगा हम उसके लिए उसकी ख़ूबी में इज़ाफा कर देंगे बेशक वह बड़ा बख्शने वाला क़दरदान है

Verse 24

أَمۡ يَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا‌ ۖ فَإِن يَشَإِ ٱللَّهُ يَخۡتِمۡ عَلَىٰ قَلۡبِكَ ۗ وَيَمۡحُ ٱللَّهُ ٱلۡبَـٰطِلَ وَيُحِقُّ ٱلۡحَقَّ بِكَلِمَـٰتِهِۦۤ ۚ إِنَّهُ ۥ عَلِيمُۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ

क्या ये लोग (तुम्हारी निस्बत कहते हैं कि इस (रसूल) ने ख़ुदा पर झूठा बोहतान बाँधा है तो अगर (ऐसा) होता तो) ख़ुदा चाहता तो तुम्हारे दिल पर मोहर लगा देता (कि तुम बात ही न कर सकते) और ख़ुदा तो झूठ को नेस्तनाबूद और अपनी बातों से हक़ को साबित करता है वह यक़ीनी दिलों के राज़ से ख़ूब वाक़िफ है

Verse 25

وَهُوَ ٱلَّذِى يَقۡبَلُ ٱلتَّوۡبَةَ عَنۡ عِبَادِهِۦ وَيَعۡفُواْ عَنِ ٱلسَّيِّـَٔاتِ وَيَعۡلَمُ مَا تَفۡعَلُونَ

और वही तो है जो अपने बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और गुनाहों को माफ़ करता है और तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह जानता है

Verse 26

وَيَسۡتَجِيبُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضۡلِهِۦ ۚ وَٱلۡكَـٰفِرُونَ لَهُمۡ عَذَابٌ شَدِيدٌ

और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे उनकी (दुआ) क़ुबूल करता है फज़ल व क़रम से उनको बढ़ कर देता है और काफिरों के लिए सख्त अज़ाब है

Verse 27

۞ وَلَوۡ بَسَطَ ٱللَّهُ ٱلرِّزۡقَ لِعِبَادِهِۦ لَبَغَوۡاْ فِى ٱلۡأَرۡضِ وَلَـٰكِن يُنَزِّلُ بِقَدَرٍ مَّا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُ ۥ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرُۢ بَصِيرٌ

और अगर ख़ुदा ने अपने बन्दों की रोज़ी में फराख़ी कर दे तो वह लोग ज़रूर (रूए) ज़मीन से सरकशी करने लगें मगर वह तो बाक़दरे मुनासिब जिसकी रोज़ी (जितनी) चाहता है नाज़िल करता है वह बेशक अपने बन्दों से ख़बरदार (और उनको) देखता है

Verse 28

وَهُوَ ٱلَّذِى يُنَزِّلُ ٱلۡغَيۡثَ مِنۢ بَعۡدِ مَا قَنَطُواْ وَيَنشُرُ رَحۡمَتَهُ ۥ ۚ وَهُوَ ٱلۡوَلِىُّ ٱلۡحَمِيدُ

और वही तो है जो लोगों के नाउम्मीद हो जाने के बाद मेंह बरसाता है और अपनी रहमत (बारिश की बरकतों) को फैला देता है और वही कारसाज़ (और) हम्द व सना के लायक़ है

Verse 29

وَمِنۡ ءَايَـٰتِهِۦ خَلۡقُ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَآبَّةٍ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمۡعِهِمۡ إِذَا يَشَآءُ قَدِيرٌ

और उसी की (क़ुदरत की) निशानियों में से सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करना और उन जानदारों का भी जो उसने आसमान व ज़मीन में फैला रखे हैं और जब चाहे उनके जमा कर लेने पर (भी) क़ादिर है

Verse 30

وَمَآ أَصَـٰبَڪُم مِّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتۡ أَيۡدِيكُمۡ وَيَعۡفُواْ عَن كَثِيرٍ

और जो मुसीबत तुम पर पड़ती है वह तुम्हारे अपने ही हाथों की करतूत से और (उस पर भी) वह बहुत कुछ माफ कर देता है

Verse 31

وَمَآ أَنتُم بِمُعۡجِزِينَ فِى ٱلۡأَرۡضِ‌ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّ وَلَا نَصِيرٍ

और तुम लोग ज़मीन में (रह कर) तो ख़ुदा को किसी तरह हरा नहीं सकते और ख़ुदा के सिवा तुम्हारा न कोई दोस्त है और न मददगार

Verse 32

وَمِنۡ ءَايَـٰتِهِ ٱلۡجَوَارِ فِى ٱلۡبَحۡرِ كَٱلۡأَعۡلَـٰمِ

और उसी की (क़ुदरत) की निशानियों में से समन्दर में (चलने वाले) (बादबानी जहाज़) है जो गोया पहाड़ हैं

Verse 33

إِن يَشَأۡ يُسۡكِنِ ٱلرِّيحَ فَيَظۡلَلۡنَ رَوَاكِدَ عَلَىٰ ظَهۡرِهِۦۤ ۚ إِنَّ فِى ذَٲلِكَ لَأَيَـٰتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ

अगर ख़ुदा चाहे तो हवा को ठहरा दे तो जहाज़ भी समन्दर की सतह पर (खड़े के खड़े) रह जाएँ बेशक तमाम सब्र और शुक्र करने वालों के वास्ते इन बातों में (ख़ुदा की क़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ हैं

Verse 34

أَوۡ يُوبِقۡهُنَّ بِمَا كَسَبُواْ وَيَعۡفُ عَن كَثِيرٍ

(या वह चाहे तो) उनको उनके आमाल (बद) के सबब तबाह कर दे

Verse 35

وَيَعۡلَمَ ٱلَّذِينَ يُجَـٰدِلُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ

और वह बहुत कुछ माफ़ करता है और जो लोग हमारी निशानियों में (ख्वाहमाख्वाह) झगड़ा करते हैं वह अच्छी तरह समझ लें कि उनको किसी तरह (अज़ाब से) छुटकारा नहीं

Verse 36

فَمَآ أُوتِيتُم مِّن شَىۡءٍ فَمَتَـٰعُ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا‌ ۖ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيۡرٌ وَأَبۡقَىٰ لِلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَلَىٰ رَبِّہِمۡ يَتَوَكَّلُونَ

(लोगों) तुमको जो कुछ (माल) दिया गया है वह दुनिया की ज़िन्दगी का (चन्द रोज़) साज़ोसामान है और जो कुछ ख़ुदा के यहाँ है वह कहीं बेहतर और पायदार है (मगर ये) ख़ास उन ही लोगों के लिए है जो ईमान लाए और अपने परवरदिगार पर भरोसा रखते हैं

Verse 37

وَٱلَّذِينَ يَجۡتَنِبُونَ كَبَـٰٓٮِٕرَ ٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡفَوَٲحِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُواْ هُمۡ يَغۡفِرُونَ

और जो लोग बड़े बड़े गुनाहों और बेहयाई की बातों से बचे रहते हैं और ग़ुस्सा आ जाता है तो माफ कर देते हैं

Verse 38

وَٱلَّذِينَ ٱسۡتَجَابُواْ لِرَبِّہِمۡ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَمۡرُهُمۡ شُورَىٰ بَيۡنَہُمۡ وَمِمَّا رَزَقۡنَـٰهُمۡ يُنفِقُونَ

और जो अपने परवरदिगार का हुक्म मानते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और उनके कुल काम आपस के मशवरे से होते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते हैं

Verse 39

وَٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَابَہُمُ ٱلۡبَغۡىُ هُمۡ يَنتَصِرُونَ

और (वह ऐसे हैं) कि जब उन पर किसी किस्म की ज्यादती की जाती है तो बस वाजिबी बदला ले लेते हैं

Verse 40

وَجَزَٲٓؤُاْ سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِّثۡلُهَا‌ ۖ فَمَنۡ عَفَا وَأَصۡلَحَ فَأَجۡرُهُ ۥ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّهُ ۥ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ

और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस पर भी जो शख्स माफ कर दे और (मामले की) इसलाह कर दें तो इसका सवाब ख़ुदा के ज़िम्मे है बेशक वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता

Verse 41

وَلَمَنِ ٱنتَصَرَ بَعۡدَ ظُلۡمِهِۦ فَأُوْلَـٰٓٮِٕكَ مَا عَلَيۡہِم مِّن سَبِيلٍ

और जिस पर ज़ुल्म हुआ हो अगर वह उसके बाद इन्तेक़ाम ले तो ऐसे लोगों पर कोई इल्ज़ाम नहीं

Verse 42

إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَظۡلِمُونَ ٱلنَّاسَ وَيَبۡغُونَ فِى ٱلۡأَرۡضِ بِغَيۡرِ ٱلۡحَقِّ ۚ أُوْلَـٰٓٮِٕكَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ

इल्ज़ाम तो बस उन्हीं लोगों पर होगा जो लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और रूए ज़मीन में नाहक़ ज्यादतियाँ करते फिरते हैं उन्हीं लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है

Verse 43

وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٲلِكَ لَمِنۡ عَزۡمِ ٱلۡأُمُورِ

और जो सब्र करे और कुसूर माफ़ कर दे तो बेशक ये बड़े हौसले के काम हैं

Verse 44

وَمَن يُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُ ۥ مِن وَلِىٍّ مِّنۢ بَعۡدِهِۦ ۗ وَتَرَى ٱلظَّـٰلِمِينَ لَمَّا رَأَوُاْ ٱلۡعَذَابَ يَقُولُونَ هَلۡ إِلَىٰ مَرَدٍّ مِّن سَبِيلٍ

और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके बाद उसका कोई सरपरस्त नहीं और तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब (दोज़ख़) का अज़ाब देखेंगे तो कहेंगे कि भला (दुनिया में) फिर लौट कर जाने की कोई सबील है

Verse 45

وَتَرَٮٰهُمۡ يُعۡرَضُونَ عَلَيۡهَا خَـٰشِعِينَ مِنَ ٱلذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرۡفٍ خَفِىٍّ ۗ وَقَالَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ ٱلۡخَـٰسِرِينَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓاْ أَنفُسَہُمۡ وَأَهۡلِيهِمۡ يَوۡمَ ٱلۡقِيَـٰمَةِ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ فِى عَذَابٍ مُّقِيمٍ

और तुम उनको देखोगे कि दोज़ख़ के सामने लाए गये हैं (और) ज़िल्लत के मारे कटे जाते हैं (और) कनक्खियों से देखे जाते हैं और मोमिनीन कहेंगे कि हकीक़त में वही बड़े घाटे में हैं जिन्होने क़यामत के दिन अपने आप को और अपने घर वालों को ख़सारे में डाला देखो ज़ुल्म करने वाले दाएमी अज़ाब में रहेंगे

Verse 46

وَمَا كَانَ لَهُم مِّنۡ أَوۡلِيَآءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ ۗ وَمَن يُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُ ۥ مِن سَبِيلٍ

और ख़ुदा के सिवा न उनके सरपरस्त ही होंगे जो उनकी मदद को आएँ और जिसको ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसके लिए (हिदायत की) कोई राह नहीं

Verse 47

ٱسۡتَجِيبُواْ لِرَبِّكُم مِّن قَبۡلِ أَن يَأۡتِىَ يَوۡمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُ ۥ مِنَ ٱللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلۡجَإٍ يَوۡمَٮِٕذٍ وَمَا لَكُم مِّن نَّڪِيرٍ

(लोगों) उस दिन के पहले जो ख़ुदा की तरफ से आयेगा और किसी तरह (टाले न टलेगा) अपने परवरदिगार का हुक्म मान लो (क्यों कि) उस दिन न तो तुमको कहीं पनाह की जगह मिलेगी और न तुमसे (गुनाह का) इन्कार ही बन पड़ेगा

Verse 48

فَإِنۡ أَعۡرَضُواْ فَمَآ أَرۡسَلۡنَـٰكَ عَلَيۡہِمۡ حَفِيظًا‌ ۖ إِنۡ عَلَيۡكَ إِلَّا ٱلۡبَلَـٰغُ ۗ وَإِنَّآ إِذَآ أَذَقۡنَا ٱلۡإِنسَـٰنَ مِنَّا رَحۡمَةً فَرِحَ بِہَا‌ ۖ وَإِن تُصِبۡہُمۡ سَيِّئَةُۢ بِمَا قَدَّمَتۡ أَيۡدِيهِمۡ فَإِنَّ ٱلۡإِنسَـٰنَ كَفُورٌ

फिर अगर मुँह फेर लें तो (ऐ रसूल) हमने तुमको उनका निगेहबान बनाकर नहीं भेजा तुम्हारा काम तो सिर्फ (एहकाम का) पहुँचा देना है और जब हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह उससे ख़ुश हो जाता है और अगर उनको उन्हीं के हाथों की पहली करतूतों की बदौलत कोई तकलीफ पहुँचती (सब एहसान भूल गए) बेशक इन्सान बड़ा नाशुक्रा है

Verse 49

لِّلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَٱلۡأَرۡضِ ۚ يَخۡلُقُ مَا يَشَآءُ ۚ يَہَبُ لِمَن يَشَآءُ إِنَـٰثًا وَيَهَبُ لِمَن يَشَآءُ ٱلذُّكُورَ

सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़ास ख़ुदा ही की है जो चाहता है पैदा करता है (और) जिसे चाहता है (फ़क़त) बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है (महज़) बेटा अता करता है

Verse 50

أَوۡ يُزَوِّجُهُمۡ ذُكۡرَانًا وَإِنَـٰثًا‌ ۖ وَيَجۡعَلُ مَن يَشَآءُ عَقِيمًا ۚ إِنَّهُ ۥ عَلِيمٌ قَدِيرٌ

या उनको बेटे बेटियाँ (औलाद की) दोनों किस्में इनायत करता है और जिसको चाहता है बांझ बना देता है बेशक वह बड़ा वाकिफ़कार क़ादिर है

Verse 51

۞ وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ ٱللَّهُ إِلَّا وَحۡيًا أَوۡ مِن وَرَآىِٕ حِجَابٍ أَوۡ يُرۡسِلَ رَسُولاً فَيُوحِىَ بِإِذۡنِهِۦ مَا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُ ۥ عَلِىٌّ حَڪِيمٌ

और किसी आदमी के लिए ये मुमकिन नहीं कि ख़ुदा उससे बात करे मगर वही के ज़रिए से (जैसे) (दाऊद) परदे के पीछे से जैसे (मूसा) या कोई फ़रिश्ता भेज दे (जैसे मोहम्मद) ग़रज़ वह अपने एख्तेयार से जो चाहता है पैग़ाम भेज देता है बेशक वह आलीशान हिकमत वाला है

Verse 52

وَكَذَٲلِكَ أَوۡحَيۡنَآ إِلَيۡكَ رُوحًا مِّنۡ أَمۡرِنَا ۚ مَا كُنتَ تَدۡرِى مَا ٱلۡكِتَـٰبُ وَلَا ٱلۡإِيمَـٰنُ وَلَـٰكِن جَعَلۡنَـٰهُ نُورًا نَّہۡدِى بِهِۦ مَن نَّشَآءُ مِنۡ عِبَادِنَا ۚ وَإِنَّكَ لَتَہۡدِىٓ إِلَىٰ صِرَٲطٍ مُّسۡتَقِيمٍ

और इसी तरह हमने अपने हुक्म को रूह (क़ुरान) तुम्हारी तरफ ‘वही’ के ज़रिए से भेजे तो तुम न किताब ही को जानते थे कि क्या है और न ईमान को मगर इस (क़ुरान) को एक नूर बनाया है कि इससे हम अपने बन्दों में से जिसकी चाहते हैं हिदायत करते हैं और इसमें शक़ नहीं कि तुम (ऐ रसूल) सीधा ही रास्ता दिखाते हो

Verse 53

صِرَٲطِ ٱللَّهِ ٱلَّذِى لَهُ ۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٲتِ وَمَا فِى ٱلۡأَرۡضِ ۗ أَلَآ إِلَى ٱللَّهِ تَصِيرُ ٱلۡأُمُورُ

(यानि) उसका रास्ता कि जो आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) उसी का है सुन रखो सब काम ख़ुदा ही की तरफ रूजू होंगे और वही फैसला करेगा